भास्कर एक्सप्लेनर:कोरोना का ‘दीर्घायु’ पर असर; ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की स्टडी में दावा- दूसरे विश्व युद्ध के बाद औसत आयु में आई सबसे बड़ी गिरावट

2 महीने पहलेलेखक: रविंद्र भजनी

कोरोना वायरस महामारी ने ‘दीर्घायु’ के आशीर्वाद को बेकार कर दिया है। कोरोना की वजह से दुनियाभर में औसत आयु कम हो गई है। यह दावा ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के रिसर्चर्स ने साल 2020 की मौतों के आंकड़ों के आधार पर किया है। इंटरनेशनल जर्नल ऑफ एपिडेमियोलॉजी में पब्लिश हुई स्टडी कहती है कि यह सेकेंड वर्ल्ड वॉर के बाद किसी एक साल में इंसानों की लाइफ एक्सपेक्टेंसी यानी जीवन प्रत्याशा में आई सबसे बड़ी गिरावट है।

वर्ल्डोमीटर (worldometers.com) के मुताबिक दुनियाभर में 29 सितंबर तक 47 लाख लोगों की मौत कोविड-19 की वजह से हुई है। इसमें भी अमेरिका में सबसे अधिक 7.11 लाख मौतें हुई हैं। उसके बाद ब्राजील (5.95 लाख) और भारत (4.47 लाख) का नंबर आता है।

आइए समझते हैं कि यह रिसर्च क्या है? यह कैसे और क्यों की गई? इसके नतीजे क्या कहते हैं? कोविड-19 ने पूरी दुनिया में मृत्यु दर को किस तरह बढ़ाया है?

इस स्टडी का मकसद क्या है?

लाइफ एक्सपेक्टेंसी को पीरियड लाइफ एक्सपेक्टेंसी भी कहा जाता है। इसके जरिए जन्म के समय किसी व्यक्ति की औसत आयु का अनुमान लगाया जाता है। जीवन प्रत्याशा जीवन का वास्तविक अनुमान नहीं होती बल्कि उस समय की मृत्यु दर को आधार बनाकर भविष्य में किसी व्यक्ति का जीवन कितना लंबा रहेगा, इसका आकलन किया जाता है।

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के रिसर्चर्स का मकसद यह पता करना था कि अलग-अलग देशों में कोविड-19 ने जीवन काल यानी लंबी उम्र पर क्या असर डाला है। महामारी की वजह से किसी देश की आबादी की मृत्यु दर पर पड़ने वाले असर को जानने के लिए जीवन प्रत्याशा का इस्तेमाल एक प्रमुख इंडिकेटर के तौर पर होता है।

क्या कहती है ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की स्टडी?

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के रिसर्चर्स ने उन 29 देशों का एनालिसिस किया, जिन्होंने 2020 में हुई मौतों के आंकड़े पब्लिश किए हैं। इनमें यूरोप के ज्यादातर देशों के साथ-साथ अमेरिका और चिली भी शामिल हैं। इस स्टडी में इन देशों में अलग-अलग एज ग्रुप्स में जीवन प्रत्याशा की दर को कैल्कुलेट किया गया है।

स्टडी में 2015-2020 के बीच मृत्यु दर के ट्रेंड के आधार पर 29 देशों में लिंग और उम्र के आधार पर जीवन प्रत्याशा का अनुमान लगाया गया है। जन्म के समय और 60 वर्ष की उम्र पर यह देखा गया कि व्यक्ति का औसत जीवन कितना लंबा रह सकता है। 2020 के आंकड़ों की तुलना 2015 और 2019 के बीच के ट्रेंड्स से की गई। इससे यह पता चला कि कोविड-19 की वजह से किस देश में नागरिकों की औसत उम्र घटी है या बढ़ी है।

स्टडी के नतीजे क्या कहते हैं?

