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नवनीत गुर्जर का कॉलम:कोई नेता-सरकार किसी का भला करने आगे नहीं आने वाले, वे तो फ्री वैक्सीन का वादा करके चुनाव जीतने की जुगत में रहते हैं

2 महीने पहले
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नवनीत गुर्जर, नेशनल एडिटर, दैनिक भास्कर - Dainik Bhaskar
नवनीत गुर्जर, नेशनल एडिटर, दैनिक भास्कर

रात काली चील की तरह भले मंडराती रहे। घनी भी हो। घुप अंधकारमय भी हो, लेकिन कोई रात इतनी लंबी नहीं हो सकती, जिसकी कोई सुबह ही ना हो। कोरोना की रात की सुबह भी होगी। लगता है होने वाली है। लेकिन आखिरी वक्त बेपरवाह होना सबसे ज्यादा घातक हो सकता है। दिल्ली दूर नहीं है। वहां के हाल पता किए जा सकते हैं।

लोग अस्पतालों में दम तोड़ रहे हैं। वे अपने घरों में इलाज करवा रहे हैं और उनमें से कई घर में ही आखिरी सांस लेने को विवश हैं। मास्क से बड़ी दवा कोई नहीं। जो मास्क ना पहनने की बहादुरी दिखा रहे हैं, निश्चित ही उन्हें एक दिन कठिन समय भुगतना पड़ सकता है। बहादुर वो, जो मास्क पहने। सही मास्क, सही तरीके से पहने।

इन दिनों शादियों की भरमार है। जाना भी जरूरी है, लेकिन सावधानी के साथ। निमंत्रण न मिलने पर फूफा की तरह रूठने का मौसम अब लद गया। खुश होना चाहिए कि भीड़ में जाने से बच गए। जिनके घर शादियां हैं, वे भी किसी के बुरा मानने की परवाह किए बगैर कम से कम लोगों में समारोह निबटाने की सोचेंगे तो सबका भला होगा। वैसे भी चुनाव के वक्त की ढीली जांच के परिणाम अब सबको भुगतने पड़ रहे हैं। रोज कोरोना पॉजिटिव लोगों के बड़े-बड़े आंकड़े आ रहे हैं। डरा रहे हैं।

बिहार में चुनाव और बाकी राज्यों में जब उपचुनाव हो रहे थे, राजनीतिक दलों ने भुला दिया था कि कोरोना नाम की कोई चीज भी है। मरीजों की संख्या घटती गई और रैलियों की अपार भीड़ में कोरोना का भय भी खोता गया। अब दूसरी और तीसरी वेव के नाम पर ज्यादा से ज्यादा मरीज निकल रहे हैं।

अब सरकारों को तमाम सख़्ती रह-रहकर याद आ रही है। शादी में सौ से ज़्यादा लोग नहीं। फेरे के वक्त तीस से ज़्यादा नहीं। चुनावी रैलियों में जब हज़ारों लोग आ रहे थे, उनकी किसी को परवाह क्यों नहीं थी? उनके जीवन मरण से बड़ा सवाल आपकी जीत जो थी।

आखिर हम किस तरह के जनप्रतिनिधि चुन रहे हैं? हमारा जीवन संवारने के लुभावने वादे करके जीतने वाले हमारा ही जीवन संकट में डाल रहे हैं और हम उन्हें जिताते जा रहे हैं। बिना कुछ सोचे-विचारे। बिना कुछ समझे। यह कैसा लोकतंत्र है, जहां लोगों को लोगों की परवाह नहीं। पड़ोसी को पड़ोसी की परवाह नहीं और जन प्रतिनिधियों को किसी की परवाह नहीं।

होना तो यह चाहिए कि हम अपनी परवाह करें। मास्क और अन्य सावधानियां बरतें, तो घर, पड़ोस और रिश्तेदार सब सुरक्षित रह पाएंगे।... और इसके भी आगे की बात ये कि वैक्सीन आ जाए, डर खत्म हो जाए तब भी ये सावधानियां बरकरार रहें। दूषित हवा से बचना, कम खर्च की शादी और भीड़ से बचना जारी रहे।

कुल मिलाकर अपनी सुरक्षा खुद ही करनी होगी। कोई नेता, कोई सरकार किसी का भला करने आगे नहीं आने वाले। वे तो फ्री वैक्सीन का वादा करके चुनाव जीतने की जुगत में लगे रहते हैं। बस। लोगों को बाद में पता चलता है कि वैक्सीन तो फ्री ही होती है। फ्री ही होगी।

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