मोदी-शाह के नए हीरो मुगलों को खदेड़ने वाले सेनापति लचित:जीत का हुक्का पी रहा था मुगल कमांडर, तीन तरफ से घेरकर मारी गोली

13 दिन पहलेलेखक: शिवांकर द्विवेदी

1663 की बात है। असम के अहोम राजा जयध्वज मुगलों से बुरी तरह हार गए थे। उन्हें युद्ध हर्जाने के तौर पर 1 लाख रुपए, 82 हाथी, 675 बंदूकें और 1 हजार जहाज देना पड़ा। राजा जयध्वज को अपनी इकलौती बेटी और भतीजी को भी मुगल हरम में भेजना पड़ा। उस वक्त औरंगजेब का शासन था। इस हार और बेइज्जती से दुखी होकर जयध्वज ने मौत को गले लगा लिया।

इस घटना को 8 साल भी पूरे नहीं हुए थे। अहोम योद्धाओं ने मुगलों की विशाल सेना को हराकर बदला ले लिया। इस अहोम सेना के सेनापति थे लचित बरफुकन। आज 24 नवंबर को लचित की 400वीं जयंती है। असम सरकार दिल्ली के विज्ञान भवन में 'लचित दिवस' का जश्न मना रही है, जिसमें गृहमंत्री अमित शाह से लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक शामिल होंगे।

भास्कर एक्सप्लेनर में हम लचित बरफुकन और उनकी मुगलों से जंग की पूरी कहानी बता रहे हैं…

4 रुपए के लिए बंधुआ मजदूर थे लचित के पिता

मोमाई तामुली बोरबरुआ को 4 रुपए का कर्ज चुकाने के लिए बंधुआ मजदूर बनना पड़ा था। बाद में मोमाई के नेतृत्व क्षमता को देखते हुए अहोम साम्राज्य के दसवें राजा प्रताप सिंहा ने उन्हें अपना कमांडर इन चीफ बनाया। इसके बाद ये परिवार पूरी तरह से अपने राजा और अहोम के लिए समर्पित हो गया।

इन्हीं मोमाई के घर 24 नवंबर 1622 को लचित बरफुकन का जन्म हुआ। लचित भी अपने पिता के तरह ही एक बेहतरीन लीडर बने। अहोम साम्राज्य में उन्हें रॉयल अस्तबल का प्रभारी बनाया गया, लेकिन उनके युद्ध कौशल को देखते हुए कुछ ही दिनों में अहोम के 14वें शासक चक्रध्वज सिंह के स्पेशल गार्ड यूनिट में शामिल कर लिया गया।

लचित बरफुकन का इतिहास के पन्नों में कोई चित्र उपलब्ध नहीं है, लेकिन एक पुराने क्रॉनिकल में उनके बारे लिखा गया है- उनका चेहरा चौड़ा था, वो चन्द्रमा सा दिखाई पड़ता था। किसी के पास इतनी क्षमता नहीं थी कि वो उनके चेहरे को घूर सके।

मुगलों और अहोम साम्राज्य की शुरुआती लड़ाई

मुगलों के साथ अहोम साम्राज्य के संघर्ष की कहानी लचित के जन्म के छह साल पहले ही शुरू हो चुकी थी। 17वीं शताब्दी की शुरुआत में मुगलों ने पूर्वोत्तर के राज्यों पर हमला शुरू कर दिया था।

मुगलों की नजर इन राज्यों में मौजूद हाथी के दांत, लंबी काली मिर्च, गोल्ड डस्ट, कस्तूरी और लाख पर थी। ये सब मुगल दरबार में मूल्यवान वस्तुओं के तौर पर देखी जाती थीं। इसके साथ ही मुगल तिब्बत और चीन तक पहुंचने का रास्ता भी तलाश रहे थे।

मुगलों ने सबसे पहले पूर्वोत्तर के कोच साम्राज्य पर अपना कब्जा जमाया। ये साम्राज्य अहोम की सीमा से लगता था। मुगल व्यापारियों की करतूतों से सीमा में तनाव पैदा होने लगा था। अहोम के राजा प्रताप सिंह को मुगलिया व्यापारी रास नहीं आए और सन 1616 में अहोम नौसेना और मुगल सेना के बीच जोरदार भिड़ंत हुई।

इसे समधारा की लड़ाई के नाम से जाना जाता है, जिसे अहोम ने जीता। इस युद्ध में के बारे में मुगल सेनापति मिर्जा नाथन ने अपनी किताब बहारिस्तान-ए-घायली में लिखा- युद्ध में मुगलों के1700 लोग मारे गए, 3400 घायल हुए, 9 हजार लोगों को बंदी बना लिया गया।

