परदे के पीछे / मुंशी प्रेमचंद की ‘ईदगाह’ और चौदहवीं का चांद

Munshi Premchand's 'Idgah' and the fourteenth moon
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Munshi Premchand's 'Idgah' and the fourteenth moon

जयप्रकाश चौकसे

जयप्रकाश चौकसे

May 24, 2020, 06:57 AM IST

मुं शी प्रेमचंद की ‘ईदगाह’ एक दादी-पोते की कथा है। दादी और पोता अत्यंत गरीब हैं। रमजान में दादी ने अपने पुराने वस्त्र दर्जी को दिए कि वह उन्हें काटकर पोते के लिए कुर्ता-पायजामा बना दे। दादी रोटी सेंकते समय अपने हाथ जला लेती है, क्योंकि उसके पास चिमटा नहीं है। पोता यह सब देखता है। ईद के समय कपड़े बनकर आते हैं। पोता शिकायत करता है कि यह पुराने हैं। दादी पायजामे में नया नाड़ा डालती है और कहती है कि कम से कम नाड़ा तो नया है। गरीब के कपड़ों में नया नाड़ा होना ही एक शगुन है। व्यवस्था सब कुछ छीन सकती है, परंतु नाड़े पर हमारा जन्मसिद्ध अधिकार नहीं छीन सकती। ईद पर मेला लगता है। दादी अपने पोते को इकन्नी देती है, जिससे वह चिमटा खरीदकर दादी को देता है। सदियों से दादी की छाती जख्मी है और चिमटा मरहम बन जाता है। दादी को लगता है कि उनका जन्म लेना सार्थक हो गया।
विगत सदी के तीसरे दशक में चंदूलाल शाह का छोटा भाई फिल्में बनाता था। चंदूलाल शेयर बाजार में माहिर माने जाते थे। कुछ लोग उनसे सलाह लेकर शेयर खरीदते और बेचते थे। उनके भाई के पैर की हड्डी तड़क गई, तो चंदूलाल फिल्म निर्माण की देखरेख करने लगे। एक सिनेमा मालिक ने उन्हें 20 हजार रुपए पेशगी दी और ईद पर प्रदर्शन के लिए मुस्लिम सामाजिक फिल्म बनाने का अनुबंध किया। चंदूलाल को विषय की जानकारी नहीं थी।

उन्होंने गुजरात की लोककथा ‘गुण सुंदरी’ से प्रेरित फिल्म बना दी। सिनेमा मालिक ने मुकदमा कायम करने की धमकी दी, परंतु समय कम होने के कारण ‘गुण सुंदरी’ का प्रदर्शन ईद पर किया गया। फिल्म अत्यंत सफल रही। वर्तमान में ईद पर ‘गुण सुंदरी’ का प्रदर्शन विरोध का शिकार न भी हो तो भी सफल नहीं हो सकती। समाज से भाईचारे का गुण ही गायब कर दिया गया है। कुछ वर्ष पूर्व भी फिल्मकार अनुभव सिन्हा की ऋषि कपूर और तापसी पन्नू अभिनीत ‘मुल्क’ का प्रदर्शन हुआ। फिल्म में एक मुस्लिम परिवार का युवा आतंकवादी गिरोह का सदस्य बनकर बम विस्फोट करता है। पुलिस पूरे परिवार को ही दोषी मान लेती है। अदालत में वकीले सफाई यह कहती है कि एक गुमराह सदस्य के गुनाह के कारण पूरे परिवार को गुनाहगार नहीं माना जा सकता। हमने मुल्क को दो हिस्सों में बांट दिया है- ‘हम’ और ‘वो’। इसी चश्मे से समाज को देखने पर हम उसे बंटा हुआ पाते हैं। 
फिल्म में मुस्लिम पुलिस अफसर आतंकवादी को जिंदा पकड़ सकता था। उससे गिरोह की जानकारी ली जा सकती थी। अफसर को यह साबित करना था कि वह देश प्रेमी है, इसलिए जीवित पकड़ने के अवसर को जानकर गंवा दिया। जज कहता है कि 800 वर्ष पूर्व बिलाल कौन था, यह देखते रहेंगे तो हजारों वर्ष पीछे चले जाएंगे। फिल्म ‘मुल्क’ के अंत में सूफी समूह गीत है- ‘सात रंग पिया के, कभी खुद देख लगाकर..’।  यह सांस्कृतिक विविधता ही तो निशाने पर है। रामकृष्ण परमहंस कुछ समय तक एक मुस्लिम परिवार के साथ मुसलमान की तरह रहे और निष्कर्ष पर पहुंचे कि सभी धर्म अपने मूल स्वरूप में समान हैं। रामकृष्ण परमहंस के शिष्य विवेकानंद ने आशा व्यक्त की कि सभी धर्मों के लोग भाईचारे से रहेंगे तभी सच्चा विकास होगा। एक दौर में मुस्लिम सामाजिक फिल्में बनती थीं। साधना और राजेंद्र कुमार अभिनीत ‘मेरे मेहबूब’ सफल रही।

फिल्मकार एच.एस.रवैल के निर्देशन में जितेंद्र ने ‘दीदारे-यार’ का निर्माण किया। इसके घाटे को पाटने के लिए जितेंद्र ने दक्षिण भारत में बनी हिंदी फिल्मों में अभिनय किया। ‘कागज के फूल’ की असफलता के बाद गुरुदत्त ने एम.ए.सादिक के निर्देशन में सफल फिल्म ‘चौदहवीं का चांद’ बनाई। ‘शोले’ के बाद अमजद खान अभिनीत फिल्म में एक गरीब परिवार के बालक के रोजे रखने को प्रस्तुत किया गया है। गुरबत में भी बच्चा अपनी आस्था पर टिक रहता है। वर्तमान में मुस्लिम समाज की फिल्मों का बनना रुक गया है। दर्शक भी ‘हम’ और ‘वो’ के सांचे में बंट गए हैं। गालिब का शेर है- ‘ईमां (धर्म) मुझे रोके है, जो खींचे है मुझे कुफ्र (अधर्म), काबा मेरे पीछे है, कलीसा (गिरजाघर) मेरे आगे है’।

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