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भास्कर एक्सप्लेनर:कोरोना के 2 नए वैरिएंट 'म्यू' और C.1.2 से खतरा बढ़ा; इन पर वैक्सीन बेअसर, इम्यूनिटी को भी पहुंचा सकते हैं नुकसान

22 दिन पहलेलेखक: रवींद्र भजनी

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने जनवरी में कोलंबिया में मिले B.1.621 वैरिएंट को ग्रीक अल्फाबेट के आधार पर 'म्यू' नाम दिया है। साथ ही इस वैरिएंट को 'वैरिएंट्स ऑफ इंटरेस्ट' की सूची में शामिल कर लिया है। WHO का कहना है कि वैरिएंट में ऐसे म्यूटेशंस हैं जो वैक्सीन के असर को कम करते हैं। इस संबंध में और स्टडी करने की जरूरत है।

WHO की नए वैरिएंट बुलेटिन में कहा गया है कि म्यू वैरिएंट में ऐसे म्यूटेशंस हुए हैं, जो इम्यून एस्केप की आशंका बताते हैं। इम्यून एस्केप का मतलब है कि यह वैरिएंट आपके शरीर में वायरस के खिलाफ बनी इम्यूनिटी को चकमा दे सकता है। इसके अलावा एक और वैरिएंट C.1.2 दक्षिण अफ्रीका में मिला है। इसे फिलहाल WHO ने ग्रीक नाम नहीं दिया है, पर यह भी इम्यूनिटी को चकमा देने की क्षमता रखता है।

अब तक भारत में अल्फा और डेल्टा वैरिएंट ही हावी रहे हैं। दूसरी लहर के लिए तो डेल्टा वैरिएंट को ही जिम्मेदार ठहराया गया है। अच्छी और राहत की बात यह है कि देश में अब तक म्यू और C.1.2 वैरिएंट का एक भी केस नहीं मिला है।

दुनियाभर में मिल रहे नए वैरिएंट्स को लेकर कई सवाल हैं। क्या यह खतरनाक हैं? क्या इन वैरिएंट्स के खिलाफ वैक्सीन कारगर है? क्या भारत में ये तीसरी लहर का कारण बन सकते हैं? आइए जानते हैं...

कोरोना के वैरिएंट्स को लेकर क्या नई जानकारी मिली है?

पिछले दिनों दो नए वैरिएंट्स (B.1.621 और C.1.2) ने दुनियाभर के विशेषज्ञों को अलर्ट कर दिया है। इसमें से एक B.1.621 जनवरी में सबसे पहले कोलंबिया में मिला था। इसे WHO ने ग्रीक अल्फाबेट से ‘म्यू’ नाम देकर वैरिएंट्स ऑफ इंटरेस्ट की सूची में शामिल किया है। दूसरा वैरिएंट (C.1.2) दक्षिण अफ्रीका में मिला है।

दोनों ही वैरिएंट्स वैक्सीन और नेचुरल इन्फेक्शन से शरीर में बनी इम्यूनिटी को चकमा देने की क्षमता रखते हैं। इसका मतलब है कि इन वैरिएंट्स के सामने वैक्सीन भी बेअसर हो सकती है।

  • C.1.2 वैरिएंटः यह वैरिएंट किस हद तक एंटीबॉडी को चकमा देने में काबिल है, इस पर WHO का कहना है कि यह बीटा (B.1.351) वैरिएंट जैसा है जो दक्षिण अफ्रीका में दिसंबर 2020 में मिला था। इसे WHO ने वैरिएंट्स ऑफ कंसर्न (VoC) में शामिल किया था। दक्षिण अफ्रीका के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ कम्युनिकेबल डिजीज (NICD) के रिसर्चर्स का कहना है कि C.1.2 में कुछ म्यूटेशंस बीटा और डेल्टा वैरिएंट जैसे ही हैं। उनके साथ-साथ कई और म्यूटेशंस भी हुए हैं।
  • म्यू वैरिएंटः यह वैरिएंट सबसे पहले जनवरी में कोलंबिया में मिला था, पर उसके बाद यह दक्षिण अमेरिकी और यूरोप के कुछ देशों में मिला है। 29 अगस्त को जारी वैरिएंट बुलेटिन में WHO ने कहा है कि म्यू (B.1.621) और उससे जुड़े एक वैरिएंट B.1.621.1 दुनिया के 39 देशों में डिटेक्ट हुआ है। WHO का कहना है कि म्यू वैरिएंट का दुनियाभर में प्रसार कम हुआ है और यह 0.1% रह गया है। इसके बाद भी कोलंबिया में 39% और इक्वाडोर में 13% केसेज में म्यू वैरिएंट मिला है।