रिसर्चर्स की टीम ने पाया कि 29 में से 27 देशों में 2020 में जीवन प्रत्याशा की दर घट गई। 2015 की तुलना में 2020 में 15 देशों में महिलाओं और 10 देशों में पुरुषों के जन्म के समय की जीवन प्रत्याशा घट गई है। रिसर्चर्स ने 2015 से तुलना की क्योंकि उस समय फ्लू सीजन में भी हजारों लोगों की जान गई थी।

स्टडी के सह-प्रमुख लेखक डॉ. जोस मैनुअल अबुर्तो ने कहा कि स्पेन, इंग्लैंड और वेल्स, इटली, बेल्जियम समेत अन्य पश्चिमी यूरोपीय देशों में जीवन प्रत्याशा में किसी एक साल में इस तरह की गिरावट सिर्फ दूसरे विश्वयुद्ध के समय हुई थी।

वह कहते हैं कि 22 देशों में आधे साल में जीवन प्रत्याशा में कमी देखी गई है। 8 देशों में महिलाओं और 11 देशों में पुरुषों की जीवन प्रत्याशा में गिरावट आई है। यह महत्वपूर्ण है क्योंकि इन देशों में एक साल जीवन प्रत्याशा बढ़ाने में 5.6 साल लग गए थे और कोविड-19 ने उन्हें करीब-करीब 10-15 साल पीछे धकेल दिया है।

लैंगिक आधार पर जीवन प्रत्याशा के आंकड़े क्या कहते हैं?

सभी 29 देशों में महिलाओं के मुकाबले पुरुषों की जीवन प्रत्याशा दर काफी हद तक प्रभावित हुई है। अमेरिकी पुरुषों में सबसे अधिक गिरावट दर्ज हुई है, जिनकी जीवन प्रत्याशा 2019 के स्तर के मुकाबले 2020 में 2.2 साल कम हो गई है। इसके बाद लिथुआनिया का नंबर है, जहां पुरुषों की जीवन प्रत्याशा 1.7 साल कम हुई है।

रिसर्च के सह-प्रमुख लेखक डॉ. रिद्धी कश्यप का कहना है कि अमेरिका में जीवन प्रत्याशा की दर सबसे अधिक घटी है, इसकी एक बड़ी वजह यह है कि वहां 2020 में वर्किंग एज में मौतें अधिक हुई हैं, इससे अंडर-60 ग्रुप में जीवन प्रत्याशा घटी है। वहीं, यूरोप के ज्यादातर देशों में 60+ एज ग्रुप में मौतें ज्यादा हुईं, जिससे जीवन प्रत्याशा घटी, पर सीमित रही।

डॉ. कश्यप के मुताबिक कई देशों में कोविड-19 से हुई मौतों को गिनने में कई मुद्दे सामने आए हैं। कई देशों में टेस्टिंग नहीं हुई। कोविड-19 मौतों और अन्य को बांटने में भी कमियां थीं। हमारे रिजल्ट बताते हैं कि कोविड-19 ने कई देशों को बड़े झटके दिए हैं।

क्या भारत में जीवन प्रत्याशा पर इसका असर हुआ है?

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की रिसर्च में भारत को शामिल नहीं किया गया था। इसकी वजह यह है कि भारत ने अब तक 2020 के आंकड़े पब्लिश नहीं किए हैं। इसके बाद भी हमारे यहां कोविड-19 मौतों को लेकर अलग-अलग आकलन है। सरकारी आंकड़े भले ही 4-4.5 लाख के आसपास हो, अंडर-रिपोर्टिंग एवं अन्य मुद्दों की वजह से ये संख्या अधिक भी हो सकती है।

वर्ल्ड हेल्थ स्टेटिस्टिक्स की जुलाई 2021 में आई रिपोर्ट कहती है कि दुनियाभर में जीवन प्रत्याशा दर बढ़ी है। पूरी दुनिया की बात करें तो जन्म के समय औसत उम्र 73.3 वर्ष हो गई है, पर 2019 के आंकड़ों के अनुसार हेल्दी लाइफ एक्सपेक्टेंसी 63.7 वर्ष है। हेल्दी लाइफ एक्सपेक्टेंसी यानी वह उम्र जब तक व्यक्ति पूरी तरह से स्वस्थ जीवन जीता है।

भारत की बात करें तो लाइफ एक्सपेक्टेंसी 70.8 वर्ष है, जबकि हेल्दी लाइफ एक्सपेक्टेंसी सिर्फ 60.3 वर्ष है। यानी दोनों ही मामलों में ग्लोबल एवरेज से हम काफी पीछे हैं। इसमें भी महत्वपूर्ण बात यह है कि लाइफ एक्सपेक्टेंसी के मामले में भारतीय महिलाएं पुरुषों से 2.7 वर्ष आगे हैं। इस रिपोर्ट में 2020 के आंकड़े शामिल नहीं थे, इस वजह से यह नहीं कहा जा सकता कि कोविड-19 का लाइफ एक्सपेक्टेंसी पर क्या असर पड़ा है।

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