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भास्कर एक्सप्लेनर:भारत में कोरोना की दूसरी लहर की वजह कहीं नया डबल म्यूटेंट वैरिएंट तो नहीं? जानिए क्या कह रहे हैं एक्सपर्ट

7 महीने पहलेलेखक: रवींद्र भजनी
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भारत में कोरोना वायरस इंफेक्शन के नए मामलों के आंकड़े डराने वाले हैं। 15 फरवरी के बाद से शुरू हुई दूसरी लहर रफ्तार पकड़ रही है। बुधवार को पांच महीने में पहली बार 53 हजार से ज्यादा नए केस दर्ज हुए। एक्टिव केस भी लगातार बढ़ रहे हैं। यह नए केस म्यूटेशंस की वजह से बने कोरोना वायरस के नए वैरिएंट्स का कारण भी हो सकते हैं। इसमें सबसे खतरनाक वैरिएंट महाराष्ट्र में सामने आया है, जिसमें दो जगहों पर म्यूटेशन (बदलाव) हुए हैं।

केंद्र सरकार का कहना है कि 18 राज्यों में कोरोना वैरिएंट्स मिले हैं। इन्हें वैरिएंट्स ऑफ कंसर्न (चिंताजनक वैरिएंट्स या VOC) कहा जा सकता है। डबल म्यूटेंट वैरिएंट महाराष्ट्र से जांच के लिए भेजे गए सैम्पल्स में से 20% में मिला है। जिस तरह महाराष्ट्र में सामने आ रहे नए केस रिकॉर्ड बना रहे हैं, हेल्थ एक्सपर्ट चिंतित हैं और उन्हें डर है कि यह डबल म्यूटेंट इंफेक्शन रेट बढ़ा सकता है।

ये वैरिएंट्स क्या हैं और उनसे क्या खतरा है?

  • देश की नामी वैक्सीन साइंटिस्ट और वेल्लोर मेडिकल कॉलेज की प्रोफेसर डॉ. गगनदीप कंग के मुताबिक वायरस में म्यूटेशन कोई नई बात नहीं है। यह स्पेलिंग में होने वाली गलती की तरह है। वायरस लंबे समय तक जीवित रहने और ज्यादा से ज्यादा लोगों को इंफेक्ट करने के लिए अपने जीनोम में बदलाव करते हैं। ऐसे ही बदलाव कोरोना वायरस में भी हो रहे हैं।
  • वहीं, महामारी विशेषज्ञ डॉ. चंद्रकांत लहारिया के मुताबिक, वायरस जितना ज्यादा मल्टीप्लाई होता है, उसमें म्यूटेशन होते हैं। जीनोम में होने वाले बदलावों को ही म्यूटेशन कहते हैं। इससे नए और बदले रूप में वायरस सामने आता है, जिसे वैरिएंट कहते हैं।
  • महाराष्ट्र में जो डबल म्यूटेंट वैरिएंट सामने आया है, उस पर स्टडी चल रही है। डॉ. लहारिया कहते हैं कि सिंगल म्यूटेशन की तुलना में आम तौर पर डबल म्यूटेंट वैरिएंट में इंफेक्शन की दर बढ़ाने की क्षमता ज्यादा होती है। महाराष्ट्र से भेजे गए सैम्पल्स में से 20% में ही यह डबल म्यूटेंट वैरिएंट मिला है।

भारत में अब तक कितने वैरिएंट्स सामने आए हैं?

  • केंद्र सरकार का कहना है कि जब से SARS-CoV-2 कंसोर्टियम ऑन जीनोमिक्स (INSACOG) ने काम शुरू किया है, 771 VOC सामने आए हैं। यह INSACOG मुख्य रूप से 10 राष्ट्रीय लैबोरेटरी का ग्रुप है, जो नए सैम्पल्स की जीनोम सीक्वेंसिंग कर रहा है। यह एक टेस्टिंग प्रक्रिया है जिससे वायरस के जेनेटिक कोड की मैपिंग की जाती है। वायरस का जेनेटिक कोड एक इंस्ट्रक्शन मैनुअल की तरह काम करता है।
  • राज्यों ने इस ग्रुप से 10,787 पॉजिटिव सैम्पल शेयर किए थे। जीनोम सीक्वेंसिंग में सबसे ज्यादा 736 सैम्पल्स UK वैरिएंट्स के मिले हैं। वहीं, 34 सैम्पल्स दक्षिण अफ्रीकी वैरिएंट के और 1 सैम्पल ब्राजील वैरिएंट का था। वैसे, महाराष्ट्र में मिले डबल म्यूटेशन वैरिएंट को VOC नहीं कहा गया है। फिलहाल भारत में UK, दक्षिण अफ्रीकी और ब्राजील के वैरिएंट्स को भारत में VOC कहा जा रहा है।
  • पंजाब में एनालाइज किए गए 400 सैम्पल्स में से 320 में UK वैरिएंट मिला है। केरल के 2,032 सैम्पल की सीक्वेंसिंग की गई। इम्यून एस्कैप से जुड़ा N440K वैरिएंट 123 सैम्पल्स में मिला। पहले यह वैरिएंट आंध्रप्रदेश के 33% सैम्पल्स में और तेलंगाना के 104 में 53 सैम्पल्स में मिला था। यह वैरिएंट UK, डेनमार्क, सिंगापुर, जापान और ऑस्ट्रेलिया समेत 16 अन्य देशों में मिला है।

