भास्कर एक्सप्लेनर:चीन ने भारत के गेहूं एक्सपोर्ट बैन का समर्थन कर चौंकाया, जानिए इस तारीफ के पीछे क्या है ड्रैगन का खेल

5 महीने पहलेलेखक: अभिषेक पाण्डेय

भारत ने गेहूं के एक्सपोर्ट पर बैन लगा दिया है। सात ताकतवर देशों के संगठन G-7 ने इसकी आलोचना की, लेकिन चीन ने इस मुद्दे पर भारत का बचाव किया है। भारत के इस फैसले का समर्थन करते हुए चीन ने G7 देशों के रवैये पर ही सवाल खड़ा किया है। भारत के विरोधी देश माने जाने वाले चीन ने गेहूं के मुद्दे पर समर्थन कर चौंका दिया है। आमतौर पर चीन भारत के पक्ष में कम ही खड़ा नजर आता है। जिस तरह से चीन ने भारत का बचाव किया है उससे सवाल उठ रहा है कि ड्रैगन के रुख में अचानक आए इस बदलाव की वजह क्या है?

ऐसे में चलिए जानते हैं कि आखिर चीन ने क्यों किया भारत का समर्थन? आखिर भारत को खुश करके क्या हासिल करना चाहता है चीन? क्या भारत चीन के इस कदम पर उसके करीब जाएगा?

चीन ने भारत के गेहूं एक्सपोर्ट पर बैन का समर्थन किया, G7 देशों को लताड़ा
भारत के हाल ही में गेहूं निर्यात पर प्रतिबंध के फैसले की G7 देशों ने आलोचना करते हुए कहा था कि इससे वैश्विक खाद्य संकट और गहराएगा, लेकिन चीन ने भारत के कदम का समर्थन करते हुए कहा कि भारत जैसे विकासशील देशों को दोष देने से वैश्विक खाद्य संकट का समाधान नहीं होगा।

चीन सरकार के मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स ने लिखा कि G7 देशों के कृषि मंत्री भारत से गेहूं निर्यात पर बैन न लगाने का आग्रह कर रहे हैं, तो G7 देश खुद क्यों गेहूं का निर्यात बढ़ाकर खाद्य बाजार को स्थिर करने का कदम नहीं उठाते।

चीनी अखबार ने लिखा कि हालांकि भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा गेहूं उत्पादक देश है, लेकिन वैश्विक गेहूं निर्यात में उसकी हिस्सेदारी काफी कम है। इसके उलट कई विकसित देश जिनमें अमेरिका, कनाडा, यूरोपियन यूनियन और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं, दुनिया के सबसे बड़े गेहूं निर्यातक देश हैं।

भारत की तारीफ क्यों कर रहा है चीन?
माना जा रहा है कि गेहूं एक्सपोर्ट पर बैन के मुद्दे पर चीन के भारत का समर्थन के पीछे दो बड़ी वजहें हैं। इसकी एक वजह है चीन में जून में होने वाला BRICS सम्मेलन, जिसे लेकर चीन चाहता है कि इस बैठक में हिस्सा लेने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चीन आएं। वहीं इसकी दूसरी वजह भारत के साथ हाल के वर्षों में तेजी से बढ़ता उसका व्यापार है, जिसे चीन नहीं चाहता कि किसी भी वजह से वह कम हो।

चलिए इन दो वजहों को विस्तार से समझते हुए जानते हैं कि आखिर भारत के समर्थन से ड्रैगन क्या हासिल करना चाहता है।

BRICS सम्मेलन के जरिए भारत का साथ चाहता है चीन
BRICS या ब्रिक्स 2006 में बना पांच विकासशील देशों-रूस, भारत, चीन, इंडोनेशिया और साउथ अफ्रीका का एक संगठन है। BRICS की आगामी बैठक 23-24 जून को चीन में होनी है। इस बैठक में इन पांचों देशों के राष्ट्राध्यक्षों को हिस्सा लेना है।

कुछ हफ्तों पहले भारत आए चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने विदेश मंत्री एस. जयशंकर के साथ बैठक के दौरान PM मोदी मोदी के ब्रिक्स सम्मेलन के लिए चीन आने की इच्छा जाहिर की थी।

