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जयप्रकाश चौकसे का कॉलम:महामारी संक्रमण ने वैश्विक मंदी की पृष्ठभूमि रच दी है; मौज-मस्ती गैंग से मुक्त होकर युवा प्रचार तंत्र के जादू से भी मुक्त होगा और समाजवाद के आदर्श पर लौटेगा

2 महीने पहले
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जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक

आ भास होता है कि युवा वर्ग की धुरी पर संसार घूम रहा है। युवा वर्ग की पसंद को बाजार ने भली-भांति समझ लिया है। हैरी पॉटर की किताबें व फिल्में सफलता के शिखर पर हैं। किशोर वर्ग की अलसभोर में चंपाई अंधेरा व सुरमई रोशनी झिलमिला रही है। यह जादुई खिलौना है, मिल जाए तो माटी, खो जाए तो सोना है।’ उम्रदराज लोगों की यादों में भी युवा वय के सपने बार-बार आते हैं। यहां तक कि कुछ उम्रदराज लोगों ने अपनी युवा वय की कुछ बातें अपनी कल्पना से गढ़ ली हैं। उन्होंने अपनी बंजर सी युवा वय रोमांच की हरियाली की कल्पना कर ली है व समय के साथ वे अपनी कल्पना को यथार्थ में घटित होता हुआ भी मान लेते हैं। अपने आपसे बार-बार बोला गया झूठ सच लगने लगता है। वैचारिक संकीर्णता के संसार में यही हो रहा है।

हिटलर के प्रचार मंत्री गोएबल ने झूठ तंत्र विकसित किया था। कभी-कभी युवा स्वप्न में स्वयं को सफेद घोड़े पर सवार देखता है। दुष्टों की कैद से सुंदर किशोरी को छुड़ाकर वह उसे साथ लेता है व घोड़ा उड़ने लगता है। स्वप्न के इस घोड़े पर चमड़े की जीन कसी हुई है। स्वप्न में भी उन्हें अपनी सुरक्षा का इतना ध्यान है कि जीन कसे हुए घोड़े पर बैठते हैं। कैफी आजमी का ‘हकीकत’ के लिए लिखा गया गीत, ‘वो जवानी जो खूं में नहाती नहीं’ वाला युवा आज नजर नहीं आता। आजकल तो बाजार में खुशबू की बोतलें खूब बिक रही हैं। उन दिनों एरिक सेगल का ‘लव-स्टोरी’ प्रकाशित हुआ था।

युवा टेक्नोलॉजी से प्रेम कर स्मार्ट मोबाइल, लैप-टॉप पर धमा चौकड़ी मचाता है। फिल्म ‘ए वेडनसडे’ में पुलिस को हैकर की सेवा लेकर अपराधी के ठिकाने को जानना जरूरी है। युवा हैकर कहता है कि पुलिस का कम्प्यूटर मॉडल बहुत पुराना है। इसे अटाले में फेंक देना चाहिए। उस युवा ने स्वेच्छा से कॉलेज छोड़ दिया है, उसे शिक्षा व्यवसाय सड़ी-गली लगती है। हैकर चंद मिनटों में पुलिस की समस्या का हल खोज लेता है।

दो पीढ़ियों की विचार-प्रणाली में अंतर होता है। जेनरेशन गैप पर बहुत विचार किया जा चुका है। वर्तमान में 3 वर्ष के अंतर से जन्मे भाईयों के विचार नहीं मिलते। जन्म में कुछ समय का अंतर भी विचार प्रणाली बदल देता है। स्मार्ट फोन के नए मॉडल बाजार में आ जाते हैं। रंग-बिरंगे स्मार्ट फोन इंद्रधनुष का आभास देते हैं।

राज कपूर कॉमिक्स पढ़ना पसंद करते थे, पात्र डॅगवुड का किशोर वय का बेटा प्रेम करता है। पिता डॅगवुड उसे समझाते हैं कि यह उम्र नहीं है प्यार की। इसी संवाद से राज कपूर ने ‘बॉबी’ फिल्म का आंकल्पन किया।

विठ्‌ठलभाई पटेल ने गीत रचा- ‘वो कहते हैं हमसे अभी उम्र नहीं है प्यार की, नादां हैं हम क्या जाने कब खिली बहार की, अभी उम्र नहीं है श्रृंगार की, यही रीत है संसार की।’ यह गीत कभी रिकॉर्ड नहीं किया गया। राज कपूर संजिदा पटकथा पर फिल्म नहीं बनाते थे। वे निरंतर बदलाव और सुधार करते हुए आगे बढ़ते थे। यह गीत राज कपूर की आवाज में ट्विटर हैंडल बॉबी टॉप सिनेमा पर उपलब्ध है। विट्‌ठलभाई के पुत्र संजय पटेल ने यह क्लिप उपलब्ध कराई है। ज्ञातव्य है कि यही गीत फिल्म ‘दरियादिल’ में लिया गया है।

राजेश रोशन और इंदीवर ने इसमें परिवर्तन किए हैं। वयस्क होने की उम्र को सरकार ने घटा दिया और चुनाव परिणाम में चमत्कार होने लगे। मौज-मस्ती मंत्र को जपने वाले युवा को इतिहास बोध नहीं है। वह वर्तमान में जीता है, विगत का मलाल नहीं, भविष्य की चिंता नहीं। युवा ऊर्जा, बाढ़ पर आई नदी की तरह फूल-सितारे तोड़कर किनारे पर कूड़ा करकट छोड़ रही है। उत्सव की नदी में बाढ़ बारहमासी नहीं होती।

महामारी संक्रमण ने आने वाली वैश्विक मंदी की पृष्ठभूमि रच दी है। मौज -मस्ती गैंग, हैंग ओवर से मुक्त होकर युवा प्रचार तंत्र के जादू से भी मुक्त होगा और समाजवाद के आदर्श पर लौटेगा। वह सुबह कभी तो आएगी, वह सुबह युवा वर्ग ही लाएगा।

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