इस युद्ध के बाद भी दोनों पक्षों के बीच संघर्ष नहीं रुका। 1618 में दोनों सेना एक बार फिर हाजो में आमने-सामने आ खड़ी हुई, लेकिन इस बार अहोम को हार मिली। इसके बाद संघर्ष और बढ़ा।

इसे देखते हुए 1639 में दोनों पक्षों ने एक संधि के तहत असम में अपनी सीमा तय की। ब्रम्हपुत्र नदी असम को दो भाग उत्तरकुल और दक्षिण कुल में बांटती थी। लंबाई के आधार पर इसके दो भाग थे, पश्चिमी और पूर्वी असम। संधि के बाद पश्चिमी असम जिसमें गुवाहटी भी शामिल था मुगलों के हाथों में चला गया।

अहोम राजा ने दोबारा छेड़ी मुगलों से लड़ाई

राजा प्रताप अपनी सेना को मजबूत करने में लग गए। प्रताप ने पड़ोसी राज्यों से अच्छे संबंध बनाए। पाइक सिस्टम को नए सिरे से खड़ा किया, सभी बेरोजगार युवाओं का इसके तहत रजिस्ट्रेशन कराया। सेना के बरबरूआ और बरफुकन नाम के दो नए पद भी बनाए। 1641 में उनकी मृत्यु हो गई।

इसके बाद जयध्वज सिंह साल 1648 में अहोम साम्राज्य के राजा बने। जयध्वज ने दिल्ली में शाहजहां के बेटों की बीच की लड़ाई का फायदा उठाते हुए मुगलों को असम से खदेड़ दिया और अपनी सीमा गुवाहटी तक फैला ली। यहां से एक बार फिर मुगलों और अहोम के बीच आर-पार की लड़ाई शुरू हुई।

मुगल बादशाह औरंगजेब ने बंगाल के सूबेदार मीर जुमला को गुवाहटी वापस लेने के लिए असम कूच करने का आदेश दिया। इसके बाद मीर जुमला ने अहोम के आंतरिक कलह का फायदा उठाते हुए सीहोम के सिमूलगढ़, समधारा और उसकी राजधानी गढ़गांव पर कब्जा कर लिया। मुगल इन तीन इलाकों से 82 हाथी, 3 लाख सोने-चांदी के सिक्के, 675 बंदूकें और 1000 जहाज कब्जे में लेते हैं।

राजा जयध्वज और मुगलों के बीच एक बार फिर युद्ध होता है। अहोम बुरी तरह हारते हैं। मीर जुमला के साथ 9 जनवरी 1663 को हुई गिलजारीघाट की संधि के तहत जयध्वज को अपनी बेटी और भतीजी को मुगल हरम में भेजना पड़ा। 1 लाख रुपए के साथ कई क्षेत्र गंवाने पड़े। बाकी अन्य भुगतान करने तक उनके मंत्रियों के बेटों को बंदी बना लिया गया।

इस हार और बेइज्जती से दुखी होकर जयध्वज ने मौत को गले लगा लिया। मरने से पहले उन्होंने अपने चचरे भाई और साम्राज्य के अगले उत्तराधिकारी चक्रध्वज सिंह से मुगलों से उनके अपमान का बदला और उन्हें असम से बाहर फेंकने का वचन लिया।

लचित बरफुकन ने संभाली कमान और पासा ही पलट दिया

चक्रध्वज सिंह ने इसके बाद मीर जुमला से मिली हार के बाद बिखरी हुई सेना को एकत्रित किया। नए किलों का निर्माण कराया। खाने और हथियारों का जखीरा जमा करवाना शुरू किया। चक्रध्वज ने इन सब के बीच लचित बरफुकन को अपना कमांडर इन चीफ बनाने का सबसे बड़ा फैसला लिया।

लचित बरफुकन ने कमांडर बनते ही सेना में जान फूंक दी। छोटे और बिखरे हुए साम्राज्य को अपने साथ जोड़ा। उसने एक प्रयोगवादी और ऊर्जा से भरी सेना तैयार की। इसके बाद मुगलों की शाही मांगों को चतुराई और कूटनीतिक रूप से नकारा जाने लगा।

साल 1667 में गुवाहटी का नया फौजदार फिरोज खान अपनी मांग पूरी करवाने के लिए दबाव डलाने लगा। इसके बाद चक्रध्वज ने गुवाहटी वापस लेने का मन बनाया। अगस्त 1667 में लचित बरफुकन के नेतृत्व और अतन बुराहागोहेन के साथ अहोम सेना गुवाहटी की ओर कूच करती है।

अहोम सैनिक ब्रम्हपुत्र के दोनों छोरों को कवर करते हुए आगे बढ़ते है। नवंबर तक अधिकतर मुगलिया इलाके पर अपना कब्जा जमाते हुए सैनिक गुवाहटी पहुंचते हैं। यहां जोरदार युद्ध होता है, ओहम की नौसेना मुगलों को चारों ओर से घेर लेती है। फिरोज खान को बंदी बना लिया जाता है। इस तरह गुवाहटी एक फिर अहोम के कब्जे में आ जाता है।

