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पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम:जीत किसी एक के परिश्रम का परिणाम नहीं होती, यह मिला-जुला पराक्रम होता है

16 दिन पहले
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पं. विजयशंकर मेहता

थका हुआ शरीर पुरानी नाव जैसा होता है। नाव जितनी पुरानी होगी, दरिया के खतरे उतने बढ़ते हैं। नाव का सबसे बड़ा खतरा है उसमें छेद हो जाना। लगातार पानी में रहने से लकड़ी कमजोर हो जाती है और वहीं से पानी नाव के भीतर आने लगता है। मनुष्य का शरीर जब थक जाए तो उसमें भी पुरानी नाव की तरह खतरे उतर आते हैं। इसलिए कितने ही बलशाली हों, इस शरीर को समय-समय पर विश्राम देते रहिए।

नेतृत्व करने वाले का एक गुण यह भी होता है कि अपने साथियों को विश्राम देता रहे। रावण से युद्ध के अंतिम चरण में राम जान चुके थे मेरे वानर थक चुके हैं और ऐसी थकी अवस्था में युद्ध करेंगे तो इनका भी नुकसान है और हमारी विजय पराजय में बदल सकती है। यहां श्रीराम ने जो किया, उस पर तुलसीदासजी लिखते हैं- ‘बहुरि राम सब तन चितइ बोले बचन गंभीर। द्वंद्वजुद्ध देखहु सकल श्रमित भए अति बीर।।

सबकी ओर देखते हुए गंभीरता से रामजी ने कहा- वीरो, तुम सब बहुत थक गए हो, इसलिए विश्राम करो और रावण से मेरा युद्ध देखो। यही कुशल नेतृत्व की विशेषता है। जब साथी लड़ रहे हों तो अपनी ऊर्जा बचाएं और जब वे थक जाएं तब अपनी ऊर्जा को उजागर करें। जीत किसी एक के परिश्रम का परिणाम नहीं होती, यह मिला-जुला पराक्रम होता है।

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