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जयप्रकाश चौकसे का कॉलम:प्रकृति सारे समय संगीतमय रहती है, उससे एकाकार स्थापित करने का प्रयास ही सच्ची सुर साधना है

3 दिन पहले
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इं टरनेट पर ‘बंदिश बेंडिट’ नामक संगीतमय रोचक कार्यक्रम उपलब्ध है। चालीस मिनट चलने वाले कुल 10 खंड हैं। कार्यक्रम इतना अच्छा है कि उसे देखते समय आप समय भूल जाते हैं। अत: हम इसे आध्यात्मिक अनुभव भी कह सकते हैं। रिश्ते स्वेटर की तरह बुने हुए हैं। कैफी आजमी का गीत याद आता है- बुन रहे हैं दिल ख्वाब दम ब दम, वक्त ने किया क्या हसीं सितम।

नसीरुद्दीन शाह अभिनीत पात्र जोधपुर राजघराने का तानसेन है और लंबे समय से संगीत सम्रट प्रतियोगिता जीत रहा है और पंडितजी कहलाता है। राजस्थानी संगीत सीखने के लिए एक विदेशी युवा लड़की जोधपुर आई। बचपन में उसके पिता संगीत सीखने के लिए उसे प्रोत्साहित करते थे, परंतु माता उसे प्रतिभाहीन मानती थी। पुत्री को बहुत बाद में यह ज्ञात होता है कि उसकी भारत यात्रा का सारा खर्च मां ही उठा रही है।

दरबारी संगीतकार का पोता राधे भी प्रतिभाशाली गायक है, परंतु दादा उसकी अवहेलना ही करते हैं। संगीत सम्राट का नाम राधे मोहन राठौड, पखावज बजाने वाले का नाम राजेंद्र है, छोटा भाई देवेंद्र है। राधे की मां का नाम मोहिनी है। मोहिनी के पिता भी संगीत गुरु रहे हैं और विगत दौर में राधे मोहन को एक प्रतियोगिता में मोहिनी ही पराजित कर चुकी थी। विदेशी लड़की स्वयं को तमन्ना कहलाना पसंद करती है। राधे मोहन राठौड ने बीकानेर की कन्या से विवाह किया।

राठौड और उनकी इस पत्नी के पुत्र का नाम दिग्विजय है। राधे मोहन राठौड ने न केवल अपनी पत्नी और पुत्र को छोड़ा, वरन उनके संगीत घराने का भी अपहरण कर उसे राठौड घराने के नाम से पुकारा। युवा होने पर दिग्विजय राधे मोहन राठौड से ही संगीत का ज्ञान लेने आया। राधे मोहन राठौड ने उसे पहचानते हुए कभी पुत्र स्वीकार नहीं किया।

पोता राधे विदेशी तमन्ना से मिलता है जो एक पॉप गायिका है और इस क्षेत्र में श्रेष्ठ होना चाहती है। युवा राधे उसे भारतीय शास्त्रीय संगीत सिखाता है। राधे अवाम के सामने अपने असली नाम से उजागर होना नहीं चाहता, क्योंकि पॉप गायन से उसका नाम जुड़ना उसके घराने का अपमान होता। वह कार्यक्रम में अपने चेहरे पर मास्क लगाता है और मास्क मैन के नाम से लोकप्रिय होता है। तमन्ना की इच्छा थी कि वह श्रेष्ठ पॉप गायिका पद के लिए प्रतियोगिता में विजय प्राप्त करके पॉप संगीत संसार की महारानी बन जाए। वह मास्क मैन को अपने साथ गाने के लिए निमंत्रित करती है। तमन्ना को बड़ी निराशा होती है कि मास्क मैन ही उसके गायन का आकर्षण है।

महाराजा अपने भाई की पुत्री का विवाह पंडितजी के पोते राधे से करना चाहते हैं। प्रस्ताव सगर्व स्वीकार किया जाता है। सगाई भी कर दी जाती है। पुत्री कुछ वर्ष स्वीडन में रह चुकी है। स्वीडन में उसने अश्लील कार्यक्रम प्रस्तुत किए थे। वह स्वयं इस शादी के पक्ष में नहीं थी। उसे राधे और तमन्ना के प्रेम की जानकारी थी। परिवार के बुजुर्ग के विरुद्ध वह नहीं जाना चाहती।

