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  • Ritika Kheda's Column: One Nation One Ration Announcement Is A Great Way To Entertain People And Divert Attention From The Real Issue.

रीतिका खेड़ा का कॉलम:वन नेशन वन राशन की घोषणा लोगों का दिल बहलाने के लिए और असली मुद्दे से ध्यान भटकाने के लिए बढ़िया उपाय है

2 महीने पहले
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रीतिका खेड़ा; अर्थशास्त्री, दिल्ली आईआईटी में पढ़ाती हैं

कोरोना के इस समय में शहरों में काम करने वाले मज़दूर, फिर चाहे वे गांव पहुंच गए हों या शहर में ही हों, सभी का खाद्य सुरक्षा का कोई ख़ास ठिकाना नहीं है। मीडिया ने जब उनकी व्यथा उजागर की तो सरकार पर दबाव बना कि उनके लिए कुछ करे। कुछ सप्ताह बीतने के बाद, केंद्र सरकार ने घोषणा की कि आगे जाकर ऐसे मज़दूरों के लिए ‘वन नेशन, वन राशन’ योजना लाने जा रही है।

वन नेशन, वन राशन (ओएनओआर) में प्रस्तावित है कि कोई भी व्यक्ति देश के किसी भी जन वितरण प्रणाली डिपो से राशन ले सकता है। इससे उम्मीद की जा रही है कि शहर में फंसे मज़दूरों को राहत मिलेगी। हालांकि ओएनओआर सुनने में तो बढ़िया कदम लगता है, लेकिन इसकी वास्तविकता कुछ और ही है।
पहली बात, शहर में फंसे कई मजदूरों का राशन कार्ड है ही नहीं, ना शहर में ना गांव में। उन्हें ओएनओआर से क्या फायदा?

दूसरी बात, जिन मजदूरों का कार्ड है भी उनमें से सब परिवार सहित शहर काम करने नहीं आते। वे राशन कार्ड घर/गांव रख कर आते हैं, क्योंकि घरवाले उसे गांव में इस्तेमाल करते हैं। जिनके हाथ राशनकार्ड न हो उन्हें ओएनओआर से क्या फायदा? फिर चार लोगों के परिवार से, एक मज़दूर शहर जाता है।

यदि वह शहर में राशन ले और डीलर केवल उसका चढ़ाने के बजाय चारों का चढ़ा दे, तो? जब घरवाले गांव में खरीदने जाएंगे, तो उन्हें कहा जाएगा कि चारों का कोटा उठा लिया गया है। मजदूर और परिवार शिकायत कहां करेंगे? 
तीसरी बात यह है कि तमिलनाडु, हिमाचल प्रदेश, केरल, आंध्र प्रदेश में जन वितरण प्रणाली से राज्य के बजट से लोगों को दाल और तेल भी मिलते हैं। जब झारखंड का मजदूर तमिलनाडु में खरीदने जाएगा, उसे यह मिलेंगे? सवाल यह भी है कि कुछ राज्य खाद्य सुरक्षा कानून के दामों पर राशन देते हैं (रु. 2 प्रति किलो गेहूं और रु. 3 प्रति किलो चावल) लेकिन कुछ राज्य इसके ऊपर अपनी सब्सिडी देते हैं।

उदहारण के लिए, तमिलनाडु में चावल मुफ्त है, बिहार में रु. 3/किलो, ओडिशा में रु. 1/किलो। चेन्नई में काम कर रहे बिहारी मज़दूर को बिहार की तरह सेंट्रल रेट से दिया जाएगा या मुफ्त? फ्री दिया गया तो खर्च कौन उठाएगा, केंद्र या राज्य? राज्य सरकारों में समन्वय कैसे बैठाएंगे।
चौथी बात, राजस्थान में गेहूं ही देते हैं। बिहार, झारखण्ड, ओडिशा के मज़दूर चावल खाते हैं और उनके राज्यों में जन वितरण प्रणाली में चावल मिलता है। तो क्या इन मज़दूरों को राजस्थान में गेहूं से काम चलना होगा?

पांचवा मुद्दा राशन की सप्लाई से जुड़ा है। अभी की प्रणाली में हर राशन दुकान को तय मात्रा में राशन मिलता है। एक राशन दुकान से कितने राशन कार्ड और व्यक्ति जुड़े हुए हैं, उससे सप्लाई निर्धारित होती है। यदि दिल्ली की राशन दुकान पर राजस्थान का मज़दूर पहुंचता है तो डीलर के पास अपने कार्ड धारकों के लिए राशन घट जाएगा। क्या इसमें उनके साथ ठगी की जा सकती है (डीलर कह सकता है, ‘माल ख़तम हो गया’)? 
छठा मुद्दा है तकनीक का। तकनीकी रूप से यह संभव है, लेकिन इसकी व्यावहारिकता पर सवाल है। ओएनओआर के तकनीकी समाधान में आधार की अहम् भूमिका रहेगी। जिन राज्यों ने जन वितरण प्रणाली में आधार को जोड़ा है, वहां लोगों का नुकसान हुआ है। इसलिए संवेदनशील राज्य सरकारों ने कोरोना संकट के आते ही, राशन लेते समय आधार की अनिवार्यता हटा दी। क्या अब उस ही नुकसानदेह आधार-बॉयोमीट्रिक्स को, लोगों की मदद करने के नाम पर वापस लाया जाएगा?
वन नेशन वन राशन की घोषणा लोगों का दिल बहलाने के लिए और असली मुद्दे से ध्यान भटकाने के लिए बढ़िया उपाय है। इसकी वास्तविकता ऐसी हो सकती है कि आज जो जन वितरण प्रणाली देशभर में लोगों के लिए जीवनरेखा बनी हुई है, कल वह पटरी से न उतर जाए। 
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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