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भास्कर एक्सप्लेनर:एक सीटी स्कैन में 70 X-रे जितना रेडिएशन; जानिए कोरोना के लक्षण होने पर हर मरीज को सीटी स्कैन क्यों नहीं कराना है

3 महीने पहलेलेखक: रवींद्र भजनी
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शहर छोटा हो या बड़ा, सीटी स्कैन सेंटरों पर जबरदस्त भीड़ दिख रही है। लोग कोरोना से इतना डर गए हैं कि वे थोड़े भी लक्षण सामने आने पर सीधे सीटी स्कैन कराने दौड़ पड़ते हैं। इससे सीटी स्कैन करने वाले सेंटरों पर दबाव बढ़ता जा रहा है। पिछले हफ्ते केंद्र सरकार को कहना पड़ा कि सीटी स्कैन कराना अच्छा नहीं है। कोरोना इन्फेक्शन की पुष्टि के लिए सीधे सीटी स्कैन न कराएं।

एम्स-दिल्ली के डायरेक्टर डॉ. रणदीप गुलेरिया ने पिछले हफ्ते प्रेस कॉन्फ्रेंस की। इसमें कहा कि सीटी स्कैन सेंटरों पर भीड़ लग रही है, जिसकी जरूरत ही नहीं है। उन्होंने चेताया भी कि सीटी स्कैन अच्छा नहीं है। एक सीटी स्कैन 250-300 X-रे के बराबर रेडिएशन छोड़ता है। हर मरीज को इसे कराने की जरूरत नहीं है। हालांकि, इंडियन रेडियोलॉजी एंड इमेजिंग एसोसिएशन (IRIA) ने गुलेरिया के दावों का खंडन किया। एसोसिएशन का कहना है कि सीटी स्कैन में जितना कम हो सके, उतने कम रेडिएशन का इस्तेमाल किया जाता है। इससे कैंसर या अन्य बीमारियां होने का खतरा बहुत कम रहता है। हमने इस मुद्दे को समझने के लिए डॉ. अनिल बल्लानी, एमडी, कंसल्टंट फिजिशियन/कार्डियोलॉजिस्ट, पीडी हिंदुजा हॉस्पिटल एंड मेडिकल रिसर्च सेंटर, खार फेसिलिटी, से बात की। उनसे समझने की कोशिश की कि सीटी स्कैन कराने की जरूरत किसे है और इससे क्या पता चलता है?

किन कोरोना पॉजिटिव पेशेंट्स को सीटी स्कैन करने की जरूरत है?

  • 85% से 90% मरीजों को सीटी स्कैन कराने की जरूरत ही नहीं होती है। ज्यादातर कोरोना मरीज माइल्ड से मॉडरेट लक्षणों वाले होते हैं। सीटी स्कैन सिर्फ मॉडरेट से गंभीर किस्म के लक्षणों वाले मरीजों के लिए जरूरी है। वह भी कुछ ही परिस्थितियों में।
  • हम यह देखने के लिए सीटी स्कैन नहीं कराते कि मरीज कोरोना पॉजिटिव है या नहीं। RT PCR की जगह सीटी स्कैन का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। यह अच्छी मेडिकल प्रैक्टिस नहीं है।

किन परिस्थितियों में डॉक्टर सीटी स्कैन कराने की सलाह देते हैं?

  • अगर कोरोना इन्फेक्शन के मरीज को मध्यम से गंभीर किस्म के लक्षण दिख रहे हैं और वह ICU में एडमिट है तभी सीटी स्कैन कराया जाता है। डॉक्टर ट्रीटमेंट तय करने के लिए इन्फेक्शन का स्तर देखने की कोशिश करते हैं।
  • कोरोना से इन्फेक्ट होने पर शुरुआत में कभी भी सीटी स्कैन कराने की सलाह नहीं दी जाती क्योंकि इसके नतीजों से सही तस्वीर सामने नहीं आती। कोरोना वायरस शुरुआती दिनों में नाक में होता है। फिर वह सीने में जाता है। इस वजह से डॉक्टर इन्फेक्शन के प्रसार और गंभीरता को देखने के लिए 5-7 दिन बाद ही सीटी स्कैन करने की सलाह देते हैं।
  • कई मरीज गलत सलाह लेते हैं और दूसरे दिन ही सीटी स्कैन कराने पहुंच जाते हैं। इस वजह से सीटी स्कैन से पहले X-रे कराना बेहतर विकल्प है। यह सुरक्षित है। सस्ता है और इसके नतीजे भी जल्दी सामने आते हैं।
  • आदर्श परिस्थिति में सीटी स्कैन सिर्फ डॉक्टर की सलाह पर ही होने चाहिए। आजकल कई लोग बिना डॉक्टरी सलाह के ही सीटी स्कैन कराने पहुंच रहे हैं और सीटी स्कैन सेंटरों पर अनावश्यक दबाव बना रहे हैं। यह सही नहीं है।

क्या चेस्ट के एक्स-रे से इन्फेक्शन का स्तर पता चल सकता है?

  • हां। निश्चित तौर पर। अच्छा चेस्ट X-रे कोरोना इन्फेक्शन बता सकता है। यह डायग्नोज करने और मरीजों के इलाज में भी डॉक्टर की मदद करता है। इसके साथ-साथ X-रे की रेडिएशन के साइड इफेक्ट्स सीटी स्कैन के मुकाबले बहुत कम होते हैं।

सीटी स्कैन से होने वाले नुकसान क्या हैं?

  • सीटी स्कैन के दौरान मरीज बहुत अधिक मात्रा में रेडिएशन का सामना करता है। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की एक स्टडी के मुताबिक चेस्ट X-रे के मुकाबले चेस्ट सीटी स्कैन में 70 गुना अधिक रेडिएशन होती हैं। अगर X-रे में इन्फेक्शन का पैच दिखता है तो डॉक्टर एक और टेस्ट यानी सीटी स्कैन के लिए कह सकता है। लंबी अवधि में सीटी स्कैन कैंसर, ब्रोंको से जुड़ी समस्याएं पैदा कर सकता है।

सीटी स्कैन के अलावा इन्फेक्शन की गंभीरता को जांचने के और क्या उपाय हैं?

  • रैपिड एंटीजन टेस्ट भी विकल्प के तौर पर इन्फेक्शन देखने के लिए किया जा सकता है। सबसे अच्छा वर्जन है जेनएक्सपर्ट (Genexpert) टेस्ट। यह पहले टीबी का पता लगाने क लिए किया जाता था। अब कोरोना की जांच में भी होता है। जेनेएक्सपर्ट में 20-40 मिनट में नतीजे मिल जाते हैं। यह टेस्ट सिर्फ बड़े अस्पतालों में ही उपलब्ध है। इसके बारे में जागरूकता भी बढ़ रही है। जेनेएक्सपर्ट टेस्ट का सेंसिटिविटी रेट यानी एफिकेसी 100% है।
  • इस तरह से मेडिकल प्रोफेशनल्स पता करते हैं कि इन्फेक्शन किस स्तर पर हो चुका है। नतीजों का आकलन करते हैं और उसे आधार बनाकर इलाज करते हैं। यह डॉक्टरों को सही ट्रीटमेंट प्लान बनाने में मदद करता है। कितने स्टेरॉयड्स देना है या नहीं देना है, अस्पताल में भर्ती करने की आवश्यकता है या नहीं, यह सब इससे ही तय होता है।
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