भास्कर एक्सप्लेनर:जानिए कोयले से कैसे बनती है बिजली? दुनिया का दूसरा बड़ा उत्पादक होकर भी हम विदेशों से क्यों मंगाते हैं कोयला?

9 दिन पहलेलेखक: आबिद खान

दुनियाभर में कोयले की कमी के बीच भारत में भी कोयला संकट गहराने लगा है। देश के कई पावर प्लांट्स में 3 से 5 दिन का ही कोयले का स्टॉक बचा है। हालात को देखते हुए ये आशंका जताई जा रही है कि ये संकट और गहरा सकता है। राजस्थान, तमिलनाडु, झारखंड, बिहार, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, महाराष्ट्र जैसे राज्यों ने केंद्र सरकार से कोयला संकट की वजह से बिजली उत्पादन में कमी की शिकायत की है।

हालांकि केंद्र सरकार ने कोयले की कमी को पूरी तरह नकार दिया है। केंद्र का कहना है कि कोयले की कमी जरूर है, लेकिन वो धीरे-धीरे दूर कर दी जाएगी। बिजली की आपूर्ति पर असर पड़ने की आशंकाएं पूरी तरह गलत हैं।

आइए समझते हैं, कोयले के स्टॉक को लेकर क्या है स्थिति? किस तरह कोयले से बिजली बनाई जाती है? भारत भरपूर उत्पादन के बावजूद दूसरे देशों से कोयला आयात करने को क्यों मजबूर है? कोयले की कमी की खबरों के बीच सरकार का क्या कहना है? और आखिर दुनियाभर में कोयले की कमी क्यों है...

सबसे पहले कोयले को लेकर ताजा संकट क्या है, ये समझिए

दरअसल देशभर में कोयले से चलने वाले पावर प्लांट में कोयले की कमी की खबरें आ रही हैं। देश में पैदा होने वाली 70 फीसदी बिजली थर्मल पावर प्लांट से आती है। कुल पावर प्लांट में से 137 पावर प्लांट कोयले से चलते हैं, इनमें से 7 अक्टूबर 2021 तक 72 पावर प्लांट में 3 दिन का कोयला बचा है। 50 प्लांट्स में 4 दिन से भी कम का कोयला बचा है।

अब समझिए कोयले से बिजली कैसे बनती है?

  • सबसे पहले खदान से आने वाले कोयले के छोटे-छोटे टुकड़ों को बारीक कर पाउडर के समान पीसा जाता है।
  • इस कोयले का इस्तेमाल बॉयलर में पानी को गर्म करने के लिए किया जाता है। पानी गर्म होने के बाद हाई-प्रेशर स्टीम में बदल जाता है, जिसका इस्तेमाल टर्बाइन को घुमाने के लिए किया जाता है।
  • ये टर्बाइन भी पानी के टर्बाइन की तरह ही होते हैं। फर्क सिर्फ इतना होता है कि इन टर्बाइन को घुमाने के लिए भाप का इस्तेमाल होता है।
  • इन टर्बाइन को जनरेटर से कनेक्ट किया जाता है। टर्बाइन के घूमने से जनरेटर में मेग्नेटिक फील्ड प्रोड्यूस होती है और इसी से बिजली बनती है।

कोयले के बंपर उत्पादन के बावजूद भारत को क्यों करना पड़ता है इम्पोर्ट?

कोयला उत्पादन के क्षेत्र में भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश है। ग्लोबल एनर्जी स्टेटिस्टिकल इयरबुक 2021 के मुताबिक कोयला उत्पादन में चीन सबसे आगे है। हर साल चीन 3,743 मिलियन टन कोयले का उत्पादन करता है। वहीं, भारत हर साल 779 मिलियन टन कोयले का उत्पादन कर दूसरे नंबर पर है। इसके बावजूद भारत को अपनी जरूरत का 20 से 25 फीसदी कोयला दूसरे देशों से इम्पोर्ट करना पड़ता है।

  • दरअसल, कोयले के इम्पोर्ट का सीधा-सीधा कनेक्शन कोयले की क्वालिटी से है। भारत में जो कोयले का उत्पादन होता है उसकी कैलोरिफिक वैल्यू कम होती है। कैलोरिफिक वैल्यू यानी एक किलो कोयले को जलाने पर जितनी ऊर्जा पैदा होती है। कैलोरिफिक वैल्यू जितनी ज्यादा होगी, कोयले की क्वालिटी भी उतनी ही बढ़िया होगी।

कोयले की कमी की वजह क्या है?

  • कोरोना की भयावह दूसरी लहर के बाद देश अब पटरी पर लौटने लगा है। औद्योगिक गतिविधियां पहले की तरह शुरू होने लगी हैं, जिससे बिजली की मांग बढ़ी है।
  • इंटरनेशनल मार्केट में कोयले की महंगी कीमतें भी इसकी कमी की वजह से है। कोयला महंगा होते ही पावर प्लांट्स ने इसका इम्पोर्ट बंद कर दिया और वे पूरी तरह कोल इंडिया पर निर्भर हो गए। देश में कोयला उत्पादन में 80% हिस्सेदारी रखने वाली कोल इंडिया का कहना है कि ग्लोबल कोल प्राइज में हो रहे इजाफे की वजह से हमें घरेलू कोयला उत्पादन पर निर्भर होना पड़ा है। डिमांड और सप्लाई में आए अंतर की वजह से ये स्थिति बनी है।
  • भारत में कोयले की कमी को मानसून से भी जोड़कर देखा जा रहा है। दरअसल मानसून के देरी से लौटने की वजह से अभी तक खुली खदानों में पानी भरा हुआ है। इस वजह से इन खदानों से कोयले का उत्पादन नहीं हो पा रहा है।

इस संकट पर सरकार का क्या कहना है?

  • कोयला मंत्रालय ने रविवार को कहा कि प्लांट्स को आपूर्ति के लिए कोयले का पर्याप्त स्टॉक है। प्लांट्स के पास अभी 72 लाख टन कोयला है, जो 4 दिन के लिए पर्याप्त है। उम्मीद है कि स्टॉक होल्डिंग धीरे-धीरे बढ़ती जाएगी। कोल इंडिया के पास भी 400 लाख टन से अधिक कोयला है, जिसकी आपूर्ति पावर प्लांट्स को की जानी है।
  • दिल्ली में बिजली की कमी की खबरों पर ऊर्जा मंत्री आरके सिंह ने कहा कि दिल्ली में बिजली का कोई संकट नहीं है। हमारे पास कोयले का भरपूर स्टॉक है। संकट को बेवजह प्रचारित किया गया है।
  • मंत्री आरके सिंह ने कहा कि 9 अक्टूबर को सभी कोयला खदानों से 1.92 मिलियन टन कोयला प्लांट्स में भेजा गया और 1.87 मिलियन टन ही इस्तेमाल हुआ। इसका मतलब है कि कोयले का उत्पादन इस्तेमाल से ज्यादा हो रहा है।
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