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बदलाव:छोटे शहरों की अर्थव्यवस्था भी वर्क फ्रॉम होम से मजबूत हो सकती है

4 महीने पहले
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  • कंपनियों का खर्च कम होगा तो नए टैलेंट को मौका भी मिलेगा क्योंकि काम करने के लिए अब लोकेशन जरूरी नहीं रह जाएगी।

(हर्ष गोयनका, अध्यक्ष, आरपीजी समूह )  इस लॉकडाउन में शुरू हुए वर्क फ्रॉम होम से कई बदलाव आए हैं और आगे भी आएंगे। इससे लाइफस्टाइल से लेकर काम के तरीकों, नतीजों और कंपनियों में कई चीजें बदलेंगी। इससे पहले ही व्यायाम, कई रूपों में जैसे योग, ध्यान या जिम में कसरत के तौर पर दिनचर्या का हिस्सा बनने लगा है। जो हॉबीज पहले चीख-चीख कर समय मांगती थीं, उनके लिए अचानक काफी समय मिलने लगा है। लेकिन जो सबसे महत्वपूर्ण फायदा उभरकर आया है वो है परिवार के साथ बिताए जा रहे खुशनुमा पल, जिस पर हम पहले ध्यान नहीं दे पा रहे थे।

अपने बच्चों, माता-पिता, पति-पत्नी के लिए उपलब्ध होना आपके और उनके लिए कितना बड़ा ईनाम साबित हो सकता है, ये अब महसूस हो रहा है। वो संस्था जो इस परिस्थिति से उबरने के लिए बाध्य हो गई हैं, उनके लिए घर से काम करने की व्यवस्था एक अवसर भी बन रहा है। आज कंपनियां ऐसे भविष्य की कल्पना कर रही हैं, जिसमें फिजिकल इन्फ्रास्ट्रक्चर की जरूरत कम नजर आ रही है। जो थोड़ा बहुत ऑफिस-स्पेस इस्तेमाल किया भी जाएगा वो कर्मचारियों के लिए कॉमन होगा और रोटेशन के सिद्धांत पर काम करेगा। और इस तरीके से जल्द ही कई कंपनियों को यह अहसास हो जाएगा कि उनके पास जरूरत से ज्यादा रियल इस्टेट है, जिसे कम करके खर्च को कम किया जा सकता है। आईटी क्षेत्र में घर से काम करने की प्रथा से प्रति व्यक्ति उत्पादकता बढ़ गई है।

इतना ही नहीं, कंपनियां पूरी दुनिया से टैलेंट हायर कर सकती हैं। क्योंकि काम करने के लिए लोकेशन अब महत्वपूर्ण नहीं है। कर्मचारियों को भी इससे फायदा है क्योंकि अगर वो एक नौकरी छोड़कर दूसरी पकड़ते हैं तो उन्हें नया घर, बच्चों के लिए नया स्कूल, पत्नी के लिए नई नौकरी ढूंढने की जरूरत नहीं पड़ेगी। ये बड़ी ही मजेदार संभावना है क्योंकि कंपनियों में विविधता बढ़ाने में इस व्यवस्था से मदद मिलेगी। महिलाएं और अधिक संख्या में स्वावलंबी होने की कोशिश करेंगी। खासतौर पर ऐसी महिलाएं जो घर की जिम्मेदारियों की वजह से कॅरिअर का बलिदान देने पर मजबूर थीं। ऑफिस में लोगों की अनुपस्थिति कम हो जाएगी, लोगों का आत्मबल बढ़ा हुआ होगा क्योंकि वर्क-लाइफ बैलेंस बहुत बेहतर होगा।

