मैनेजमेंट फंडा / शरीर को मशीन बनाकर की गई मेहनत कभी बेकार नहीं जाती

Work done by making the body machine never goes waste
X
Work done by making the body machine never goes waste

एन. रघुरामन

एन. रघुरामन

May 24, 2020, 06:52 AM IST

ची ता धरती का सबसे तेज जानवर है। लेकिन, विशेषज्ञ दावा करते हैं कि इंसान सहनशक्ति के मामले में भेड़ियों, चीतों और यहां तक कि घोड़ों को भी पीछे छोड़ सकते हैं। अगर आपको विश्वास नहीं है तो अलग-अलग जगहों के गरीबों की इन दो कहानियों से आपको इस दावे पर विश्वास हो जाएगा। 
पहली कहानी: अगर आप हरियाणा के सिकंदरपुर से बिहार के दरभंगा जाना चाहते हैं तो नेशनल हाईवे-27 के जरिये नई दिल्ली, आगरा, लखनऊ, गोरखपुर से होते हुए करीब 1388 किमी का सफर कार से करने पर आपको 23 घंटे लगेंगे। ऐसे में साइकिल पर पीछे एक ऐसे आदमी को बिठाकर रास्ता पार करने का फैसला लेना आसान नहीं है, जिसके घुटने में फ्रैक्चर है (जिसका मतलब है कि वह न तो पैडल मारने में मदद कर सकता है और न ही चढ़ाई पर पैदल चल सकता है)। 
पंद्रह वर्षीय लड़की ज्योति कुमारी ने यह फैसला लिया और अपने पिता मोहन पासवान के साथ एक बोतल पानी और एक बैग में कुछ सामान लेकर निकल पड़ी। तेज धूप में आठ दिन साइकिल चलाकर वह घर पहुंच गई। कई जगहों पर उनकी दयनीय स्थिति देखकर कुछ लोगों ने खाना और पानी देकर मदद की। उसकी कहानी तेजी से वायरल हुई, इतनी कि अमेरिकी राष्ट्रपति की बेटी इवांका ट्रम्प ने इस लड़की के साहस को सलाम करते हुए शुक्रवार को सोशल मीडिया पर लिखा- ‘सहनशक्ति का खूबसूरत कमाल’।
ज्योति अपने पिता के साथ हरियाणा में रहती थी, क्योंकि वे वहां ई-रिक्शा चलाकर कमाई करते थे, जबकि बाकी का परिवार बिहार में रहता है। एक हादसे के कारण उन्हें कुछ समय के लिए घर बैठना पड़ा और लॉकडाउन की वजह से यह समय बढ़ता गया। बचत खत्म हो गई। किराया न मिलने पर मकान मालिक ने घर खाली करने को कहा। उनके पास पैसे नहीं थे, बस एक सेकंड हैंड साइकिल थी, जो उन्होंने कुछ समय पहले 2000 रुपए में खरीदी थी। अच्छी बात यह थी कि ज्योति की मां आंगनवाड़ी कार्यकर्ता हैं, जिनकी कमाई से बिहार में घर चल रहा था। वहीं उसकी बड़ी बहन अपने पति के साथ मां की देखभाल के लिए गांव आ गई थी। जब बचत खत्म होने लगी और दो वक्त की रोटी मिलना भी मुश्किल होने लगा, तो ज्योति ने आवेग में लेकिन पूरी दृढ़ इच्छा से फैसला लिया कि वह पिता को साइकिल पर पीछे बैठाकर सड़क से घर जाएगी। 
उसे नहीं पता था कि आवेग में लिया गया यह फैसला उसे एक स्पोर्ट्स कॅरिअर दे सकता है। ‘द साइकिलिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया’ के अध्यक्ष ओंकार सिंह ने कहा है कि आठवीं कक्षा की छात्रा ज्योति अगर ट्रायल में पास होती है तो उसे नई दिल्ली के आईजीआई स्टेडियम कॉम्प्लेक्स की सर्व सुविधा संपन्न नेशनल साइकिलिंग एकेडमी में ट्रेनिंग के लिए चुना जाएगा। 
दूसरी कहानी: एक और उदाहरण है जो किसी के भी दिल को छू लेगा। यह बताता है कि कैसे मध्य प्रदेश के सतना जिले में मझगवां जनपद के तहत आने वाले बरहा मवान गांव के आदिवासी दंपति ने लॉकडाउन के दौरान एक कुआं खोद लिया। छोटू मवासी और उसकी पत्नी राजल्ली ने 20 दिन तक सुबह 6 से 11 बजे तक और दोपहर 3 से शाम 5 बजे तक हर रोज सात घंटे मेहनत की और वह पाया जो वे चाहते थे। उन्होंने ऐसा तब किया जब लॉकडाउन के कारण उनके पास कोई काम नहीं बचा। उन्होंने 4 मीटर गहरा और 3 मीटर चौड़ा यह कुआ अपनी जमीन पर नहीं, बल्कि पास की सरकारी जमीन पर खोदा है, क्योंकि गर्मियों के दौरान उनके क्षेत्र में पानी का संकट रहता है। हालांकि, दंपति द्वारा खोदे गए कुएं में पर्याप्त पानी था, फिर भी पंचायत सीईओ अशोक तिवारी ने इसे और गहरा करने का फैसला लिया है, ताकि ज्यादा पानी मिल सके। साथ ही वे इसे मनरेगा योजना के तहत उसमें अंदर पक्की बाउंड्री भी बनवाएंगे ताकि यह सभी ग्रामीणों के काम आ सके। 
फंडा यह है कि सहनशक्ति आपकी मेहनत से ज्यादा वापस लौटाती है। जैसे इसने ज्योति को कॅरिअर दिया और मवासी दंपति को पहचान दिलाई।

आज का राशिफल

पाएं अपना तीनों तरह का राशिफल, रोजाना