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पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम:जीने की राह: महामारी से लड़ने के लिए स्वरूप ज्ञान को पहचानें

10 महीने पहले
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पं. विजयशंकर मेहता - Dainik Bhaskar
पं. विजयशंकर मेहता

जिस बीमारी का कोई इलाज न हो, उसे महामारी बनना ही है। यदि चिकित्सा विज्ञान के पास उसका सीधा उपचार न हो तो क्या किया जाए? यह प्रश्न तब भी उठा था, जब रावण ने लक्ष्मणजी को ब्रह्मदेव की दी हुई कराल शक्ति मारी व लक्ष्मण मूर्छित हो गए थे।

राम जानते थे इसका दूसरा उपचार नहीं है, इसलिए उन्होंने लक्ष्मण को स्वरूप ज्ञान करवाया। यहां तुलसीदासजी ने लिखा-‘कह रघुबीर समुझु जियं भ्राता। तुम्ह कृतांत भच्छक सुर त्राता।।’ श्रीराम ने लक्ष्मणजी से कहा- हे भाई, हृदय में यह बात समझो कि तुम काल के भी भक्षक व देवताओं के रक्षक हो। काल स्वयं एक देव है, लेकिन उस समय वह रावण के वश में था। लक्ष्मण को काल का भक्षक इसलिए कहा गया कि तुम रावण को भयभीत कर सकते हो, देवताओं की रक्षा कर सकते हो।

हमारे भीतर जो तमोगुण है, जिससे कि कोरोना महामारी और बढ़ेगी, हमें उसका भक्षक बनना है और जो सतोगुण है, जिससे यह महामारी दूर होगी, उसकी रक्षा करना है। तब राम ने लक्ष्मण से जो कहा वह अब हमारे लिए बड़ा उपयोगी है। अपने स्वरूप ज्ञान को पहचानें। हम मनुष्यों के भीतर आज भी विविध रूपों में उतनी शक्ति है कि हम इस महामारी का मुकाबला कर सकते हैं, उसे हरा सकते हैं। सजगता, सावधानी, स्वच्छता ये सब इस शक्ति के ही रूप हैं।

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