यहां प्रश्न उठता है कि घर पर काम करने की व्यवस्था को पूरी तरह से अपनाने में क्या अड़चन है? कुछ कारण हैं। जैसे-व्यापार की सफलता के लिए आमने-सामने बैठकर की गई बात के फायदों को नजरअंदाज नहीं कर सकते है। जब लोग मिलते हैं तो आपसी घनिष्ठता बढ़ती है और इसकी मदद से कई सौदे तय होते हैं। आपके हावभाव (बॉडी लैंग्वेज) के आधार पर व्यक्तित्व का अनुमान लगा सकते हैं, जो व्यापार जगत में मानव संसाधन को पहचानने का महत्वपूर्ण तरीका है। जब आप कैमरे की मदद से मीटिंग करते हैं तो आपकी बॉडी लैंग्वेज समझना उतना आसान नहीं होता। वहीं जब तक टेक्नोलॉजी स्थिर नहीं हो जाती और त्रुटियों की संभावना नगण्य नहीं हो जाती, तब तक आप कैमरे से की गई मीटिंग्स पर बहुत भरोसा नहीं कर सकते क्योंकि कभी आवाज ठीक से नहीं पहुंचती तो कभी वीडियो लिंक फेल हो जाता है। ऐसे ही जब आप टेबल के इर्द-गिर्द बैठकर किसी विषय पर सामूहिक चर्चा करते हैं तो दिमाग में विचार अपने आप आने लगते हैं और आप बेझिझक व्यक्त भी कर पाते हैं जो कि अक्सर वीडियो कॉन्फ्रेंस में संभव नहीं हो पाता है। जैसे-जैसे घर से काम करने की परंपरा जड़ पकड़ती जाएगी, हमें उन बातों का ध्यान रखना होगा जो हमें करनी चाहिए और वो जो नहीं करनी चाहिए। हमें दिमाग में काम करने का स्विच (बटन) स्थापित करना होगा। ताकि घर पर रहते हुए काम के दौरान हम ऑफिस का माहौल महसूस कर सकें। कपड़ों का चुनाव इस दिशा में मददगार साबित हो सकता है। एक और महत्वपूर्ण बात ये सुनिश्चित करना है कि काम के समय में हम पूरी तरह से उपलब्ध हों यानी इस समय हम सो नहीं सकते क्योंकि ये एक खतरनाक लत का रूप ले सकता है।

ये भी जरूरी है कि हम अपने घर में एक खास जगह सुनिश्चित कर लें जिसे हम अपना कार्यालय मान सकें। इसके लिए हम पेपर, नोटपैड, प्रिंटर, ऑफिस की कुर्सी और टेबल को ऐसे जमा सकते हैं ताकि वो हमारा दफ्तर दिखे। इससे काम करना आसानी होगा और आपको काम के समय महसूस होगा कि आप ऑफिस में हैं। सामुदायिक तौर पर भी इस व्यवस्था के गहरे परिणाम होंगे। सबसे पहले तो सड़कों पर ट्रैफिक कम हो जाएगा जिससे वायु और ध्वनि प्रदूषण भी कम होगा। शहरों में भीड़ कम हो जाएगी और लोग ऐसी जगहों पर रहना पसंद करेंगे जो प्राकृतिक या ग्रामीण अंचलों में हो। इससे छोटे शहरों की अर्थव्यवस्था सशक्त होने लगेगी। एक महत्वपूर्ण बात ये भी है कि आज कुछ लोग ऐसे हैं जिनमें प्रतिभा तो बहुत है पर शारीरिक दिव्यांगता के कारण वे ऑफिस आ-जा नहीं सकते। इस नई व्यवस्था में ऐसी प्रतिभाओं का भी उपयोग हो पाएगा।

अंत में, हम पूरे तरीके से घर से काम करने की व्यवस्था को अपनाते हैं या नहीं, ये कंपनियों पर निर्भर करेगा क्योंकि ये उन्हें तय करना है कि कोविड-19 महामारी का प्रतिउत्तर वो कैसे देंगी और अपने क्षेत्र में बदलाव के लिए वे कितनी उत्सुक हैं। आईटी जैसे कुछ क्षेत्रों में ये व्यवस्था दिनचर्या बन जाएगी। आईटी सेक्टर के लीडर टीसीएस ने तो पहले ही घोषणा कर दी है कि 2025 तक 75% कर्मचारी घर से काम करेंगे। अन्य कई और कंपनियों को अपनी मानसिकता बदलने की जरूरत है। ये बदलाव इस पर भी निर्भर करेगा कि उनके क्षेत्र की प्रकृति और कंपनी की संस्कृति कैसी है। जब बराक ओबामा अमेरिका के राष्ट्रपति बने और व्हाइट हाउस पहुंचे तो उन्होंने कहा था- ‘सबसे अच्छी बात मेरे लिए ये है कि मुझे एक बड़ा अच्छा ऑफिस मिला जो मेरा घर भी है। दिन के अंत में मैं तब भी घर आ सकता हूं जब मेरे पास बहुत काम बचा हो। मैं अपने परिवार के साथ डिनर कर सकता हूं, बच्चों को होमवर्क करने में मदद कर सकता हूं औऱ उन्हें सुलाने के बाद अगर जरूरत पड़े तो मैं दोबारा अपने ऑफिस जा सकता हूं।’ हम भी ऐसा कर सकते हैं। (यह लेखक के अपने विचार हैं।)

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