BRICS देशों की बैठक का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि 24 फरवरी को यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद ये पहली बार होगा जब, PM नरेंद्र मोदी, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और ब्राजील और साउथ अफ्रीका के राष्ट्राध्यक्ष एक ही मंच साझा करेंगे।

वांग यी की यात्रा के बाद भारत ने BRICS की बैठक में हिस्सा लेने पर सहमति जताई है। इस बैठक को वर्चुअली होना है, लेकिन चीन चाहता है कि भारतीय PM नरेंद्र मोदी इस बैठक में हिस्सा लेने के लिए चीन आएं। माना जा रहा है कि चीन PM मोदी को चीन यात्रा के लिए इसलिए मना रहा है, ताकि वह वैश्विक संकट के समय भारत का समर्थन हासिल करने के साथ ही दोनों देशों के संबंधों को फिर से पटरी पर लाने की कोशिश कर पाए।

साथ ही चीन में होने वाला BRICS सम्मेलन 2020 में लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल, यानी LAC पर भारत-चीन के बीच पैदा हुए तनाव के बाद चीन में इस संगठन का पहला सम्मेलन होगा। चीनी विदेश मंत्री की हालिया भारत यात्रा को दोनों देशों के बीच संबंधों को सामान्य करने की दिशा में उठाया गया कदम माना जा रहा है। सीमा पर तनाव बढ़ने के बाद ये चीन के किसी बड़े नेता की पहली भारत यात्रा थी।

BRICS में भारत के जरिए G7 पर निशाना साधना चाहता है चीन
BRICS की ये बैठक चीन के लिए इसलिए भी अहम है, क्योंकि इस बैठक के दो दिन बाद ही 26-27 जून को G7 देशों की बैठक होनी है। G7 देशों में अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस, कनाडा, इटली और जापान शामिल हैं। ये सभी देश यूक्रेन पर रूस के हमले का कड़ा विरोध कर रहे हैं और रूस के समर्थन के लिए चीन की कड़ी आलोचना करते रहे हैं।

जानकारों का मानना है कि यही वजह है कि गेहूं निर्यात बैन के मुद्दे पर G7 देशों की भारत की आलोचना का चीन ने कड़ा विरोध किया है। माना जा रहा है कि चीन BRICS बैठक में भारत की मौजूदगी से G7 देशों को कड़ा संदेश देना चाहता है। इससे चीन दिखा पाएगा कि यूक्रेन युद्ध के मुद्दे पर रूस के समर्थन करने को लेकर भले ही अमेरिका और पश्चिमी देश उसके खिलाफ हमलावर रहे हैं, लेकिन वैश्विक संकट के इस समय में भारत उसके रुख के साथ खड़ा है।

वहीं जर्मनी में अगले महीने वाली G7 देशों की बैठक में शामिल होने के लिए PM नरेंद्र मोदी को आमंत्रित किया गया है। ऐसे में माना जा रहा है कि अगर PM मोदी BRICS बैठक के लिए चीन नहीं जाते हैं और G7 बैठक में हिस्सा लेने चले जाते हैं, तो ये चीन के लिए बड़ा झटका होगा। इसे हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के दबदबे को खत्म करने की अमेरिका और पश्चिमी देशों की कोशिशों को भारत के समर्थन के तौर पर देखा जाएगा। इसीलिए चीन चाहता है कि BRICS सम्मेलन के लिए PM मोदी चीन आएं।

हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के बढ़ते दबदबे से निपटने के लिए भारत पहले ही अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ बने QUAD संगठन का हिस्सा है।

वहीं यूक्रेन युद्ध से पैदा हुए हालात और पश्चिमी देशों द्वारा रूस के खिलाफ लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों से निपटने को लेकर भी BRICS सम्मेलन में चर्चा होने की उम्मीद है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, रूस चाहता है कि पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के असर को कम करने के लिए BRICS देशों के बीच उनकी नेशनल करेंसीज के इस्‍तेमाल पर सहमति बन जाए।

