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पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम:कुदरत का कि रेगिस्तान में रहने वाले ऊंट की पलकें सिर्फ इसलिए बड़ी कर दीं कि उसे रेत का तूफान सहना है

6 महीने पहले
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पं. विजयशंकर मेहता - Dainik Bhaskar
पं. विजयशंकर मेहता

यह दुनिया अरमानों का ढोल है। इस पर कुछ थाप कुदरत लगाती है और डांडिये हम पीटते हैं। ढोल की धुन में ही शोर है और शोर में ही धुन है। संसार इसी तरह होता है। सरकते-सरकते चलने का नाम संसार है और इसे पकड़ने के लिए सब दौड़े चले जा रहे हैं। संसार की इस गति में मनुष्य को उसके अरमान और उम्मीदें हिचकोले देती रहती हैं। हम संसार से इसलिए उम्मीद करते हैं कि अपने अरमान पूरे करना है। लेकिन, इसके लिए अपेक्षा की अति कर देते हैं।

दुनिया एक सीमा तक दे सकेगी। उसके बाद फिर क्या करेंगे? दरअसल जब दुनिया से मनचाहा नहीं मिलता तो हम निराश होने लगते हैं। यदि संसार की वाणी सुन सकें तो कभी सुनिएगा। वह बोल रहा होता है कि तेरे हिस्से का, तेरे अधिकार का जो था, मैंने दे दिया। अब इसके बाद भी यदि कुछ चाहता है तो मुझे नोचना पड़ेगा, पर उस लूट-खसोट की कीमत मैं तुझसे वसूलूंगा।

आज हमारी जिंदगी में आई बीमारियां संसार द्वारा वसूली जा रही वह कीमत है जो हमने कभी लूट की शक्ल में हासिल कर ली थी। संसार में कुदरत ने हमें जो दे रखा है उस पर ध्यान देकर उसका सदुपयोग करिए। क्या खेल है कुदरत का कि रेगिस्तान में रहने वाले ऊंट की पलकें सिर्फ इसलिए बड़ी कर दीं कि उसे रेत का तूफान सहना है।

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