भास्कर एक्सप्लेनर:भारत सबसे बड़े एशियाई नौसैनिक अड्डे से बिगाड़ेगा चीन-पाक का खेल, जानिए क्यों इस नेवल बेस को भेदना मुश्किल

6 महीने पहलेलेखक: अभिषेक पाण्डेय

कर्नाटक का कारवार नेवल बेस रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की हालिया यात्रा के बाद फिर से चर्चा में है। भारत कारवार में जो नेवल बेस बना रहा है, वह एशिया का सबसे बड़ा नेवल बेस होगा। कारवार नेवल बेस को हाल के वर्षों में भारत के आसपास मौजूद समुद्री इलाकों में चीन की बढ़ती मौजूदगी और उसमें पाकिस्तान को भी शामिल करके भारत को घेरने की कोशिशों का जवाब माना जा रहा है। चीन व्यापार के बहाने भारत के आसपास मौजूद हिंद महासागर, अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में लगातार अपनी मौजूदगी बढ़ाने में लगा है।

ऐसे में चलिए जानते हैं कि आखिर क्या है भारत का कारवार नेवल बेस? भारत कैसे इससे चीन और पाकिस्तान को काउंटर कर सकता है? चीन-पाकिस्तान को रोकने के लिए भारत की है क्या योजना?

भारत कारवार में बना रहा एशिया का सबसे बड़ा नेवल बेस

हिंद महासागर, अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में बढ़ते चीनी दबदबे से निपटने के लिए भारत ने भी पिछले एक दशक के दौरान अपनी समुद्री ताकत और निगरानी को बढ़ाने के लिए कई कदम उठाए हैं। कारवार नेवल बेस भी उन्हीं कदमों का हिस्सा है।

कारवार कर्नाटक में स्थित है। कारवार नेवल बेस अरब सागर और पश्चिमी घाट के बीच में स्थित है। भारत कारवार नेवल बेस का निर्माण 'प्रोजेक्ट सीबर्ड' के नाम से कर रहा है। इस प्रोजेक्ट के तहत कारवार में 3 अरब डॉलर यानी करीब 23 हजार करोड़ की लागत से 11 हजार एकड़ में फैले नेवल बेस का निर्माण किया जाना है।

'प्रोजेक्ट सीबर्ड' को 1999 में मंजूरी मिली और इसके पहले चरण का काम 2005 में पूरा हुआ। इसके तहत कारवार में INS कदंब नाम से नेवल बेस बनाया गया, जो वर्तमान में देश में तीसरा सबसे बड़ा नेवल बेस है। इसके दूसरे चरण का काम 2025 तक पूरा होने की संभावना है, जिसके बाद कारवार में स्थित INS कदंब न केवल देश, बल्कि एशिया का सबसे बड़ा नेवल बेस बन जाएगा।

इसके पहले पहले चरण में गहरे समुद्र में बंदरगाह, ब्रेकवाटर ड्रेजिंग, एक टाउनशिप, एक नौसेना अस्पताल, एक डॉकयार्ड अपलिफ्ट सेंटर और एक शिप लिफ्ट का निर्माण किया गया है।

इस प्रोजेक्ट के दूसरे चरण में अतिरिक्त युद्धपोतों के लिए जगह बनाने की सुविधा के विस्तार के साथ ही एक नए नेवल एयर स्टेशन का निर्माण किया जाना है। कारवार नेवल बेस को युद्धपोतों के बेड़ों को सपोर्ट और उनके रख-रखाव की सुविधा देने के लिए बनाया जा रहा है।

क्या है कारवार नेवल बेस की खासियत

कारवार नेवल बेस बनने के बाद यहां कम से कम 30 युद्धपोत और सबमरीन तैनात होंगे। यहां एक नेवल एयर स्टेशन भी होगा, जिसके लिए 3 हजार फीट लंबा रनवे बनाया जाएगा। इस नेवल एयर स्टेशन से फाइटर प्लेन भी उड़ान भर सकेंगे।

यहां भारतीय एयरक्राफ्ट कैरियर्स भी तैनात होंगे। देश का एकमात्र एयरक्राफ्ट कैरियर यानी विमानवाहक पोत INS विक्रमादित्य पहले ही कारवार में तैनात है। साथ ही एयरक्राफ्ट कैरियर INS विक्रांत भी कारवार नेवल बेस पर तैनात होगा। 2007 में INS शार्दुल कारवार में तैनात किया जाने वाला पहला युद्धपोत बना था।

साथ ही इस नेवल बेस में देश की पहली सीलिफ्ट फैसिलिटी भी मौजूद है। ये जहाजों और सबमरीन के ट्रांसफर सिस्टम और डॉकिंग और अनडॉकिंग के लिए एक विशेष शिपलिफ्ट फैसिलिटी है।

