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एन. रघुरामन का कॉलम:भीड़ में आपका एक विचार ही आपको अमीर बनाता है ना कि आपका पैसा

6 दिन पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

मैं दो तरह के लोगों को जानता हूं। एक वे जो वर्क फ्रॉम होम (डब्ल्यूएफएच) के बावजूद भी किसी और से बिल लेकर पेट्रोल भत्ते का दावा कर रहे हैं! और दूसरे वे लोग हैं, जो डब्ल्यूएफएच में आने-जाने का खर्च बचाकर उस पैसे को उन बदनसीब परिवारों पर खर्च कर रहे हैं, जिन्हें उनकी बेसिक सैलरी भी नहीं मिल पा रही है।

हां, इस महामारी ने कई बुरी परिस्थितियों का निर्माण किया है, पर इसने असली नायकों के लिए वह मौके भी दिए हैं, जो इस अनिश्चित दौर में अपने विचारों की वजह से चमके हैं। यहां उनकी कहानी है। जैसे ही धीरे-धीरे अनलॉक होना शुरू हुआ, मुंबई में लगभग छह महीने से अपने फ्लैट में कैद कई लोग लोनावाला की ओर भागे, यह देश की आर्थिक राजधानी से सटा एक हिल स्टेशन है और सब जगह चिक्की के लिए जाना जाता है।

पर शायद ही किसी को पता होगा कि हरियाली भरे इस इलाके के एक स्कूल के कक्षा पहली से सातवीं तक के 160 बच्चे ऑनलाइन क्लास में भी शामिल नहीं हो सकेे। स्कूल में ऑनलाइन क्लासेस लेने के सरकारी निर्देश के बाद यहां सबसे बड़ी बाधा स्कूली बच्चे थे, अधिकांश बच्चे कमजोर आर्थिक पृष्ठभूमि से अाते हैं और उनके घर पर कोई इलेक्ट्रॉनिक गैजेट नहीं था, जिससे वह ई-क्लासेस में शामिल हो सकें। देश के किसी भी अन्य गरीब परिवारों की तरह, यहां पैरेंट्स के पास ना तो टैबलेट था और ना ही फोन।

जैसे ही इस बारे में पता चला, पुणे जिला परिषद स्कूल के सभी छह शिक्षकों ने तत्काल रूप से उन जरूरतमंद बच्चों के लिए गैजेट्स खरीदने के संसाधन तेजी से जुटाने शुरू कर दिए। वे थिंक शार्प फाउंडेशन नाम के एक एनजीओ के संपर्क में आए और उनकी मदद से बच्चों को टैबलेट्स मुहैया कराने में कामयाब हुए। और आखिरकार ऑनलाइन क्लासेस शुरू हुईं। हालांकि संघर्ष वहीं खत्म नहीं हुआ। क्लास में शामिल होने के लिए टैबलेट्स और स्मार्टफोन के इंटरनेट कनेक्शन को लगातार रीचार्ज करने की भी जरूरत थी, पर सभी बच्चों के पास इसके लिए भी पर्याप्त पैसा नहीं था। तब इन छह शिक्षकों ने सामूहिक रूप से अपनी तनख्वाह से यह खर्च उठाने का निर्णय लिया।

पर समस्या यह थी कि पैरेंट्स इंटरनेट का पैसा चुकाने में सक्षम नहीं थे, इसके बावजूद वे स्कूल स्टाफ से इन मुफ्त उपहारों को लेने में संकोच कर रहे थे। इसका समाधान निकालने के लिए, शिक्षकों ने बच्चों के लिए छोटी-छोटी ऑनलाइन प्रतियोगिताएं आयोजित कराने का निर्णय लिया और विजेताओं को उनकी जरूरत की चीजें उपहार में दीं। तोहफों में ऑनलाइन लैक्चर को बेहतर तरीके से सुनने के लिए हैडफोन, इंटरनेट रीचार्ज और यहां तक कि कपड़े भी शामिल थे।

ज़ीपी शिक्षकों की तनख्वाह के हिसाब से यह छोटी रकम नहीं है। इन छात्रों की मदद के लिए हर शिक्षक अपनी तनख्वाह से तीन-चार हजार रु. का योगदान दे रहा है! और इतना पैसा खर्च करने के पीछे उनका विचार दिल को छू लेने वाला है। उन्होंने कहा कि स्कूल जाने में परिवहन में उनको उतना ही पैसा खर्च करना पड़ता, जो कि वैसे भी अब बच रहा है।

इसलिए उन पैसों को इन बच्चों पर खर्च करने से उन्हें कोई हर्ज नहीं, जिसकी उन्हें सबसे ज्यादा जरूरत है, ताकि पढ़ाई में कोई बच्चा पिछड़ ना जाए। इस विचार ने मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित किया और उन्हें, उन लोगों की तुलना में कहीं अधिक अमीर साबित कर दिया, जो छुटि्टयों के दिन खर्च किए हुए पेट्रोल का बिल लगाकर अपने संस्थान से पैसा क्लेम करते हैं।

फंडा यह है कि भीड़ में आपका एक विचार ही आपको अमीर बनाता है ना कि आपका पैसा।

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