PM नरेंद्र मोदी, चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन, साउथ अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामाफोसा (बाएं से पहले) और ब्राजीली राष्ट्रपति जायर बोल्सोनारो (दाएं से पहले) के साथ 14 नवंबर 2019 में ब्रासिलिया में हुए BRICS सम्मेलन के दौरान।
PM नरेंद्र मोदी, चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन, साउथ अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामाफोसा (बाएं से पहले) और ब्राजीली राष्ट्रपति जायर बोल्सोनारो (दाएं से पहले) के साथ 14 नवंबर 2019 में ब्रासिलिया में हुए BRICS सम्मेलन के दौरान।

भारत के साथ बढ़ते व्यापार को घटने नहीं देना चाहता चीन
पिछले कुछ वर्षों में भारत और चीन के बीच सीमा पर तनाव भले ही बढ़ा हो, लेकिन इसका असर दोनों देशों के व्यापार संबंधों पर नहीं पड़ा है। 2021 में भारत-चीन का व्यापार पहली बार 100 अरब डॉलर को पार करके 125 अरब डॉलर, यानी करीब 9.50 लाख करोड़ पर पहुंच गया।

इस बढ़ते व्यापार में बहुत बड़ा हिस्सा भारत द्वारा चीनी सामानों के आयात का रहा। इस दौरान भारत ने चीन से 7.40 लाख करोड़ रुपए का आयात किया, जबकि उसने चीन को 2.10 लाख करोड़ रुपए का ही निर्यात किया। यानी भारत से व्यापार बढ़ने का ज्यादा फायदा चीन को ही मिला है।

भारत की हाल के वर्षों में चीन पर आयात निर्भरता कम करने की कोशिशों के बावजूद चीन से व्यापार का बढ़ना जारी है। 2022 की पहली तिमाही में भारत-चीन का व्यापार 31.96 अरब डॉलर यानी करीब 2.42 लाख करोड़ रहा, जो पिछले साल की तुलना में 15% ज्यादा है। 2022 के पहले तीन महीनों में भारत ने चीन से 2.05 लाख करोड़ रुपए का आयात किया, जबकि इस दौरान चीन को उसका निर्यात 37 हजार करोड़ रुपए का रहा।

इस दौरान भारत ने चीन से खासतौर पर इलेक्ट्रॉनिक्स प्रोड्क्टस जैसे-फोन, ऑटोमोबाइल के कॉम्पोनेंट्स, टेलिकॉम उपकरण, केमिकल और एक्टिव फार्मास्यूटिकल इंग्रीडिएंट्स यानी API का प्रमुख रूप से आयात किया। भारत की फार्मा प्रमुख रूप से इंडस्ट्री चीन से आने वाले एक्टिव फार्मास्यूटिकल इंग्रीडिएंट्स पर ही निर्भर है। कोरोना महामारी की शुरुआत के बाद से भारत ने दुनिया में सबसे ज्यादा मेडिकल उपकरणों का आयात चीन से ही किया है।

यानी भारत से व्यापार संबंधों से हाल के वर्षों में चीन ने अरबों डॉलर का मुनाफा कमाया है। यही वजह है कि चीन भारत के साथ संबंधों को सामान्य करने में जुटा है।

इस तरह से गेहूं बैन के मुद्दे पर G7 देशों की आलोचना और भारत की तारीफ के जरिए ड्रैगन ने एक ही तीर से कई निशाने साधने की कोशिश की है।

भारत का चीन को सीमा पर तनाव खत्म करने का संदेश
भारत वैसे तो BRICS के मोर्चे पर चीन के साथ मिलकर काम कर रहा है, लेकिन रिपोर्ट्स के मुताबिक, द्विपक्षीय संबंधों को लेकर पिछले दो वर्षों के दौरान चीन के लिए उसका एक ही स्पष्ट संदेश रहा है कि सीमा पर तनाव को कम किए बिना संबंधों का सामान्य होना मुश्किल है।

यही वजह है कि चीन के बुलावे के बावजूद PM मोदी के BRICS सम्मेलन के लिए चीन की यात्रा करने की संभावना नहीं है। भारत चाहता है कि डोकलाम संकट की तरह ही लद्दाख संकट का भी शांतिपूर्ण हल हो और चीनी सेना अपनी पुरानी जगह पर लौट जाए।

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