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विराग गुप्ता का कॉलम:न्यू इंडिया का सपना साकार करने के लिए संविधान दिवस पर मंथन के साथ कुछ आवश्यक संकल्प भी लें

2 महीने पहले
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विराग गुप्ता, सुप्रीम कोर्ट के वकील - Dainik Bhaskar
विराग गुप्ता, सुप्रीम कोर्ट के वकील

संविधान दिवस पर डॉ. आंबेडकर के साथ राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की भारत भारती का स्मरण स्वाभाविक है। आज़ादी के 35 साल पहले गुप्त जी ने कहा था, ‘हम कौन थे, क्या हो गए हैं और क्या होंगे अभी, आओ विचारे आज मिलकर, यह समस्याएं सभी।’ आधुनिक विश्व में सबसे पुरानी संवैधानिक व्यवस्था वाले अमेरिका में हारने के बावजूद ट्रम्प द्वारा जैसी ढिठाई हो रही है, उसकी तुलना में भारत की तस्वीर शालीन और सफल नज़र आती है। लेकिन आर्थिक सुधार, फिर कम्प्यूटर क्रांति और अब कोरोना संकट के बाद डिजिटल के दौर में भारत की 70 साल पुरानी संवैधानिक व्यवस्था चुकी हुई सी दिखती है।

हम पिछले एक हफ्ते की कुछ घटनाओं से भारत की संवैधानिक व्यवस्था की विफलता के चार बड़े पहलू समझ सकते हंै। उत्तर प्रदेश में लव जिहाद व केरल में आपत्तिजनक कंटेंट रोकने के लिए बने अध्यादेशों से साफ़ है कि सभी दलों की सरकारों को, क़ानून से ज्यादा पुलिसिया डंडे पर भरोसा है। महाराष्ट्र में कंगना रनौत के खिलाफ राजद्रोह का मामला दर्ज करने पर जस्टिस शिंदे ने सवाल किया कि हम अपने ही देश के नागरिकों के साथ ऐसा व्यवहार क्यों कर रहे हैं? सिविल मामलों में पुलिस को गिरफ्तारी का अधिकार देने और गैर जमानती बनाने के बढ़ते चलन से उन संवैधानिक अधिकारों का हनन होता है, जिन्हें संविधान निर्माताओं ने सबसे बहुमूल्य बताया था।

समस्या का दूसरा पहलू है राज्यों में बन रहे मनमाने क़ानून। राष्ट्रीय स्तर पर क़ानून बनें तो ‘एक देश, एक क़ानून’ का नारा साकार होने के साथ ‘ईज ऑफ़ डूइंग बिज़नेस’ भी बढ़े। लेकिन दु:खद यह है कि कई सालों से देश में विधि आयोग ही नहीं है। राज्यों में विधानसभा की बजाय अध्यादेश की आपातकालीन शक्तियों के इस्तेमाल से क़ानून बनना भी दुर्भाग्यपूर्ण है। क़ानून दो कसौटी पर खरा होना चाहिए। पहला वह विभेदकारी नहीं हो और दूसरा उसे लागू करने की समुचित व्यवस्था बने। न्यायशास्त्र की इन बातों का ध्यान नहीं रखने की वजह से केरल सरकार को दो दिन के भीतर अध्यादेश वापस लेना पड़ा और अन्य राज्यों के लव जिहाद के कानूनी मामले अब अदालतों का बोझ ही बढ़ाएंगे।

समस्या का तीसरा पहलू है, पुलिस, प्रशासन व न्यायिक व्यवस्था की विफलता, जिन्हें स्कूल की किताबों में संविधान का स्तंभ बताते हैंै। टेढ़ी और नाकारा प्रशासनिक व्यवस्था से जनता से ज्यादा सरकारें परेशान हैं, जिसकी झलक केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी के बयानों में दिखती है। जुगाड़ के शॉर्टकट्स का प्रचलन संवैधानिक व्यवस्था के लिए डेथ वारंट है। ब्रिटिश कालीन मानसिकता से लैस न्यायिक व्यवस्था व सैकड़ों साल पुराने कानूनों के झुरमुट के कारण क़ानून के शासन का राजमार्ग लगभग ठप्प-सा हो गया है। क़ानून के राजमार्ग को गवर्नेंस के दीर्घकालिक एजेंडे से ठीक करने की बजाय वोट बैंक और लुभावन पॉलिटिक्स वाली सरकारें, शॉर्टकट समाधान पेश कर रही हैं। शायद ऐसे मौकों के लिए ही ग़ालिब ने कहा था, ‘ग़ालिब ताउम्र यह भूल करता रहा, धूल चेहरे पर थी, आईना साफ करता रहा’।

समस्या का चौथा पहलू है, डिजिटल के भस्मासुर के आगे संविधान के सभी स्तंभों के समर्पण से बेमानी हो रही संवैधानिक व्यवस्था। इसे ऐसे समझें। वर्षों पहले जब स्कूटर और कार की नई तकनीक आई तो संसद और सरकारों ने कई कानून व नियम बनाए। गाड़ियों का रजिस्ट्रेशन, ड्राइविंग लाइसेंस, रोड टैक्स, वाहनों से पैदल यात्रियों की सुरक्षा के लिए बीमा, दुर्घटना पर मुआवजा और दंड, सहयात्री की सुरक्षा के लिए सीट बेल्ट, गाड़ियों में यात्रियों और वजन की अधिकतम सीमा जैसे कई नियम-कानून बनाए।

संविधान जब बना उस समय न मोबाइल था, न ही इंटरनेट। संविधान के 70 साल बाद पूरा भारत ई-कॉमर्स, सोशल मीडिया, ऑनलाइन गेमिंग, आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस और डिजिटल के आगोश में समा गया है। सरकारी विफलता का नवीनतम उदाहरण ऑनलाइन गेमिंग सेक्टर पर विज्ञापन की नई गाइडलाइन्स हैं। कोरोना और लॉकडाउन में बच्चे किताबों से ज्यादा ऑनलाइन गेमिंग में मशगूल हैं, जो समाज के साथ अर्थव्यवस्था के लिए खतरनाक है। गेमिंग कंपनियों के रजिस्ट्रेशन व उनसे टैक्स वसूली की बजाय, एक स्वायत्त संस्था के माध्यम से विज्ञापन की गाइडलाइंस जारी करवाने का क्या महत्व है?

केंद्र सरकार ने आपातकालीन शक्तियों के तहत तीसरे राउंड में 43 चीनी ऐप्स के खिलाफ प्रतिबंध लगाया है। लेकिन पिछले दोनों राउंड के प्रतिबंधों के लिए अभी तक नियमित आदेश जारी नहीं किए गए। भ्रष्टाचार और कुशासन के लिए पिछली 70 साल की सरकारों को भले ही कोसा जाए, लेकिन डिजिटल की व्यवस्था को नियमित करने में विफल रहने के लिए तो वर्तमान सरकारों को ही जवाबदेही लेना होगी। रातोंरात अध्यादेश लाने वालीं सरकारें डिजिटल के आगे बौनी क्यों हो रही हैं? संविधान दिवस पर सभी मिलकर इस पर मंथन करें तो संवैधानिक व्यवस्था का राजमार्ग सुगम होने के साथ न्यू इंडिया का स्वप्न भी साकार हो सकेगा।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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