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मुकेश माथुर का कॉलम:समाज के बीच आकर अपनी बौद्धिक चमक कब बिखेरेंगे हमारे नायक, अब समझना होगा कि सितारों के आगे जहां और भी है

16 दिन पहले
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मुकेश माथुर, एडिटर, दैनिक भास्कर इंदौर

कोरोना, कंगना और सुशांत केस। तीनों ने मिलकर बॉलीवुड के मिथक तोड़ दिए हैं। सबसे बड़ा मिथक खुद वे शीर्ष सितारे, जिन्हें हमने सिर-आंखों पर बैठा रखा था। सब खंडित हो गए। मैं यहां नेपोटिज्म की बात नहीं कर रहा। बात उनके रक्षात्मक बने रहने की है। जिन करोड़ों प्रशंसकों की बदौलत वे आज शीर्ष पर हैं, उनकी जिंदगी इधर से उधर हो जाए, इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। वे बस एक ब्लॉकबस्टर फिल्म ही हैं। हमारी गलती कि हम उन्हें असली नायक मान बैठे।

नए सिरे से गढ़ी जा रही सितारों की पांच श्रेणियों में ये सबसे पहले हैं। हम इन्हें आदर्श मानते हैं और इनके कहे-किए का हमारे ऊपर गहरा असर होता है। इनकी अपील, आह्वान, आंदोलन वह बदलाव ला सकता है, जो राजनेता और धर्मगुरु के किए से नहीं हो सकता। लेकिन ये ऐसा नहीं करते। देश में रहते हैं, लेकिन देश, देशवासियों काे प्रभावित करने वाले हर मुद्दे पर चुप रहते हैं। क्या पता किस बोली हुई बात से ब्रांड और बैलेंस शीट ऊपर-नीचे हो जाए। खतरा मोल नहीं लेते।

इन्होंने अपने परिवार और दोस्तों का होना ही स्वीकार किया। प्रशंसकों को कभी परिवार नहीं माना। न समाज को जिम्मेदारी। ये इतनी सुरक्षित गली पकड़ते हैं कि क्रिकेटर की चोट पर चिंता जताने और समकक्षों को फिल्म की बधाई देने से आगे ही नहीं बढ़ पाते। जिंदगीभर इनको पूजने वाले कई ‘अमर, अकबर, एंथोनी’ की नौकरी चली जाती है, किसी ‘फैन’ की लिंचिंग हो जाती है, किसी विजय दीनानाथ चौहान का कारोबार तबाह हो जाता है। ये निरपेक्ष भाव से जीते रहते हैं। यह इनका अधिकार है। लेकिन यह आदर्श तरीका नहीं है।

अमेरिका में जस्टिन बीबर, निओमी स्कॉट से लेकर कितने सितारे ब्लैक लाइफ मेटर मुद्दे पर मुखर थे और हॉलीवुड में यह आज की बात नहीं है। सिंगर-एक्टर हैरी बेलाफोंट ने श्वेत-अश्वेत बच्चों को साथ पढ़ाने की 1950 के दशक में मुहिम छेड़ी थी। विली नेल्सन। इराक युद्ध के मामले में जॉर्ज बुश की सीधी खिलाफत करने वाले। उन्होंने गाना लिखा-

दुनिया में बहुत सारी चीजें चल रही हैं, शिशु मर रहे हैं, माताएं रो रही हैं एक इंसान की जिंदगी की कीमत कितना ‘तेल’?

ऐसा हमारे यहां नहीं हो सकता। सितारे चुप हैं। जो बोल रहे हैं, वह दूसरी श्रेणी के वे कलाकार हैं, जिनके लिए ‘बोलना मतलब बने रहना’ है। इनके पास खोने के लिए कुछ नहीं है। अनुराग कश्यप, स्वरा भास्कर, अनुपम खेर...। तीसरी श्रेणी के सितारे हम सब पर बोझ हैं। वे लोग जो मुद्दों पर बोले, चुनाव लड़े और जीत के बाद लुप्त हो गए।

कंगना और अक्षय जैसों की चौथी श्रेणी भी है, जो मुख्यधारा केे कलाकार होते हुए भी बोलना चुनते हैं। वे अपनी राजनीतिक विचारधारा को दर्शाने से भी नहीं चूकते। पांचवें और सबसे दुर्लभ खाके में फिट फिलहाल एक ही नाम है सोनू सूद। उन्होंने लाइट, कैमरा, एक्शन की देहरी पार कर आम आदमी की खुरदरी जमीन पर कदम रखने की हिम्मत दिखाई है।

शीर्ष सितारों के साथ कोरोना काल ने यह भी किया कि परदे पर उनकी आभासी छवि, जिसे हम सेलिब्रेट करते थे, वह बंद मल्टीप्लेक्स में जंग खाने लगी है। रही-सही कसर ओटीटी प्लेटफॉर्म ने पूरी कर दी। वहां नए सितारे चमक रहे हैं। दर्शकों की नई पीढ़ी उसी माध्यम से चिपकी हुई है। मुख्य सितारों का कल खतरे में है। वे सब कुछ पा चुके। अब सार्वजनिक जीवन में साहस का एक कदम रख सकते हैं। दुनिया और जिंदगियां बदलने की शुरुआत करने के लिए यह सबसे सही वक्त है।

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