बौखलाए औरंगजेब ने भेज दी एक विशाल सेना

मुगल बादशाह औरंगजेब को 19 दिसंबर 1667 को जब इसकी खबर मिलती है तो वो अंबर के राजा राम सिंह को शाही सेना के साथ असम पर कब्जा करने का आदेश देता है।

राजा राम सिंह 4 हजार सामान्य सैनिक, 1,500 अहादी (स्पेशल फोर्स के सैनिक), 500 बरकंडेज, 30 हजार पैदल सैनिक, 21 राजपूत प्रमुखों की सैनिक टुकड़ियों, 18 हजार घुड़सवारों, दो हजार तीरंदाजों और 40 जहाजों की शाही फौज के साथ 27 दिसंबर 1667 को असम कूच करते हैं।

पहाड़ियों से घिरे गुवाहटी को जंग के मैदान के तौर पर चुना जाता है। पूर्व में एंट्री का एकमात्र रास्ता ब्रम्हपुत्र नदी से होकर गुजरता था। अहोमों ने सराईघाट पर मुगलों की नेवल फौज को रोकने का प्लान बनाया, जो सिर्फ एक किलोमीटर चौड़ा था।

लचित ने मुगलों के पैदल सैनिकों को रोकने और उनकी गति धीमी करने के लिए गुवाहटी में मिट्‌टी के किले बनवाए। मुगल सैनिकों ने युद्ध के लिए पानी का रास्ता चुना, जो मुगल सेना का सबसे कमजोर पक्ष था।

मुगलों के खिलाफ लचित बरफुकन की वॉर स्ट्रैटजी

लचित ने युद्ध की रणनीति को लेकर आने वाले सभी विचारों का लिखित रिकॉर्ड करने का आदेश दिया। दो साल बाद 1669 को मुगल फौज मानस नदी के तट पर पहुंची। यहां अहोम की कई सैनिक टुकड़ियां मुगल सेना के सामने कुछ देर भी नहीं टिक पाई।

लचित ने अपनी सेना का बुरा हाल देखते हुए गुहावटी से पीछे हटने का फैसला लिया। वो राजा राम सिंह से भी मिला और उसे राजा भाई कहकर बात की। युद्ध टलता हुआ देख मुगल सेना लापरवाह हुई। इस बीच लचित को लड़ाई और रणनीति बनाने का और समय मिल गया।

जब लचित युद्ध के लिए पूरी तरह तैयार हो गया तो उसने फिरोज खान से राम सिंह को संदेश भेजवाया की गुवाहटी के लिए अहोम अपनी अंतिम सांस तक लड़ने के लिए तैयार हैं।

इसके बाद मुगल सेना ने भूगौलिक परिस्थिति के आधार पर खुद को चार हिस्सों में बांटा। उत्तरी तट पर खुद राम सिंह तैनात हुए। अन्य तीन सैन्य टुकड़ियां दक्षिणी तट, सिंदूरीघोपा प्रवेश द्वार और जहाजों पर तैनात हुई।

इस तरह अहोम दो भाग में बंटे- उत्तरी तट की कमान संभाली अतान बुरहागोहेन ने और दक्षिणी तट पर लचित ने खुद मोर्चा संभाला।

राजपूतों के सामने सैनिकों को ब्राह्मण बनाकर खड़ा दिया

5 अगस्त 1669 को शाही फौज और अहोम के सैनिकों का अलाबोई की पहाड़ियों में आमना-सामना हुआ। राजपूत योद्धाओं के सामने अहोमियों ने अपने सैनिकों को ब्राह्मण वेष में खड़ा कर दिया। दूसरी ओर राम सिंह ने एक महिला योद्धा मदनवती को पुरुष के रूप में तैयार किया और एक सैनिक टुकड़ी की कमान सौंपी। राम सिंह चाहते थे कि अगर अहोम युद्ध जीत जाते हैं तो उनकी जीत कलंकित रहे।

युद्ध के पहले चरण में मदनवती ने अहोम के योद्धाओं की चार टुकड़ियों को तहस-नहस कर दिया। दूसरे चरण में मदनवती की गोली लगने से मौत हो गई। अहोमियों ने मुगलों को ब्रम्हपुत्र नदी पार करने से भी रोक दिया गया। युद्ध के तीसरे चरण में मीर नवाब की पैदल सेना को अहोमी घुड़सवारों ने खदेड़ दिया।

अहोमियों की सफलता से बौखलाए राम सिंह ने इसके बाद अपने सबसे अनुभवी घुड़सवारों की फौज को युद्ध मैदान में उतार दिया। इसके बाद शुरू हुआ नर संहार, करीब 10 हजार अहोम सैनिकों को मार दिया गया।

