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नवनीत गुर्जर का कॉलम:राजा के खिलाफ मुंह खोले कौन? बोले कौन?

16 दिन पहले
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नवनीत गुर्जर, नेशनल एडिटर, दैनिक भास्कर

कोलकाता के पास हुगली के गंदे किनारे कुछ बूचड़ बैठे रहते हैं। पानी से कुछ दूरी पर ये एक विशालकाय कछुआ पाले रहते हैं। ग्राहक के आते ही बलपूर्वक कछुए को उलट दिया जाता है और मांग के अनुसार उसके शरीर का हिस्सा काटकर तराज़ू पर तौल दिया जाता है। कितनी सख्त होती है उसकी पीठ। इतनी ज़िद्दी और कठोर, कि बंदूक़ की गोली भी टकराकर लौट जाए।

वही अपनी शरीर के नाजुक अंगों को कटते हुए और तराज़ू में तुलते हुए देखता है। उसे आजादी है तो सिर्फ इतनी, कि लंगड़ी तिलमिलाहट के साथ घुटने- घुटने पानी तक जाकर अपने घाव भर धो ले, बस। क्योंकि इसके आगे बूचड़ अपना जाल डाले रहते हैं। कोरोना ने आज लोगों की हालत ऐसी ही कर दी है। घूमने, फिरने की आजादी तो छिन ही गई। मनपसंद खान-पान भी दूर हो गया। इसमें ये ज्यादा है। उसमें वो कम है। इससे इम्यूनिटी (प्रतिरोधक क्षमता) घटती है। उससे मेटाबॉलिज़्म (जठराग्नि) ख़राब होता है। कई तरह की बंदिशें। नई तरह के प्रतिबंध और जाने क्या- क्या?

एक तरफ़ नए नए शिगूफ़ा छोड़े जा रहे हैं - ये वैक्सीन दिसंबर में आ जाएगी। वो जनवरी तक। अप्रैल तक तो सब को मिल ही जाएगी। साथ में कुछ खबरें डराने वाली भी। कहा जा रहा है- ठंड में फिर से कोरोना ज़ोर मारेगा। दिल्ली का हाल देखो। एक-एक दिन में दस-दस हज़ार मरीज़ आने लगे। आदमी बेचारा क्या करे? वैक्सीन की खबर से खुश हो या दोबारा आने वाली भयानकता से दुखी होता रहे?

आख़िर हम बिहार वाले नीतीश कुमार तो हैं नहीं कि दुख- सुख दोनों अवस्था में एक जैसे रहें। सत्तर सीटों में भी मुख्यमंत्री थे और अब 43 सीटों में भी वही जलवा ! हम सुशील मोदी भी नहीं हो सकते कि भाजपा कोटे से उपमुख्यमंत्री रहकर भी नीतीश कुमार के सबसे करीबी थे और अब जब अपनी ही भारतीय जनता पार्टी ने दूध में गिरी मक्खी की तरह सरकार से निकालकर बाहर फेंक दिया तब भी वही इज़्ज़त पा रहे हैं। शपथ लेते ही सातवीं बार के मुख्यमंत्री नीतीश जी ने कहा- सरकार में सुशील जी की कमी खलती रहेगी।

बेचारे तेजस्वी यादव की गाथा इस बार सबसे अलग रही। जिस सत्ता के लिए पूरे परिवार को पूरे चुनाव में अलग रखा, वही सत्ता आते आते दूर हो गई। सत्ता न हुई, कोरोना की वैक्सीन हो गई। पता ही नहीं चलता कब हाथ में आएगी। हाथ से याद आया- हर बार की तरह कांग्रेस में एक बार फिर पराजय के ठीकरे फोड़े जा रहे हैं। कांग्रेस नेतृत्व है, कि उसे कोई फ़र्क़ ही नहीं पड़ता। उल्टे, आवाज़ उठने वाले को ही दबा दिया जाता है।

पिछली बार ग़ुलाम नबी, चिट्ठी वार के अगुआ बने थे, तो उन्हें हासिए पर डाल दिया गया। इस बार कपिल सिब्बल की बारी लगती है। हालांकि सिब्बल साहब के पास अभी इतने केस पेंडिंग हैं कि उनसे कोई पंगा लेगा, ऐसा लगता नहीं। यही हिम्मत है जो कपिल सिब्बल को कहीं भी कूद पड़ने की आजादी देती है। वरना राजा के खिलाफ मुंह खोले कौन? बोले कौन?

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