करवार नेवल बेस चारों ओर से उबड़-खाबड़ पहाड़ियों और अरब सागर के बीच में स्थित है, इससे चीन-पाकिस्तान के लिए इसे निशाना बना पाना मुश्किल है
करवार नेवल बेस चारों ओर से उबड़-खाबड़ पहाड़ियों और अरब सागर के बीच में स्थित है, इससे चीन-पाकिस्तान के लिए इसे निशाना बना पाना मुश्किल है

भारत ने सबसे बड़े नेवल बेस के लिए कारवार को ही क्यों चुना

1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान इंडियन नेवी के पश्चिमी बेड़े की सुरक्षा के लिए खतरा पैदा हो गया था। इसकी वजह मुंबई बंदरगाह में कमर्शियल शिपिंग ट्रैफिक, मछली पकड़ने वाली और टूरिस्ट बोटों की वजह से शिपिंग लेन में जहाजों और नावों की भीड़ थी। इस समस्या से निपटने के लिए ही कारवार में भी नेवल बेस बनाने का फैसला हुआ।

कारवार नेवल बेस की भौगोलिक स्थिति उसे सैन्य से लेकर व्यापार तक हर मामले में खास बनाती है। कारवार पश्चिमी घाट की उबड़-खाबड़ पहाड़ियों और अरब सागर के बीच स्थित नौसैनिक अड्डा है। ये मुंबई, गोवा और नॉर्थ कोच्चि के साउथ में स्थित है।

अपनी लोकेशन की वजह से कारवार नेवल बेस चीन और पाकिस्तान जैसे पड़ोसी देशों के ज्यादातर फाइटर प्लेन की रेंज से दूर होगा। साथ ही ये दुनिया के सबसे व्यस्त जहाजों के रूट फारस की खाड़ी और पूर्वी एशिया के बहुत करीब स्थित है।

खास बात ये है कि अपनी लोकेशन की वजह से कारवार से भारत अरब सागर और हिंद महासागर दोनों इलाकों की निगरानी कर सकता है और यहां चीन और पाकिस्तान सी बढ़ती गतिविधियों को काउंटर कर सकता है। कारवार से इंडियन नेवी के लिए अरब सागर और हिंद महासागर दोनों जगह पहुंचना आसान होगा।

कैसे हिंद महासागर में चीन बढ़ा रहा अपनी ताकत

पिछले एक दशक के दौरान चीन ने भारत के आसपास मौजूद समुद्री इलाकों पर अपना दबदबा बढ़ाने की कोशिश की है। इसमें उसका सबसे ज्यादा जोर हिंद महासागर में अपनी ताकत बढ़ाने पर रहा है। साथ ही वह अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में भी अपनी ताकत बढ़ाने में लगा है। दरअसल, हिंद महासागर भारत-चीन समेत प्रमुख ताकतों के लिए रणनीतिक तौर पर अहम है। ये इलाका न केवल खनिज, मछली जैसे संसाधनों से भरपूर है, बल्कि दुनिया भर के कारोबार का बड़ा हिस्सा इसी समुद्री रास्‍ते से होकर गुजरता है।

चीन सबसे पहले 2008 में अदन की खाड़ी के पास समुद्री लुटेरों के खिलाफ कार्रवाई के लिए हिंद महासागर में अपने युद्धपोत उतारे थे। लेकिन उसके बाद से चीन के युद्धपोत हिंद महासागर से कभी हटे ही नहीं। इसी के तहत 2017 में उसने पूर्वी अफ्रीकी देश जिबूती में अपना एक नेवल बेस स्थापित किया था। चीन पश्चिमी अफ्रीकी देश सेनेगल की नेवी के लिए भी बंदरगाह बनाने पर काम कर रहा है। हिंद महासागर और भारत के आसपास अपनी ताकत बढ़ाने के लिए चीन लंबे समय से पाकिस्तान, श्रीलंका और म्यांमार के पोर्ट में निवेश करता रहा है। इन तीनों देशों के लिए वह हथियारों का सबसे बड़ा निर्यातक भी रहा है।

चीन ने अरब सागर में मौजूद पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट का भी अधिग्रहण कर लिया है। ग्वादर पोर्ट को रणनीतिक लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। ग्वादर पोर्ट के जरिए भारत के पश्चिमी तट चीनी नेवी के जद में होंगे, साथ ही इससे वह व्यापार के लिहाज से महत्वपूर्ण फारस की खाड़ी और अदन की खाड़ी पर भी दबदबा बना पाएगा।