...तो क्या नए वैरिएंट्स की वजह से ही आई है कोरोना की दूसरी लहर?

  • भारत सरकार का दावा है कि अब तक कोई सबूत नहीं मिला है कि इन वैरिएंट्स की वजह से ही भारत में कोरोना के केस तेजी से बढ़े हैं। डॉ. लहारिया कहते हैं कि इसके लिए जीनोम स्टडी बढ़ाने की जरूरत है। इससे ही वायरस को कंट्रोल करने में मदद मिलेगी।
  • विशेषज्ञों के अनुसार अक्सर अपनी मारक क्षमता बढ़ाने और लंबे समय तक जीवित रहने के लिए वायरस म्यूटेशन करते हैं। उनके जीनोम सीक्वेंसिंग में बदलाव होता है। हम देख चुके हैं कि UK का कोरोना वैरिएंट 70% ज्यादा तेजी से फैला। ब्रिटेन में दूसरी लहर में जो केस बढ़े थे, उनमें हम यह देख चुके हैं।
  • डॉ. कंग कहती हैं कि कोरोना वायरस अब ऐसी दिशा में आगे बढ़ रहा है, जहां उसमें म्यूटेशन तो होता ही रहेगा। इस प्रक्रिया को आप नहीं रोक सकते। आप सिर्फ कोविड-19 प्रोटोकॉल का पालन कर सकते हैं। सोशल डिस्टेंसिंग रखें, टेस्टिंग और ट्रेसिंग जारी रखें और हाथों को बार-बार धोते रखें। सेनेटाइजर का इस्तेमाल करें। इससे ही आप बचे रह सकते हैं।

क्या ये नए वैरिएंट्स चिंता का कारण हैं?

  • हां। कुछ हद तक। डॉ. लहारिया कहते हैं कि जीनोम सीक्वेंसिंग बढ़ानी होगी। उससे ही पता चलेगा कि नए वैरिएंट्स चिंता का कारण हैं या नहीं। वैसे, जब वायरस ज्यादा फैलता है तो उसके तुलनात्मक रूप से कमजोर वैरिएंट्स बनते हैं। यह फैलता तो तेजी से है पर उसका जानलेवा असर कम होने लगता है। यह नेचुरल प्रोसेस है। कुछ दिनों में अगर कोरोना वायरस भी आम सर्दी-खांसी के वायरस जैसा हो जाए, तो इस पर आश्चर्य नहीं होगा।
  • नए वैरिएंट्स अक्सर शरीर के इम्यून सिस्टम को चकमा देने में कामयाब हो जाते हैं। शरीर में जाते हैं और अपनी संख्या बढ़ाते हैं। अब तक यह नहीं पता है कि कोरोना वायरस इंफेक्शन के इलाज में इस्तेमाल हो रही दवाओं और दोनों वैक्सीन इन वैरिएंट्स पर असरदार है या नहीं। इसके लिए और स्टडी करने की जरूरत है। भारत में अब तक 10 हजार सैम्पल्स की ही स्टडी हो सकी है। यह कुल केस का 5% भी नहीं है। वहीं, अमेरिका और चीन में एक लाख से ज्यादा सैम्पल्स की जीनोम सीक्वेंसिंग हो चुकी है।
  • एक्सपर्ट्स यह भी कह रहे हैं कि इन म्यूटेशंस की वजह से रीइंफेक्ट होने का खतरा भी बढ़ रहा है। यानी जिन्हें कोरोना वायरस इंफेक्शन हो चुका है और निगेटिव हो चुके हैं, उन्हें भी इन नए वैरिएंट्स की वजह से दोबारा इंफेक्शन होने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। हां, यह बात अलग है कि कोरोना वायरस पहले जैसा जानलेवा नहीं रहेगा। यानी गंभीर स्थिति होने की आशंका कम है।
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