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उपलब्धि:केरल की सफलता की कहानी पर केंद्र का ध्यान क्यों नहीं?

4 महीने पहलेलेखक: शशि थरूर
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  • विकेंद्रीकरण, पारदर्शिता, समतावाद व जवाबदेही की परंपरा से केरल कोरोना की लड़ाई में सबसे आगे

जब देश के 1.3 अरब लोग कोविड-19 महामारी से संघर्ष कर रहे हैं, ऐसे में देश के 28 में से एक राज्य सबसे ऊपर खड़ा है। केरल ने कोरोना वायरस के संक्रमण को जिस तरह से रोका है, उसकी अनेक लोग प्रशंसा कर रहे हैं आैर इसे जन स्वास्थ्य इमर्जेंसी से निपटने का ‘केरल मॉडल’ कहा जा रहा है। केरल पहला राज्य था, जिसने जनवरी के अंत में चीन के वुहान से लौटे एक मेडिकल छात्र के कोविड-19 से संक्रमित होने की जानकारी दी थी। जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 24 मार्च को देशव्यापी लॉकडाउन की घोषणा की, केरल में किसी भी अन्य प्रदेश की तुलना में कोरोना के सर्वाधिक मामले थे। आज यह जहां कोविड के मामलों में बहुत नीचे है, वहीं यहां पर ठीक होने वालों की संख्या बहुत अधिक है। यही नहीं, राज्य में कोविड से मरने वालों की दर भी देश में सबसे कम सिर्फ 0.53% है और उसने यह नियंत्रण लोगों को बिना कोई दिक्कत दिए किया है। केरल की सफलता का फॉर्मूला एकदम साफ है। जन स्वास्थ्य अधिकारियों ने व्यापक पैमाने पर जांच करके जल्द से जल्द मरीजों का पता लगाने को प्राथमिकता दी और संक्रमितों के संपर्क में आए लोगों का पता लगाने के साथ ही संक्रमितों को 28 दिन के लिए क्वारेंटाइन में रखा। 18 जनवरी को प्रारंभिक अलर्ट जारी करने के बाद प्रदेश के चारों अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्‌डों पर सभी आने वालों की स्क्रीनिंग शुरू की गई और संदिग्धों को तत्काल अस्पताल या क्वारेंटाइन में भेजा गया। 4 फरवरी को केरल ने कोविड को राज्य स्तरीय आपदा घोषित करके स्कूल बंद कर दिए, लोगों के जमा होने पर रोक लगा दी और मार्च के शुरू में ही लॉकडाउन लागू कर दिया। जब तक केंद्र सरकार ऐसा करती तब तक केरल 30,000 स्वास्थ्यकर्मियों को तैनात कर चुका था और दसियों हजार लोगों को क्वारेंटाइन कर चुका था।

कोविड-19 पर केरल की यह प्रतिक्रिया उस काम की वजह से संभव हुई, जो संकट से बहुत पहले ही किया जा चुका था। देश के राज्यों में केरल अनूठा है, जिसने स्वास्थ्य इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए पर्याप्त संसाधन आवंटित किए, गांव स्तर की संस्थाओं को फंडिंग व अधिकार दिए और एक ऐसा सामाजिक तंत्र विकसित किया, जो सामूहिकता और जन सहयोग को प्राथमिकता देता हो। देश में सर्वाधिक साक्षरता दर (94%) के अलावा केरल में जन्म दर कम, अधिक आयु, महिला सशक्तीकरण और गरीबों व सीमांत लोगों के लिए कल्याण योजनाएं हैं। इस संकट के दौरान केरल के पढ़े-लिखे लोगों ने भी जिम्मेदारी का परिचय दिया, सामुदायिक संचरण को सीमित किया, अधिकारियों का सहयोग करने के साथ ही जैसे ही जरूरत पड़ी इलाज की मांग की। यह संस्थागत और राजनीतिक संस्कृति किसी एक की नीति का परिणाम नहीं है। सामाजिक विकास के इस ढांचे को बनाने और अनेक सूचकांकों पर खुद को देश से आगे रखने में केरल ने कई पीढ़ियां खपाई हैं। कल्याण सिस्टम के साथ ही केरल में एक जीवंत सिविल सोसायटी, स्वतंत्र मीडिया और प्रतिस्पर्धी राजनीतिक तंत्र है।

यहां का सामाजिक लोकतंत्र कम्युनिस्टों और कांग्रेस के गठबंधनों वाली सरकारों के समय के साथ किए योगदान को प्रतिबिंबित करता है। विदेशी प्रेक्षक भी मानते हैं कि केरल में लोगों का संस्थानों और निर्वाचित प्रतिनिधियों में भरोसे का स्तर कहीं ऊंचा है। इसलिए केरल अन्य राज्यों की तुलना में प्रतिबंधों को अधिक मानवीय तरीके से लागू कर सका। जब होम क्वारेंटाइन के दौरान केरल के लोगों ने कहा कि उनके पास जरूरी सामान लाने वाला कोई नहीं है तो तत्काल पुलिस ने वह पहुंचाया, जिसकी उन्हें जरूरत थी। स्कूल बंद होने पर गरीबों को मिड-डे मील घर पर पहुंचाया गया। केंद्र के लॉकडाउन से पहले ही केरल जरूरतमंदों के लिए व्यापक पैकेज की घोषणा कर चुका था।

महिला स्वयंसेवी संगठन कुदुंबश्री ने लाॅकडाउन के पहले महीने में ही 20 लाख मास्क और 5000 लीटर सैनेटाइजर बनाकर राज्य सरकार के प्रयासों में मदद की। करीब 1200 सामुदायिक रसाेई स्थापित की गईं। कुदुंबश्री रोज तीन लाख लाेगों को भोजन करा रहा है। केरल ने कानून की बजाय लोगों की सहभागिता को प्राथमिकता दी। जब प्रवासी श्रमिक बेकाबू हुए तो उनको रहने व खाने की मुफ्त व्यवस्था की गई और एक ही जगह पर इंतजार करने को कहा गया।
केरल देश के सबसे घनी आबादी वाले प्रदेशों में है, इसलिए काेरोना के खिलाफ उसकी सफलता और भी अहम हो जाती है। यही नहीं इसकी 17 प्रतिशत जनसंख्या कहीं और रहती है, वे राज्य के खजाने में 35 फीसदी का योगदान करते हैं। यहां हर साल 10 लाख से अधिक पर्यटक आते हैं। केरल के सैकड़ों बच्चे विदेश में पढ़ते हैं। इससे यहां पर संक्रमण का खतरा और भी अधिक था, लेकिन केरल द्वारा इस संकट में उपलब्धि हासिल करने की वजह शासन के विकेंद्रीकरण, पारदर्शिता, समतावाद, नागरिक अधिकार, जनता का विश्वास और सरकार की जवाबदेही की परंपरा है। यह बाकी देश के लिए भी सबक है। केंद्र की बातों और काम को देखकर लगता है कि कोई भी सामने रखी सफलता की इस कहानी की ओर ध्यान नहीं दे रहा है।
(यह लेखक के अपने विचार हैं।)

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