साथ ही चीन हिंद महासागर में स्थित भारत के सीमावर्ती देश श्रीलंका के हंबनटोटा पोर्ट को पहले ही 99 साल की लीज पर ले चुका है। इतना ही नहीं वह मालदीव के मराओ पोर्ट और बांग्लादेश में चटगांव पोर्ट को अपने कंट्रोल में करने की योजना पर काम कर रहा है।

इसके अलावा चीन म्यांमार में भी एक बड़ा सबमरीन अड्डा बना रहा है। म्यांमार में अपने अड्डे के जरिए वह बंगाल की खाड़ी में अपनी ताकत बढ़ाना चाहता है। चीन सिंगापुर के साथ व्यापार बंगाल की खाड़ी के रास्ते करना चाहता है और इसीलिए म्यांमार में एक हाईवे बना रहा है। ऐसा करके वह मलेशिया, इंडोनेशिया और सिंगापुर के बीच में स्थित मलक्का जलडमरूमध्य पर अपनी निर्भरता घटाना चाहता है, क्योंकि वहां स्थित अपने नेवी बेस की वजह से भारत मजबूत स्थिति में है। चीन की कुल एनर्जी जरूरतों के 80% का व्यापार इसी रास्ते से होता है। इसीलिए चीन के लिए मलक्का जलडमरूमध्य बेहद अहम है।

भारत को घेरने के लिए पाकिस्तान को घातक हथियार दे रहा चीन

चीन ने अफ्रीकी देश जिबूती में एक बड़ा नेवल बेस बनाने के बाद हिंद महासागर से लेकर साउथ चाइना सी तक अपनी ताकत के विस्तार के खेल में पाकिस्तान को भी शामिल कर लिया है। इसीलिए वह पाकिस्तानी नेवी को एक से बढ़कर एक घातक हथियारों की सप्लाई कर रहा है, ताकि भारत को तीन तरफ से घेरा जा सके।

ग्लोबल टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, चीन ने पिछले साल पाकिस्तान को टाइप-054 स्टील्थ युद्धपोत दिया था। टाइप-054 स्टील्थ युद्धपोत चीन का सबसे उन्नत फ्रिगेट यानी युद्धपोत है। ये युद्धपोत एडवांस्ड सरफेस, सब सरफेस और अंडरवाटर हथियारों से लैस है। इसमें हवाई और जमीनी निगरानी के लिए अत्‍याधुनिक डिवाइसेज और सेंसर लगे हैं।

वहीं अपनी नेवी की ताकत बढ़ाने के लिए पाकिस्तान ने चीन के साथ 7 अरब डॉलर का करार किया है। इसके तहत वह चीन से 039 बी युआन क्लास की किलर पनडुब्बी खरीदेगा। इस चीनी सबमरीन में एंटी शिप क्रूज मिसाइल लगी होती हैं। ये एयर इंडिपेंडेंट प्रपल्शन सिस्टम के कारण बेहद कम आवाज करती हैं। ये कई दिनों तक पानी के अंदर रह सकती हैं और कम आवाज करने के कारण इसका पता लगा पाना मुश्किल होता है।

इन चीनी हथियारों के आने से पाकिस्तानी नेवी की ताकत में कई गुना इजाफा होगा। चीन इन हथियारों की सप्लाई से भारत के पश्चिमी तट यानी अरब सागर वाले इलाके में उसे घेरने वाला साथी तैयार कर रहा है।

चीन ने कुछ महीनों पहले पाकिस्तान को PNS टुघरिल नामक टाइप 054A/P युद्धपोत दिया है।
चीन ने कुछ महीनों पहले पाकिस्तान को PNS टुघरिल नामक टाइप 054A/P युद्धपोत दिया है।

भारत काउंटर अटैक के लिए तैयार

चीन की आक्रामकता से निपटने के लिए भारत ने हिंद महासागर में पांच महत्वपूर्ण चोक पॉइंट्स पर अपने युद्धपोत तैनात कर दिए हैं। इन पांच समुद्री चोक पॉइंट्स में पश्चिम में स्थित अदन की खाड़ी से लेकर पूर्व में स्थित मलक्का जलडमरूमध्य शामिल हैं, जिनसे होकर दुनिया के कुल तेल का करीब 40% उत्पादन करने वाले खाड़ी देशों से चीन, भारत समेत बड़े एशियाई देशों को निर्यात होता है।

चीन और पाकिस्तान को समुद्री खेल में मात देने के लिए भारत ने पिछले साल अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और अन्य मित्र देशों की नेवी के साथ मिलकर 50 संयुक्त युद्धाभ्यास करते हुए रिकॉर्ड बनाया था। अब एशिया के सबसे बड़े कारवार नेवल बेस का निर्माण करके भारत इस खेल में बढ़त लेने की शुरुआत कर चुका है।

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