तमन्ना को राधे की सगाई की जानकारी मिल जाती है। राधे उसे समझाने के लिए जाता है। इस समय तक तमन्ना ने स्वयं की प्रतिभाहीनता को स्वीकार कर लिया है। वह राधे से कहती है कि सबसे जरूरी है खुद को जान लेना। अब वह अपने देश लौटकर किसी संगीत विद्यालय में दाखिला लेगी। उसे अपने प्रयास से मीडियोक्रेटी की दलदल से बाहर निकलकर सही शिक्षा प्राप्त करना है।

विवाह के कुछ समय पूर्व दिग्विजय के हाथ महाराजा के भाई की पुत्री का स्वीडन में किए गए अश्लील नृत्य का क्लिप मिल जाता है। युवती का संवाद है कि सारा समय उसे भय लगता था कि अश्लील नृत्य का भेद खुल गया तो वह शर्म से मर जाएगी। परंतु आज भेद खुल जाने के बाद वह मिथ्या अपराध बोध से मुक्त होकर निर्मल आनंद का अनुभव कर रही है। वह भी अब अपनी बनाई हुई कैद से मुक्त हो गई है। जैसे तमन्ना ने स्वयं को जाना, वैसे ही राजघराने की कन्या भी अपने को जानकर अपने झूठ से मुक्त हो गई।

रियासत के संगीत सम्राट पद के लिए प्रतियोगिता की घोषणा राजदरबार से की जाती है। विगत दशकों से राधे मोहन राठौड जीत रहे हैं। इस बार उनका मुकाबला अपनी पहली पत्नी के पुत्र दिग्विजय से है। प्रतियोगिता की तैयारी के समय राधे मोहन की सुनने की शक्ति समाप्त हो जाती है। अब वे गा नहीं सकते। कान व कंठ के बीच थोड़ा सा फासला है पर वे स्वयं की आवाज भी नहीं सुन सकते। उनके गायन में बाधा आ जाती है। दरअसल, शरीर के सारे अंगों के बीच एक अटूट रिश्ता है और कड़ी में एक मोती में खोट आने पर पूरा तंत्र टूट सा जाता है। मनुष्य शरीर एक सिम्फनी की तरह है। एक वाद्य की तनिक सी खराबी पूरी धुन को बेसुरा कर देती है। अब राधे राठौड के पोते को उनकी जगह गाना है। घराने के भीतर ही द्वंद्व होगा।

राठौड की बहू मोहिनी निर्णय लेती है कि वह अब युवा राधे को प्रशिक्षण देगी। मोहिनी राधे को समझाती है कि प्रकृति की गोद में बैठकर अभ्यास करना होगा। उसे तालाब में खड़े रहकर गाना होगा। शीतल जल में कंपकंपाने पर पूरा नियंत्रण रखकर सुर साधना होगा। प्रकृति सारे समय संगीतमय रहती है। उससे एकाकार स्थापित करने का प्रयास ही सच्ची सुर साधना है। हाथों में कंपन के कारण पखावज बजाना छोड़ चुके उसके पिता भी ताल देने को तैयार हैं। इस तरह यह पात्र भी स्वयं से सामन्जस्य बिठा रहा है। दोनों प्रतियोगी एक-एक दौर जीत लेते हैं।

निर्णायक दौर में पोता राधे एक असाधारण सुर को साधकर विजयी होता है। मोहिनी ने प्रशिक्षण के आरंभिक दौर में युवा राधे से झाड़ू लगवाई, बर्तन धुलवाए। दैनिक कार्य भी जीवन राग का हिस्सा हैं। फिल्मकार ने राजस्थान को एक जीवंत पात्र की तरह अपने पूरे वैभव, सुर और सौंदर्य के साथ प्रस्तुत किया है।

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