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मैनेजमेंट फंडा:सुरक्षा और खुशी की चुंबक ही प्रवासियों को वापस खींचेगी

4 महीने पहलेलेखक: एन. रघुरामन
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इ स बुधवार तक असम के करीब 50 हजार प्रवासी विषम परिस्थितियों से लड़ते हुए देश के विभिन्न हिस्सों से अपने राज्य पहुंच चुके थे, लेकिन केरल में कुछ को छोड़कर शायद ही कोई कहीं गया हो। यह स्थिति तब है, जब ‘ईश्वर के अपने देश’ केरल ने 40 से 50 हजार असमी कामगारों को रोजगार दिया है। इससे मुझे आश्चर्य हुआ और मैंने इसका आगे विश्लेषण किया। 
केरल में हर घर से न सही, हर दूसरे घर से कम से कम एक व्यक्ति दुनिया
के अलग-अलग हिस्सों में काम कर रहा है। वे 1960 के दशक में गल्फ क्षेत्र में सबसे पहले गए थे, जब उन्हें तेल से समृद्ध देशों के बेहद गर्म माहौल में छोटे-मोटे काम करने का अवसर मिला। इसलिए वे उस दर्द को समझ पाते हैं, जो आजीविका कमाने के लिए गया एक प्रवासी अपने परिवार, अपने शहर से दूर होने पर महसूस करता है। 
शायद यही एक कारण है कि केरल के ज्यादातर नियोजक प्रवासियों को नौकरी देते हैं और गल्फ की ही तरह रहने की मुफ्त जगह देते हैं, जिनमें ये असमी भी शामिल हैं जो 1996 की भयावह बाढ़ के बाद केरल आए थे। मौजूदा परिस्थिति में, केरल वह पहला राज्य था जिसने ‘मेहमान
कामगारों’ की समस्या को समझा और उनके साथ मेहमान की ही तरह व्यवहार किया। पंचायत के सदस्य लॉकडाउन होने के बाद इन मेहमान कामगारों की सामान्य जरूरतों को समझने के लिए लगातार संपर्क में बने रहे, जिससे इनका आत्मविश्वास और बढ़ गया। केरल डीजीपी ने ऐसे कामगारों को अपना निजी नंबर दिया, जिससे स्थानीय पुलिस स्टेशनों और पुलिस वालों पर अपना नंबर देने और कामगारों की जरूरतों को तुरंत पूरा करने का परोक्ष रूप से दबाव बन गया। वरना उन्हें डीजीपी के स्तर तक शिकायत पहुंचने की आशंका बनी रहती। कामगारों को 50 फीसदी वेतन और सरकार से मुफ्त खाना मिल रहा है, साथ ही उन्हें किराया भी नहीं देना पड़ रहा। इससे उन्होंने आर्थिक रूप से सुरक्षित महसूस किया। ये सामूहिक प्रयास शायद कामगारों को उल्टे पलायन से रोकने का एक बड़ा कारण हो सकते हैं।
यह बहुत रोचक है कि जो सस्टेनेबल डेवलपमेंट इंडेक्स (एसडीआई) केवल देशों का विश्लेषण करता है, उसने अपनी सामान्य प्रक्रिया से हटते हुए बुधवार को जारी इंडेक्स में केरल का बतौर राज्य उल्लेख किया और सराहना की। इंडेक्स को मानव विज्ञानी जैसन हिकल ने तैयार किया था, जो जीवन प्रत्याशा स्कूल के वर्ष सकल राष्ट्रीय आय, सीओटू उत्सर्जन और प्रति व्यक्ति मटेरियल फुटप्रिंट जैसे पैमानों पर मूल्यांकन करता है। मुझे बताया गया है कि केरल का एसडीआई में विशेष उल्लेख मुख्यत: कोविड-19 से लड़ने में शानदार काम के लिए किया गया है। ऐसा नहीं है कि दूसरे राज्यों में नेक काम नहीं हो रहे हैं। बहुत हो रहे हैं, लेकिन व्यक्तिगत स्तर पर। 
पुणे के दो पुलिस वालों का उदाहरण ही ले लीजिए। इन्होंने एक प्रवासी दंपति की मदद की, जिनका बैग मंगलवार-बुधवार की दरमियानी रात उप्र जाने वाली श्रमिक स्पेशल ट्रेन पकड़ने की जल्दबाजी में म्युनिसिपल बस में छूट गया था। बैग में उनके गहने और पैसे थे। दोनों पुलिस वालों ने दंपति को बैग वापस पाने में मदद की। 
सीनियर इंस्पेक्टर मिलिंद गायकवाड़ और पुलिस कॉन्स्टेबल महेंद्र ढापसे व किरण बराडे ने एक दंपति को रोते हुए देखा तो इसका कारण पूछा। उन्हें पता चला कि बस से उतरने और ट्रेन पकड़ने की जल्दबाजी में दंपति अपना बैग बस में भूल गया था। कॉन्स्टेबल बराडे परिवार के साथ रुकीं, जबकि ढापसे बस डिपो तक गए और तीस मिनट में बैग का पता लगा लिया। पुणे से ट्रेन छूटने के पहले ही वे बैग वापस लेकर आ गए।  
फंडा यह है कि चूंकि अब लॉकडाउन धीरे-धीरे खुल रहा है, इसलिए अगर हम चाहते हैं कि ये प्रवासी हमारे शहरों में वापस आकर हमारे बिजनेस फिर शुरू करने में मदद करें, तो हमें सबसे पहले उनकी अच्छाई में निवेश करना होगा, जिससे प्रवासी सुरक्षित और खुश महसूस कर सकें। 

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