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एन. रघुरामन का कॉलम:अब मोरल साइंस न सिर्फ रोशनी देने वाली है, बल्कि यह भविष्य की पीढ़ी को रास्ता दिखाने वाली भी बन गई है

12 दिन पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

इ स पूरे मंगलवार मैं तनाव में रहा। खासतौर पर इसलिए कि मुझसे ऑनलाइन क्लास लेने वाले मेरे मैनेजमेंट छात्र आमतौर पर ऐसे उत्पादों के आइडिया लाते हैं, जिन्हें पहले न सुना हो। जैसे पानी के नीचे पूरी कॉलोनी बनाना क्योंकि भविष्य में जमीन कम उपबल्ध होगी या इंजेक्शन की जगह स्किन पैचेस (पट्‌टी) लगाना आदि। लेकिन मंगलवार को इंस्टीट्यूट ऑफ लॉजिस्टिक्स एंड एविएशन मैनेजमेंट के कुछ अंडरग्रैजुएट छात्रों ने उनकी उम्र के लोगों में कमजोर होते मानसिक स्वास्थ्य की बात की और यह बताया कि कैसे वे ऐसा मोबाइल एप बनाना चाहते हैं जो 24/7 काम करे और उनकी प्राइवेसी भी सुरक्षित रहे। उन्होंने कहा, ‘भारत में हम मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं को ‘पागल’ होने से जोड़ते हैं और इसे एक अन्य बीमारी नहीं मानते।’

मुझे तब इसकी गंभीरता का अहसास हुआ जब चमक-दमक और शोबिज़ की ओर आकर्षित होने वाले युवा मेंटल हेल्थ पर चिंता जता रहे थे और उसका हल निकालना चाहते थे। मुझे याद है, पिछले साल पुणे के ताराचंद रामनाथ सेवा ट्रस्ट ने जन प्रबोधिनी मनोविज्ञान संस्थान के साथ नशे की लत के खिलाफ ‘संयम’ नामक पहल शुरू की थी। यह 13 से 16 वर्ष के बच्चों में नशीले पदार्थों, इंटरनेट की लत और जोखिम भरे व्यवहारों पर केंद्रित थी जो मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के कई आधारभूत कारणों में से एक है। इस समूह को अब तक 7000 ऐसे छात्र मिल चुके हैं। यह ट्रस्ट अब न सिर्फ ऐसे और छात्रों तक पहुंचना चाहता है, बल्कि निजी काउंसलिंग के अलावा एक हेल्पलाइन नेटवर्क भी शुरू करना चाहता है।

जब बड़ी संख्या में ऐसे पहल नजर आती हैं, जिनमें ऊपर दिए गए युवाओं जैसे समूह भी शामिल हैं, तो यह कहना ठीक होगा कि संदेश स्पष्ट है- हमारे सामने एक मानसिक स्वास्थ्य महामारी खड़ी है। यह कोरोना महामारी के बाद तेजी से बढ़ी है। शिक्षक तेजी से पाठ्यक्रम पूरा कर रहे हैं क्योंकि उन्हें बच्चों के साथ कम स्क्रीन टाइम मिलता है और बच्चों को भी नए रुटीन में ढलना मुश्किल हो रहा है।

हालांकि कुछ विशेषज्ञ कहते हैं कि इसका एक हल है। जबकि सभी कॅरिअर से जुड़े विषय पढ़ाने में लगे हैं, कोई भी जीवन से जुड़े विषय नहीं पढ़ा रहा। अब हम यह कहने लगे हैं कि ‘कभी नैतिक शिक्षा (मोरल साइंस) हुआ करती थी’। चूंकि शिक्षक अब स्कूल में भैतिक रूप से मौजूद नहीं हैं, इसलिए छात्रों ने उनकी बॉडी लैंग्विज से सीखना बंद कर दिया है। खेल मैदान या गलियारों में एक वाक्य में मिलने वाली शिक्षाएं महामारी के दौर में बंद हो गई हैं।

मेरे स्कूल के दिनों में, जब कोई छात्र पेट दर्द की शिकायत करता था तो शिक्षक पहला प्रश्न यही पूछते थे कि ‘कल क्या खाया था?’ इलाज के बाद वे कहते थे कि ‘जो तुम कल खाते हो, वही तुम्हारा शरीर आज बन जाता है।’ बच्चों को यह समझाने के लिए बड़ी नैतिक कहानियों की जरूरत नहीं थी। फिर शिक्षक कहानियां सुनाते थे, जो मूल्यों की शिक्षा के साथ खत्म होती थीं।

ये शिक्षाएं बारीकी से नैतिकता सिखाती थीं, जो उम्रभर के लिए सबक बन जाती थीं। हमें जीवन की बाधाओं के बारे में सोचने और उनसे जीतने के बारे में सिखाया जाता था। आज सिलेबस खत्म करने और मार्कशीट में स्टार देने की होड़ में, शिक्षक और छात्र, दोनों ने मान लिया है कि वे मोरल साइंस विषय छोड़ सकते हैं। समय आ गया है कि इसपर फिर जोर दिया जाए।

फंडा यह है कि अब मोरल साइंस न सिर्फ रोशनी देने वाली है, बल्कि यह भविष्य की पीढ़ी को रास्ता दिखाने वाली भी बन गई है।

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