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एन. रघुरामन का कॉलम:जब आप दिल से जवान रहते हैं, तो शरीर में भी बदलाव आते हैं और इसे वैज्ञानिक भी साबित कर चुके हैं

10 दिन पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar
एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

इस रविवार, सुबह वॉक के दौरान मैंने एक दंपती को देखा, जो शायद 70 वर्ष से ज्यादा उम्र के थे और प्रेम में थे। चूंकि पवई लेक के किनारे तब सन्नाटा था, इसलिए मैं उनकी बातें सुन सकता था। महिला बोली, ‘याद है, हमने 1979 में अपने अंकल के घर क्या किया था।’ इसपर पुरुष बोले, ‘हां, याद है और हम खूब हंसे थे, जब हमने एक दंपती को एफिल टॉवर के सामने वैसा ही करते देखा था।’ वे दोनों थोड़ा जोर से हंसे, जिसने आस-पास के लोगों का ध्यान खींचा। पर दोनों परेशान नहीं हुए। वे एक-दूसरे का हाथ पकड़कर चले गए। एक पल के लिए मैं उनकी इस उम्र में केमिस्ट्री के बारे में सोचने लगा।

इस केमिस्ट्री को देख मुझे टूथपेस्ट का वह विज्ञापन याद आया, जिसका निर्देशन बॉलीवुड डायरेक्टर विक्रमादित्य मोटवानी ने किया है। उन्होंने एक बुजुर्ग महिला की कहानी दिखाई है, जिन्होंने लॉकडाउन के दौरान बहुत अकेला महसूस करने के बाद अपनी ज़िंदगी की कमान खुद संभाली और साथी तलाशने का फैसला लिया। कहानी उनकी रुकावटों और सामाजिक धारणाओं के डर के अनुभव बताती है और फिर हमें लॉकडाउन के बाद की उनकी जिंदगी का महत्वपूर्ण पल देखने मिलता है, जहां वे आशा और आत्मविश्वास के साथ नई शुरुआत को अपनाते हुए अपने नए साथी का परिचय करीबियों से कराती हैं।

ऐसा ही अहसास मुझे तमिल फिल्म ‘पुथम पुढु कालई’ (नई-नई सुबह) देखते हुए हुआ, जो ओटीटी प्लेटफॉर्म पर 16 अक्टूबर 2020 को रिलीज हुई। यह दो बुजुर्गों की कहानी है, जो लॉकडॉउन के दौरान फिर प्यार खोजते हैं। निर्देशक कहते हैं कि जब कोई उम्र की परवाह किए बिना प्रेम करता है, तो वह युवा और ऊर्जावान हो जाता है। जब कोई प्रेम में होता है तो इन किरदारों जैसा महसूस करता है। संदेश यह है कि जब आप प्रेम करते हैं तो वह सब करें, जो जवानी में करते थे और जैसा करना आपने खुद को बूढ़ा महसूस करने के बाद बंद कर दिया था।

मैंने स्कूल के दोस्तों के साथ फिल्म की चर्चा करते हुए पुरानी कहावत कही कि ‘आप उतने ही बूढ़े होते हैं, जितना महसूस करते हैं।’ तब एक दोस्त ने मुझे हार्वर्ड सायकोलॉजी प्रोफेसर एलन लैंगर की किताब ‘काउंटरक्लॉकवाइज- माइंडफुल हेल्थ एंड द पॉवर ऑफ पॉसीबिलिटी’ के बारे में बताया। वे बताती हैं कि यह कहावत कितनी सही है।

लैंगर ने जीवनभर नियंत्रण के भ्रम, उम्र बढ़ना, फैसला लेना और सचेत रहने के सिद्धांत पर काम किया। उनके 200 शोध लेख प्रकाशित हुए हैं। 1979 में आयुवृद्धि के अध्ययन ने उनका कॅरिअर स्थापित किया और किताब का शीर्षक यहीं से मिला। इस अध्ययन में बुजुर्ग पुरुषों के एक प्रायोगिक समूह को एक हफ्ते रिट्रीट में ले जाया गया, जहां 1959 की दुनिया बनाई गई थी। वहां की सभी बातें, फिल्में, सजावट, संगीत, घटनाक्रम, तस्वीरें, अखबार, किताबें आदि ऐसे रखे गए थे, जैसे वे वास्तव में 1959 में हों। उनके साथ युवाओं जैसा व्यवहार किया गया, उन्हें मदद नहीं दी गई, जबकि कईयों को चलने तक में समस्या थी।

चारों तरफ उनकी जवानी की तस्वीरें थीं और कहीं आईना नहीं था। एक हफ्ते में ही आकस्मिक परिवर्तन दिखे। समूह में जोड़ों के लचीलेपन में सुधार दिखा, आर्थराइटिस ठीक हो गया और उंगलियां ज्यादा सीधी हो गईं और उनमें तेजी नजर आई। बुद्धिमत्ता के परीक्षण में भी उनके बेहतर अंक आए। हमें हमारा शरीर नहीं, बल्कि शारीरिक सीमाओं के बारे में हमारी सोच रोकती है। लैंगर ने चर्चा की कि हम अक्सर बिना सोचे-समझे सीमाएं स्वीकार लेते हैं और सेहत तथा जीवन के अन्य पहलुओं पर नियंत्रण खो देते हैं। इससे हमारी पसंद सीमित हो जाती है, सफलता के मौके कम होते हैं और दायरा छोटा होता जाता है।

फंडा यह है कि जब आप दिल से जवान रहते हैं, तो शरीर में भी बदलाव आते हैं और इसे वैज्ञानिक भी साबित कर चुके हैं।

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