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एन. रघुरामन का कॉलम:प्रबंधन केवल अकादमिक कारणों से अध्ययन का विषय नहीं है, यह जीवन जीने का तरीका बन गया है

16 दिन पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

मैं एक मध्यमर्वीय परिवार में पला-बढ़ा, जब क्रेडिट और डेबिट कार्ड चलन में नहीं थे और खर्च हमेशा आय से कम होता था। मेरी युवावस्था के दिनों में, मुझे पता नहीं क्यों ऐसा लगता था कि क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल पाप है। ऐसा इसलिए हो सकता है कि क्योंकि मैंने पिता को अपना पहला घर रिटायरमेंट के बाद उससे मिले पैसों से खरीदते देखा था। जैसे ही मैं प्रबंधन की कक्षाओं में गया, बैंक के पैसों का प्रयोग करने के मामले में स्मार्ट हो गया- मतलब मैं क्रेडिट कार्ड से सामान खरीदता और आखिरी तारीख से पहले सारा भुगतान कर देता, इसके बदले में कार्ड पॉइंट्स हासिल करता, जिसका इस्तेमाल कई लग्जरी खरीदारी जैसे एयरलाइन टिकट या होटल में रुकने में कर सकता था।

लेकिन कोरोना के बाद मेरा खर्च का तरीका बदल गया। मैं दो कारणों से क्रेडिट कार्ड के बजाय डेबिट कार्ड इस्तेमाल करने लगा। 1. चूंकि इस लॉकडाउन में सारी खरीदारी घर पर ही डििजटल तरीके से हो रही है, ऐसे में मैं अपने क्रेडिट कार्ड का नंबर और पासवर्ड कम्प्यूटर्स और फोन में नहीं डालना चाहता। इसलिए मैं एक ऐसे खाते का डेबिट कार्ड रखता हूं, जिसमें पैसा जरूरत से ज्यादा नहीं होता। 2. मैं अपने परिवार में अपनी बेटी की उम्र के बच्चों को यह सीख देना चाहता हूं कि सायबर क्राइम में बढ़ोतरी के कारण सतर्क रहें। यहां तक कि मेरे परिवार ने कहना शुरू कर दिया कि ‘जैसे-जैसे आप उम्रदराज होते जा रहे हैं, जहां खर्च की बात आती है, अपने पिता की तरह होते जा रहे हैं।’

मुझे नहीं मालूम कि वह मेरा मज़ाक था या प्रशंसा, जब तक कि आरबीआई द्वारा इस हफ्ते जारी आंकड़ों पर मेरी नज़र नहीं पड़ी। रिपोर्ट में कहा गया कि इस वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही में भारतीयों के खर्च का झुकाव क्रेडिट से डेबिट कार्ड की ओर हुआ है। जून में 4,434 करोड़ रुपए के लेनदेन के साथ डेबिट कार्ड लेनदेन ने क्रेडिट कार्ड को पीछे छोड़ दिया है। आरबीआई को भारतीय कार्डधारकों के एक और असामान्य व्यवहार, बकाया राशि को कम करने की प्रवृत्ति के बारे में पता चला। लॉकडाउन अवधि में कर्जधारकों को मोरटोरियम की सुविधा के बावजूद अधिकांश ग्राहकों ने मार्च में बकाया राशि 1,08,094 करोड़ रु. से 31 जुलाई तक 1,01,391 करोड़ रुपए का भुगतान कर दिया। इसका मतलब है कि भारतीयों ने पैसों के प्रबंधन को लेकर साफ-सुथरा आचरण अपनाना शुरू कर दिया है।

इसी तरह मैंने अपने सभी रिश्तेदारों को, विशेष तौर पर डायबिटीज़ या अन्य बीमारियों से ग्रसित बुजुर्गों को लॉकडाउन के दौरान मुंबई ना छोड़ने की सलाह दी थी क्योंकि शहर में बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं हैं। पर जैसे ही अनलॉक 4 की घोषणा हुई, उन्हीं परिजनों को मैंने मुंबई से दूर उन छोटी जगहों पर जाने का कहा, जो कोरोना के हॉटस्पॉट नहीं हैं। मैं सौ फीसदी आश्वस्त था कि जैसे ही लोग सार्वजनिक परिवहन से यात्रा शुरू करेंगे, मुंबई या पुणे के अस्पतालों में भर्ती होने का मतलब नर्क से कम अनुभव नहीं रहेगा। और मैं सही था, सितंबर कोविड के लिहाज से महाराष्ट्र के लिए सबसे बुरा महीना साबित होने जा रहा है। राज्य पहले 15 दिनों में ही तीन लाख का आंकड़ा पार करने की ओर है, जबकि पूरे अगस्त में 3,71,238 और जुलाई में 2,47,398 मामले सामने आए थे। पुणे जैसे शहरों से आ रही रिपोर्ट्स में स्वीकार किया गया है कि मरीज़ पुणे छोड़कर दूसरी छोटी जगहों पर जा रहे हैं, जहां या तो उनके रिश्तेदार डॉक्टर हैं या अस्पताल चलाते हैं।

फंडा यह है कि प्रबंधन केवल अकादमिक कारणों से अध्ययन का विषय नहीं है, यह जीवन जीने का तरीका बन गया है।

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