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भास्कर एक्सप्लेनर:वैक्सीन के इफेक्टिवनेस रेट से तय नहीं होता कि वैक्सीन अच्छी है या खराब; जानिए कौन-सी वैक्सीन बेहतर?

2 महीने पहले

भारत में कोरोना की दूसरी लहर के बीच वैक्सीनेशन ने भी रफ्तार पकड़ ली है। शनिवार सुबह तक 9.80 करोड़ वैक्सीन के डोज लगाए जा चुके हैं। वैक्सीन डोज लेने के बाद भी कोरोना इन्फेक्शन के केस सामने आ रहे हैं। ऐसे में भारत में इस्तेमाल हो रही वैक्सीन के मुकाबले अमेरिकी वैक्सीन को ज्यादा असरदार बताया जा रहा है। इसकी वजह है एफिकेसी रेट, जिसके आधार पर मॉडर्ना और फाइजर की वैक्सीन को ज्यादा असरदार बताया जा रहा है। आम लोगों को इस एफिकेसी रेट के बारे में अधिक जानकारी नहीं है। इसी वजह से वैक्सीन को लेकर हिचक भी दिख रही है।

ऐसे में यह समझना बेहद जरूरी है कि अलग-अलग वैक्सीन की एफिकेसी क्या है और यह किस तरह निकाली जाती है-

किस वैक्सीन का क्या है एफिकेसी रेट?

  • अमेरिकी कंपनियों फाइजर और मॉडर्ना की वैक्सीन का एफिकेसी रेट सबसे ज्यादा है। फाइजर-बायोएनटेक की एफिकेसी 95 प्रतिशत है, जबकि मॉडर्ना की 94 प्रतिशत। वहीं जॉनसन एंड जॉनसन की एफिकेसी सिर्फ 66% है।
  • जब आप अन्य वैक्सीन की बात करते हैं तो स्पूतनिक V की एफिकेसी 92%, नोवावैक्स की 89%, भारत बायोटेक के कोवैक्सिन की 81% और ऑक्सफोर्ड एस्ट्राजेनेका की 67% है। जब आप नंबरों को देखते हैं तो लगेगा कि जिनकी एफिकेसी ज्यादा है, वह वैक्सीन अच्छी है और जिनकी एफिकेसी कम है, वह खराब। पर यह सोचना पूरी तरह से गलत है। एफिकेसी नंबर यह नहीं बताते कि कोई वैक्सीन कितनी असरदार हो सकती है।

यह एफिकेसी क्या होती है? इसे कैसे निकाला जाता है?

  • किसी भी वैक्सीन की एफिकेसी बड़े पैमाने पर होने वाले क्लीनिकल ट्रायल्स से पता चलती है। आम तौर पर इन्हें फेज-3 क्लीनिकल ट्रायल्स भी कहते हैं। यह ट्रायल्स हजारों लोगों पर होते हैं। इन ग्रुप्स को दो हिस्सों में बांटा जाता है। आधे लोगों को वैक्सीन दी जाती है और आधों को प्लेसिबो। दोनों ग्रुप्स की मॉनिटरिंग होती है। वैज्ञानिक यह देखते हैं कि किस ग्रुप में कितने लोगों को कोरोना इन्फेक्शन हुआ है।
  • इसे फाइजर की वैक्सीन के ट्रायल्स डेटा से समझ सकते हैं। इन ट्रायल्स में 43 हजार वॉलंटियर शामिल हुए थे। ट्रायल्स खत्म होने पर 43 हजार में से 170 लोगों को कोरोना इन्फेक्शन हुआ। दोनों ग्रुप्स में कितने लोगों को इन्फेक्शन हुआ, उसके अंतर से ही एफिकेसी तय होती है।
  • मान लीजिए कि 170 कोविड-19 इन्फेक्टेड व्यक्ति बराबरी से दोनों ग्रुप्स का हिस्सा होते, यानी प्लेसिबो वाले ग्रुप से 85 और वैक्सीन वाले ग्रुप से 85 वॉलंटियर इन्फेक्टेड होते तो एफिकेसी 0% होती। अगर सभी 170 इन्फेक्टेड वॉलंटियर प्लेसिबो ग्रुप से होते तो एफिकेसी होती 100 प्रतिशत।
  • अब फाइजर-बायोएनटेक के ट्रायल्स के वास्तविक आंकड़ों को समझते हैं। इनमें 162 प्लेसिबो ग्रुप से थे, जबकि सिर्फ 8 वैक्सीन ग्रुप से थे। मतलब यह हुआ कि जिन्हें वैक्सीन लगी थी, उनके इंफेक्शन से बचने की संभावना वैक्सीन न लेने वालों के मुकाबले 95% रही। इसका मतलब यह नहीं है कि अगर 100 लोगों को वैक्सीन लगाई तो 5 लोगों को कोविड-19 इन्फेक्शन हो जाएगा। जिसे वैक्सीन लगी है उसके कोविड-19 इन्फेक्ट होने की संभावना 95% कम रही।

क्या एफिकेसी को कुछ और फेक्टर्स प्रभावित कर सकते हैं?

