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एन. रघुरामन का कॉलम:कभी-कभी, जब आप किसी चीज का त्याग करते हैं तो उसे खोते नहीं हैं, आप बस उसे किसी और को आनंद लेने के लिए दे देते हैं

10 दिन पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

तीन दिन पहले हम सभी को उप्र के मोदीनगर की सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट सौम्या पांडे के कर्तव्य के प्रति समर्पण के बारे में पता चला। वे बेटी को जन्म देने के 15 दिन बाद ही, बच्ची को गोद में लेकर नौकरी पर लौट आईं। यह घटना मुझे 50 साल पीछे ले गई, जब मेरे एक चाचा ने मेरी दादी की मर्जी के खिलाफ प्रेम विवाह किया था। तब मध्यमवर्गीय परिवार प्रेम विवाह को लेकर सहज नहीं थे। इसलिए जब उनसे शादी करने वाली मेरी चाची गर्भवती हुईं तो डिलिवरी से पहले और बाद में कुछ महीने मेरी मां ने उनकी देखभाल की। मेरी चाची अपने दम पर सफल महिला थीं और मोदीनगर की आईएएस अधिकारी की तरह सभी कामों में कुछ हटकर थीं। वे भी अनिवार्य मातृत्व अवकाश खत्म होने से पहले ही नौकरी पर लौट गई थींं।

वे काम के पहले दिन बच्चे को साथ ले जाना चाहती थीं, लेकिन मेरी मां ने अनुमति नहीं दी। जब तक कि उचित व्यवस्था नहीं हो गई, मां ने कुछ दिनों तक बच्चे की देखभाल की। चाची जब हमारे घर रहीं, तो मैंने महसूस किया कि उन जैसी मजबूत महिला भी प्रेम और मां स्वरूप (त्याग का स्वरूप) के आगे झुक सकती हैं। मेरी मां ने खुद को युवा मां और अजन्मे बच्चे के लिए समर्पित कर दिया।

हालांकि बतौर बच्चा, मुझे शुरुआत में चाची का आना अच्छा लगा, लेकिन मैं धीरे-धीरे चिढ़ने लगा क्योंकि मां का ध्यान मुझसे हट रहा था। कई बार, जो चीजें मुझे खाने में पसंद थीं, वे चाची को मिल जातीं। धीरे-धीरे मुझे अहसास हुआ कि मुझे मां का ध्यान और खाने की चीजें खोनी पड़ रही हैं। जब बच्चे को अस्पताल से मेरे घर लाया गया, तो घर का पूरा रुटीन अस्त-व्यस्त हो गया। खाने में जो भी बनता, उसे चाची और बच्चे की सेहत को ध्यान में रखकर बनाया जाता। जब मेरी मां को महसूस हुआ कि मैं नवजात के साथ कुछ अलग बर्ताव कर रहा हूं, तो उन्होंने पूछा, ‘तुम त्याग का मतलब समझते हो?’ मैंने कहा, ‘आपको वो नहीं मिलता जो आप चाहते हैं।’

उन्होंने न में सिर हिलाते हुए कहा, ‘गलत। त्याग कर तुम कुछ खोते नहीं हो। बल्कि तुम सिर्फ उसे किसी और को दे देते हो और उस व्यक्ति के चेहरे पर खुशी देखकर, तुम्हें भी खुशी मिलती है। यह ऐसा ही है कि दीवाली पर तुम पटाखे फोड़ते हो और हम सभी खुश होते हैं। मैं तुम्हारे पिताजी से कहूंगी कि वे तुम्हें दो दिन के लिए दादी के घर छोड़ आएं और फिर देखना वहां सभी कैसे तुम्हारे लिए ‘त्याग’ करते हैं।’केवल 6 घंटों में ही मुझे अहसास हुआ कि मेरी दादी, मेरे युवा चाचाओं की जगह मुझपर ज्यादा ध्यान दे रही हैं। मैं उसी रात घर लौट आया। चाची और नवजात के साथ मेरा व्यवहार बिल्कुल बदल गया था। मुझे 14 दिन के उस बच्चे पर प्यार आने लगा था।

यह दूसरी कहानी है कि वही चाची दूसरे बच्चे की डिलिवरी के लिए हमारे घर आईं और कुछ ही दिनों में उन्होंने मुझे पहले बच्चे की जिम्मेदारी संभालते देखा, जो उनके साथ ही आया था। चाची ने बाद में मेरी ओर इशारा करते हुए मां से कहा , ‘यह लड़का पूरी तरह बदल गया है, बहुत परिपक्व हो गया है।’ वे नहीं जानती थीं कि मैं इसीलिए बदला क्योंकि मुझे मां ने ‘त्याग’ का मतलब समझा दिया था, जो पैरेंटिंग की कला जानती थीं।

फंडा यह है कि कभी-कभी, जब आप किसी चीज का त्याग करते हैं तो उसे खोते नहीं हैं। आप बस उसे किसी और को आनंद लेने के लिए दे देते हैं।

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