सरायघाट की जंग और अहोम सेना की ऐतिहासिक जीत

युद्ध में अपने आप को आगे पा राम सिंह तोहफों और पैसों से अहोमियों को खरीदने की कोशिश करता है। वो 1639 की संधि के अनुसार एक बार फिर असम के बंटवारे का प्रपोजल रखता है। इस बीच राजा चक्रध्वज की मौत हो जाती है और उनके भाई उदयादित्य सिंघा राजा बनते हैं। वो गुवाहटी का फैसला अपने दोनों कमांडर पर छोड़ते हैं। इसके बाद आखिरी दम तक युद्ध करने का फैसला हुआ। औरंगजेब के कमांडर रामसिंह भी अंतिम और सीधे हमले के लिए उत्तरी तट की ओर आगे बढ़ना शुरू करते हैं।

बरफुकन के सैनिकों ने छापामार युद्ध की रणनीति अपनाई। वो आधी रात को किलों से निकलते थे और दुश्मनों पर छिपकर हमला करते थे। राम सिंह ने इसे चोर-डकैतों वाली हरकत बता दी। जवाब में अहोम दूतों ने कहा कि उनकी सेना में 1 लाख राक्षस हैं जो सिर्फ रात में युद्ध कर सकते हैं।

सरायघाट पर मुगलों को रोकने की जिम्मेदारी लचित बरफुकन की थी जो गंभीर रूप से बीमार हो चुके थे। उधर मुगल नेवल कमांडर मुनव्वर खान अपने सैनिकों के साथ अंधरूबली में उतरने वाला था। ये युद्ध का वो दौर था जहां मुगल सेना अपनी जीत पक्की समझ रही थी।

तभी लचित अपने नौसैनिकों और जहाजों के साथ मुनव्वर खान और उसके नौसैनिकों को सरायघाट पर घेर लेते हैं। इस युद्ध के दौरान ब्रह्मपुत्र नदी में एक त्रिभुज सा बन गया। जिसके एक कोण में कामख्या मंदिर, दूसरी ओर अश्वक्लान्ता का विष्णु मंदिर और तीसरी ओर ईटाकुली किले की दीवारें थीं।

मुगल कमांडर मुनव्वर खान एक जहाज में बैठ जीत के सपने देखते हुआ हुक्का पी रहा था, जिसे अहोमियों की एक गोली ने ढेर कर दिया। तोपों से भरी जहाज के साथ पहुंचे मुगल सैनिकों को जान बचाकर भागना पड़ा। लचित के सैनिकों ने मुगलों मनसा के पार तक खदेड़ा। निर्णायक युद्ध में अहोम सेना विजयी रही और राम सिंह को मार्च 1671 में रांगामाटी लौटना पड़ा।

सरायघाटी के युद्ध में अहोम जीत चुके थे, लेकिन मुगलों और अहोम के बीच ये आखिरी संघर्ष नहीं था। 1672 में कलियाबोर में बीमार लचित की मृत्यु हो गई। 1676 तक राम सिंह दूसरे मौके की तलाश में असम में अपना समय बर्बाद करते रहे। साल 1682 में मुगलों को असम से पूरी तरह से खदेड़ दिया गया।

लचित बरफुकन और अहोम सेना के बारे में राम सिंह ने कहा था, ‘एक ही सेनापति का पूरी फौज पर कंट्रोल है। हर अहोमी सैनिक नाव चलाने में, तीरंदाजी में, खाइयाँ खोदने और बंदूक चलाने में माहिर है। मैंने भारत के किसी हिस्से में इस तरह की हरफनमौला फौज नहीं देखी है। मैं जंग के मैदान में खुद शामिल रहते हुए भी उनकी एक भी कमजोरी नहीं पकड़ पाया।'

BJP के नए हीरो लचित बरफुकन

  • लचित की कहानी भले ही असम के बाहरी हिस्सों में न फैल पाई हो लेकिन यहां के लोगों के बीच बरफुकन शिवाजी और महाराणा प्रताप के जैसा कद रखते हैं।
  • असम सरकार ने साल 2000 में लचित बरफुकन ऑवार्ड की शुरूआत की। ये ऑवार्ड नेशनल डिफेंस अकादमी के बेस्ट कैडेट को दिया जाता है।
  • असम में हर साल 24 नवंबर को असमिया सेना की जीत और लचित के याद में लचित दिवस मनाया जाता है। BJP अब इस योद्धा को अपने नए हीरो के तौर पेश करना चाहती है।

इलस्ट्रेशनः गौतम चक्रबर्ती

References and further reading...

  • Lachit Barphukan And His Times By S.K. Bhuyan
  • History Of North East India (1228 To 1947) Rajiv Ghandhi University, Arunachal Pradesh

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