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जयप्रकाश चौकसे का कॉलम:राजा वही जो प्रजा मन भाए, तमाशबीन अवाम खुश है और सभी को इस खुशी में शामिल होना चाहिए

15 दिन पहले
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जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक

भारत सरकार ने ओवर द टॉप ओ.टी.टी पर प्रस्तुत खबर और वेब सीरीज को सेंसरशिप के दायरे में लाने का कानून पास किया है। यह कैसे किया जाएगा यह अभी तय नहीं हो पाया है। ‘वायर’ खबर में व्यवस्था के निकम्मेपन का पर्दाफ़ाश किया जाता है। वेब सीरीज में अश्लील दृश्य होते हैं। मुद्दा यह है की अश्लील किसे करार दिया जा सकता है।

दुनियाभर की तमाम अदालतों में कभी ना कभी किसी किताब या फिल्म पर लगाए गए अश्लीलता के आरोपों को खारिज किया है। लेडी चैटर्ली और जेम्स जॉयस के उपन्यास ‘यूलिसिस’ पर प्रतिबंध लगाने की मांग खारिज हुई। मुकदमे में दोनों पक्षों की दलील सुनने के बाद जस्टिस ने फैसला दिया कि किसी भी रचना के एक अंश पर आपत्ति उठने का कोई अर्थ नहीं है। पूरी रचना के समग्र प्रभाव को जानना जरूरी है। क्या लेखक का उद्देश्य मात्र सनसनी फैलाकर पैसा कमाना है? लेखक का उद्देश्य और समग्र प्रभाव देखना आवश्यक है। जेम्स जॉयस के 800 पृष्ठ के उपन्यास में मात्र कुछ प्रश्नों पर तथाकथित आपत्तियां उठाई गई हैं।

भारत के कानून विधान में अश्लीलता को परिभाषित नहीं करते हुए यह संकेत दिया गया है कि इस शब्द के अर्थ के लिए अंग्रेजी भाषा की वेबस्टर डिक्शनरी III के पृष्ठ 1559 पर लिखा है कि तर्क के स्तर पर विद्रूप दिखने वाली सामग्री जो पाठक के मन में जुगुप्सा जगाए और नैतिक मूल्यों को नकारे तथा सनकीपन से भरी हो उसे अश्लील मान सकते हैं।

यह इंडियन पीनल कोड में सेक्शन 292, 293, और 294 के तहत आता है जैसा कि रतन लाल की कानून की किताब में वर्णित है। जज को विवादित किताब या फिल्म दो बार पढ़ना और देखना चाहिए। पहली बार लेखक या फ़िल्मकार के नजरिए से और दूसरी बार पाठक या दर्शक के नज़रिए से। फिल्म में एक निर्वस्त्र स्त्री को किस तरह पेश किया गया है यह समझना जरूरी है। क्या दृश्य जुगुप्सा जगाता है? इस प्रकरण में देखने वाले या पढ़ने वाले के मन में विकृत भावना का ज्वार उठता है?

इरविंग वैलेस के उपन्यास ‘सेवन मिनट्स’ में एक धनवान व्यक्ति के कमसिन उम्र के बेटे पर हिंसा का आरोप लगता है। सफाई पक्ष का वकील कहता है कि एक अश्लील किताब के पढ़ने के बाद उसने हिंसा की है। किताब का प्रकाशक कहता है कि वह लेखक को नहीं जानता। लंबे चले इस मुकदमे का जज ही इस किताब का लेखक है। लड़कपन में उस पर नपुंसकता का हव्वा सवार था और एक तवायफ ने उसे अपने दुलार से इस हव्वे से मुक्त कराया था। उसी अनुभव के आधार पर उसने यह किताब लिखी है।

फैसला देते समय जज यह सब बातें स्वीकार करता है ताकि किताब प्रतिबंधित नहीं की जा सके। इस तरह सिद्ध होता है कि लेखक का इरादा पैसे कमाने का नहीं था वरन वह यह अभिव्यक्त करना चाहता है कि नपुंसकता मनोवैज्ञानिक है जिसकी जड़ में भय है। इस विषय में रोम का चर्च हर वर्ष उन किताबों की सूची प्रकाशित करता है, जिन्हें देखने से बचना चाहिए। फतवा नहीं देते कि फलां फिल्म या किताब प्रतिबंधित की जाती है। हमारे खजुराहो जैसे मंदिरों में अंकित छवियां यौन शिक्षा का काम करती हैं। पाठ्यक्रम में एवं शिक्षा और फिल्म तथा किताब कैसे पढ़ना, देखना चाहिए विषय शामिल करना चाहिए। कुशल शिक्षकों के अभाव के कारण पूरी शिक्षा प्रणाली जर्जर हो चुकी है।

कानून बनाना और उसे क्रियान्वित करना दो अलग-अलग बातें हैं। ग़ौरतलब है कि महामारी, बेरोज़गारी, अंतरराष्ट्रीय बाजार में रुपए की कीमत में गिरावट तथा जीडीपी का माइनस 23 अंक तक गिर जाने जैसी समस्याओं के निदान का कोई काम नहीं किया जा रहा है। अनावश्यक बातों पर फोकस है। बात जाकर यहां रुकती है कि राजा वही जो प्रजा मन भाए। तमाशबीन अवाम खुश है और सभी को इस खुशी में शामिल होना चाहिए। दरअसल वैचारिक विरोध प्रतिबंधित है।

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