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नवनीत गुर्जर का कॉलम:बहरी सरकार को किलकारी और चीख का अंतर समझ में नहीं आता

16 दिन पहले
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नवनीत गुर्जर, नेशनल एडिटर, दैनिक भास्कर - Dainik Bhaskar
नवनीत गुर्जर, नेशनल एडिटर, दैनिक भास्कर

पिछले कुछ सालों से राष्ट्र- जीवन, अकल्पनीय और अनिश्चित होता जा रहा है। कहना कठिन है कि इस सदी में जारी इस बिलोने से अमृत अधिक निकलेगा या विष। यह भी कि इसे किसी संग्राम का अंत मानें या आरंभ। समाज-जीवन का हर अंग इस आलोड़न- विलोड़न से थरथरा रहा है। यकीनन पिछले दस-बीस सालों में आत्मघाती जातिवाद, विभाजक संप्रदायवाद और लज्जाहीन भ्रष्टाचार, राजनीति की पहचान बन गए।

अर्थव्यवस्था भूमंडलीकरण के भंवर में हिचकोले खाती रही और समृद्धि, सुख-चैन, गरीब के गांव से काफी दूर चले गए। बाजारीकरण, उद्योग-व्यवसाय का ही नहीं अपितु कला, मनोरंजन, मनोविनोद और साहित्य जैसे जीवन के कोमल- सुंदर पहलुओं का भी मूलमंत्र बन गया। उदारीकरण की सद्इच्छाओं को घोटालों की बुरी नज़र लग गई। राजनीति के शिखर पुरुष, लोगों के दिलों की बजाय सत्ता के दलालों की काली और वकीलों की लाल डायरियों में जगह बनाने लगे। राजनीतिक- प्रशासनिक तंत्र अराजक हो उठा और सामाजिक ताने-बाने के तार-तार होने की नौबत आ गई।

ताज़ा घटनाक्रमों को देखें तो सरकारें नाम की रह गईं और चंद उद्योगपतियों ने उन्हें अवैध तरीके से गोद ले लिया है। नाम सरकारों के होते हैं और निर्णय या फैसले उद्योगपतियों के। गरीब जनता, किसान और बचे-खुचे आम आदमी समझ ही नहीं पाते कि निर्णय उनके पक्ष में लिए जा रहे हैं या विरोध में। इनसे उनका भला होने वाला है या नहीं? अगर किसी को यह इल्हाम हो जाए कि सरकार का अमुक फ़ैसला उसके खिलाफ है तो सबसे पहले उसे देशद्रोही करार दिया जाता है।

इतने पर भी उसकी आवाज़ न दबे तो इनकम टैक्स, ईडी जैसे पहरेदार (इसका वास्तविक किंतु असल रूप न लिखने के लिए माफ़ी सहित) पीछे छोड़ दिए जाते हैं। दरअसल, आजादी को अगर सूरज माना जाए तो अंग्रेज शासन हमारे लिए अंधेरे की लंबी चिनाब (नदी) थी जिसे सैकड़ों मुसीबतों, हज़ारों दिक्कतों और लाखों थपेड़ों के बावजूद तैरकर पार करना पड़ा था क्योंकि सूरज उस पार था। लेकिन आज़ादी के इतने साल बाद लगता है सूरज ठिठककर फिर उस पार चला गया है और अंधेरे की लंबी चिनाब एक बार फिर हमें पार करनी है।

खुशियों और दम्भ की रोशनी में नहाती दिल्ली की तमाम सीमाओं पर बारिश के डरावने छींटों के बीच शीतलहर और कड़कड़ाती ठंड में मरते किसान सही मायनों में अपनी आजादी की खातिर ही लड़ रहे हैं। अंधेरे की लंबी चिनाब उन्हें भी पार करनी है क्योंकि उनकी आजादी का सूरज चिनाब के उस पार है। बहरी सरकार को किलकारी और चीख का अंतर समझ में नहीं आता। ठीक है किसान बिल वापसी की अंधी मांग पर अड़े हुए हैं लेकिन एमएसपी की अनिवार्यता की उनकी मांग तो सौ प्रतिशत सही है, इससे सरकार को गुरेज़ क्यों है?

बिल वापसी वैसे भी कांग्रेस का एजेंडा हो सकता है। किसानों को तो यह चाहिए कि उनका भला हो, ऐसे नियम लागू होने चाहिए। एमएसपी की अनिवार्यता इनमें सबसे प्रमुख है। वह हर हाल में पूरी होनी चाहिए। लेकिन सरकार को न जाने उद्योगपतियों ने कितना दबा रखा है कि उसकी आवाज़ तक निकल नहीं पा रही है। ऐसी सरकारों से तो बिन सरकार भले!

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