  • हां। हर वैक्सीन के ट्रायल्स बहुत ही अलग परिस्थितियों में होते हैं। इसी आधार पर एफिकेसी तय होती है। अमेरिका में मॉडर्ना के क्लीनिकल ट्रायल्स उस समय कराए गए, जब वहां गर्मियों का मौसम था। पूरे ट्रायल्स अमेरिका में ही हुए हैं। फाइजर-बायोएनटेक के ट्रायल्स भी मुख्य रूप से अमेरिका में ही हुए और वह भी गर्मियों का ही मौसम था।
  • जॉनसन एंड जॉनसन के ट्रायल्स उस समय हुए, जब ज्यादा लोगों के कोविड-19 इन्फेक्ट होने का खतरा था। जॉनसन एंड जॉनसन के ट्रायल्स अन्य देशों में भी हुए। मुख्य रूप से दक्षिण अफ्रीका और ब्राजील में। दोनों ही देशों में उस समय इन्फेक्शन रेट ज्यादा था। वहीं, दोनों ही देशों में वायरस भी अलग था। उसके नए स्ट्रेन सामने आ चुके थे।
  • ट्रायल्स उस समय हुए, जब कोविड-19 के वैरिएंंट्स सामने आने लगे थे और उनसे ही इन्फेक्शन भी तेजी से फैल रहा था। दक्षिण अफ्रीका में जॉनसन एंड जॉनसन के ट्रायल्स के दौरान जो केस सामने आए, उनमें 67% नए वैरिएंट से इन्फेक्ट हुए थे। यह स्ट्रेन अमेरिका के ओरिजिनल वायरस से अलग थे, जिन पर गर्मियों में ट्रायल्स हुए थे। इसके बाद भी नतीजे अच्छे रहे।
  • इन वैक्सीन के एफिकेसी रेट्स आपको यह तो बताते हैं कि ट्रायल्स के दौरान वैक्सीन इन्फेक्शन से बचाने में कितनी इफेक्टिव रही, पर यह नहीं बताते कि वास्तविक दुनिया में उस समय क्या हो रहा था। कई एक्सपर्ट्स कहते हैं कि वैक्सीन के एफिकेसी रेट्स के नंबर किसी वैक्सीन पर फैसला लेने का सबसे अच्छा तरीका नहीं है, क्योंकि वैक्सीन का काम सिर्फ किसी वायरस से बचाने का ही नहीं होता।

...तो वैक्सीन का उद्देश्य क्या है?

  • विशेषज्ञों का कहना है कि कोविड-19 वैक्सीन का उद्देश्य वायरस को शून्य पर ले जाना नहीं है, बल्कि शरीर को वायरस से लड़ने के लिए तैयार करना है। ताकि इन्फेक्शन गंभीर स्तर तक न पहुंचे और लोगों की अस्पतालों में लग रही भीड़ को कम किया जा सके।
  • वायरस से सामना होने पर क्या हो सकता है। सबसे अच्छी स्थिति है कि इन्फेक्शन ही न हो और सबसे बुरी स्थिति है मौत। इसके बीच की परिस्थितियों में हॉस्पिटलाइजेशन, गंभीर लक्षण, मॉडरेट लक्षण, कोई लक्षण न होना शामिल है। वैक्सीन से उम्मीद है कि इन्फेक्शन हो ही न।
  • पर वैक्सीन का वास्तविक उद्देश्य आपके शरीर को पर्याप्त प्रोटेक्शन देना है ताकि गंभीर लक्षण, हॉस्पिटलाइजेशन और मौत की स्थिति न बने। वायरस इन्फेक्शन होने पर महज सर्दी-जुकाम जैसी स्थिति बने, जो कुछ दिन में ठीक हो जाती है। इस लिहाज से देखें तो सभी कोविड-19 वैक्सीन इस मोर्चे पर बहुत अच्छा काम कर रही हैं।
  • ट्रायल्स के दौरान प्लेसिबो ग्रुप के कुछ लोगों को इन्फेक्शन हुआ। उन्हें हॉस्पिटलाइज करना पड़ा। कुछ की मौत भी हुई। पर अच्छी बात यह है कि अब तक के सभी ट्रायल्स में वैक्सीन ग्रुप्स में शामिल लोगों को इन्फेक्शन होने पर भी न तो हॉस्पिटलाइज करना पड़ा और न ही किसी की मौत हुई।

एफिकेसी महत्व रखती है, पर यह सबकुछ नहीं है। सवाल यह नहीं है कि कौन-सी वैक्सीन आपको कोविड-19 इन्फेक्शन से बचाएगी, बल्कि यह है कि कौन-सी वैक्सीन आपको जीवित रखेगी या अस्पताल से बाहर रखेगी? उपलब्ध सभी वैक्सीन इन सवालों का जवाब बन सकती हैं। सीधी-सी बात है कि जो भी वैक्सीन आपके लिए उपलब्ध है, उसे लगवाइए। जो भी वैक्सीन आप लगवाएंगे, वह हमें इस महामारी को खत्म करने के करीब लेकर जाएगी।