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  • Pro. Somesh K. Mathur's Column: The Need To Force The Country's Infrastructure technology, Not To Break Ties With China, To Work On The Weaknesses To Counter It

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प्रो. सोमेश के. माथुर का कॉलम:चीन से नाता तोड़ने की नहीं, देश के इंफ्रास्ट्रक्चर-तकनीक को मजबूर करने की जरूरत, उससे मुकाबले के लिए कमज़ोरियों पर काम करना होगा

10 महीने पहले
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प्रो. सोमेश के. माथुर, आईआईटी कानपुर - Dainik Bhaskar
प्रो. सोमेश के. माथुर, आईआईटी कानपुर

भारत की चीन पर व्यापार निर्भरता बहुत ज्यादा है। ऐसे में चीनी बायकॉट के बारे में सोचने से पहले कुछ तथ्यों और परिस्थितियों पर गौर करना जरूरी है। दुनिया के कुल उत्पादन का 25% चीन से आता है। विश्व व्यापार में 12-13% हिस्सेदारी चीन की है।

वहीं चीन के वैश्विक व्यापार में भारत की हिस्सेदारी दो फीसदी से भी कम है। अगर हम चीन से रिश्ते खत्म भी करते हैं तो भी विश्व व्यापार पर सालों से चीन ने जो प्रभुत्व हासिल किया है, उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ने वाला। चीन इस मुकाम पर रातों-रात नहीं पहुंचा है।

यह सब 1978 में शुरू हुए सुधारों के बाद हुआ। चीन दक्षिण एशियाई देश, आसियान राष्ट्र और अमेरिका से ट्रेड सरप्लस (आयात से अधिक निर्यात) की स्थिति में है। डब्ल्यूटीओ की 2019 की रिपोर्ट के मुताबिक 2018 में भारत का उत्पाद निर्यात 1.7% था, वहीं आयात 2.6% रहा। वहीं सेवा क्षेत्र में निर्यात 3.5 और आयात 3.2% रहा।

चीन भारत का प्रमुख व्यापार भागीदार है। 2019-20 में देखें, तो भारत के कुल निर्यात का 9% चीन को गया, तो कुल उत्पाद आयात का (मर्केंडाइज़ इंपोर्ट) 18% आयात चीन से हुआ। आयतित चीज़ों में इलेक्ट्रिक मशीनरी, न्यूक्लियर रिएक्टर, ऑर्गेनिक केमिकल्स, रत्न-आभूषण, आयरन, स्टील, फर्टिलाइजर्स, मेडिकल उपकरण और ऑटो कंपोनेंट्स रहे। भारत की आयात-निर्यात सूची को देखें, तो पाएंगे कि भारत चीन को उत्पादन के लिए कच्चा माल निर्यात करता है, तो ज्यादा कीमत पर फाइनल प्रोडक्ट को आयात कर लेता है। 

जनवरी 2010 से जनवरी 2020 तक के महीने के आंकड़े देखें, तो पता चलेगा कि चीन के साथ हमारा व्यापार घाटा लगातार बढ़ रहा है। मतलब निर्यात कम और आयात बढ़ रहा है। वित्तीय वर्ष 2020 के पहले ग्यारह महीनों में चीन के साथ ट्रेड डेफिसिट 47 बिलियन डॉलर रहा।

यही कारण है कि भारत ने आरसीईपी व्यापार समझौते पर अभी तक दस्तख्त नहीं किए हैं। सवाल है कि इस परिस्थिति से हम बाहर कैसे निकलें। भारत अगर इस मुश्किल से पार पाना चाहता है तो हमें विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) जैसी संस्थाओं को साथ लाना होगा।

चीन का मुकाबला करने के लिए भारत डब्ल्यूटीओ के नॉन टैरिफ और टैरिफ उपायों जैसे एंटी डंपिंग, काउंटरवेलिंड ड्यूटीज़ (सीवीडी) और तात्कालिक उपायों के तौर पर डब्ल्यूटीओ के सेफगार्ड मेजर का सहारा ले सकता है। भारत को नॉन टैरिफ उपायों के उपयोग को सुनिश्चित करना चाहिए।

हम तभी अपनी स्थिति सुधार सकते हैं, जब विभिन्न क्षेत्रों में निवेश के साथ-साथ चौथी औद्योगिक क्रांति को बढ़ावा देंगे। वोकल फॉर लोकल का मतलब अपने आपको अलग-थलग कर लेना नहीं है। बल्कि इसका मतलब मुनाफा बढ़ाने, व्यापार वृद्धि, निवेश बढ़ाने के साथ और लोगों को रोजगार मिलने से है, ताकि ग्लोबलाइजेशन का सही फायदा उठाया जा सके। इसलिए चीन से नाता तोड़ने की कोई जरूरत नहीं है।

हम फार्मेसी के क्षेत्र मेें दुनिया में नंबर वन हैं। इसके लिए हमें कच्चा माल चीन से चाहिए होता है, साथ ही डब्ल्यूटीओ की बौद्धिक संपदा अधिकारों में छूट की जरूरत होती है ताकि दवाईयां बिना रोकटोक दुनियाभर में जा सकें। हमारी चुनौतियां अंदरुनी भी हैं, जहां हमें अपने लोगों को प्रशिक्षण और उनके कौशल विकास करने की आवश्यकता है, तो चीन पर निर्भरता को कम करने के लिए तकनीक, इंफ्रास्ट्रक्चर को बेहतर करने की जरूरत है।

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