क्या इन्हें लेकर चिंतित होने की जरूरत है?

  • फिलहाल तो नहीं। दोनों ही वैरिएंट्स की एक्टिविटी पर नजर रखी जा रही है। स्टडी की जा रही है। फिर नतीजों के आधार पर तय होगा कि यह कितने खतरनाक हो सकते हैं। दोनों में से सिर्फ म्यू वैरिएंट को ही WHO ने वैरिएंट ऑफ इंटरेस्ट की सूची में शामिल किया है। दूसरे को तो अभी तक ग्रीक नाम भी नहीं दिया गया है।
  • WHO ने चार वैरिएंट्स को वैरिएंट्स ऑफ कंसर्न की सूची में रखा हुआ है। इसमें अल्फा 193 देशों में मौजूद है, जबकि डेल्टा 170 देशों में। WHO ने पांच वैरिएंट्स को वैरिएंट्स ऑफ इंटरेस्ट की लिस्ट में रखा है, जिसमें म्यू शामिल है। इन वैरिएंट्स के फैलने की संभावनाओं की निगरानी की जा रही है और स्टडीज चल रही है।
  • WHO का कहना है कि नए वायरस म्यूटेशंस का मिलना चिंताजनक है। दुनियाभर में केस फिर तेजी से बढ़ने लगे हैं। अब तक नए केसेज के लिए सबसे ज्यादा इन्फेक्शियस डेल्टा वैरिएंट को ही जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। यह उन इलाकों में ज्यादा तेजी से फैल रहा है, जहां लोग कम वैक्सीनेटेड हैं और जहां लॉकडाउन के उपायों को हटाया जा रहा है।

क्या कोरोना के नए वैरिएंट्स के खिलाफ वैक्सीन इफेक्टिव रहेगी?

  • नहीं। WHO की रिपोर्ट के मुताबिक दोनों ही वैरिएंट्स ने ऐसी प्रॉपर्टी दिखाई है कि वे वैक्सीन से बनी इम्यूनिटी को चकमा दे सकते हैं। WHO का कहना है कि वायरस इवॉल्यूशन वर्किंग ग्रुप का शुरुआती डेटा बताता है कि म्यू वैरिएंट कुछ-कुछ बीटा वैरिएंट जैसा ही है। वैक्सीन कितनी इफेक्टिव है, यह देखने के लिए और स्टडी करने की जरूरत है।
  • अब तक तो यह साबित हो चुका है कि अल्फा, बीटा, गामा और डेल्टा वैरिएंट्स के खिलाफ वैक्सीन इफेक्टिव है। यह इफेक्टिवनेस अलग-अलग है। कुछ स्टडीज में कहा गया है कि वैरिएंट्स से बचने के लिए वैक्सीन के दोनों डोज लेना जरूरी है। खासकर भारत में लग रही कोवीशील्ड के। तभी वह प्रभावी तरीके से डेल्टा और अन्य वैरिएंट्स के खिलाफ प्रोटेक्शन की लेयर बनाती है।
  • जहां तक म्यू वैरिएंट की बात है, इसे VoI में शामिल किया गया है। इसका मतलब है कि कोरोना वायरस की संरचना में ऐसे बदलाव हुए हैं, जो इसे ज्यादा इन्फेक्शियस बनाते हैं। यह गंभीर लक्षणों का कारण बन सकता है। इम्यूनिटी को चकमा दे सकता है। डायग्नोसिस में डिटेक्शन से बच सकता है और इलाज भी बेअसर हो सकता है। इस संंबंध में फिलहाल यह कहना मुश्किल है कि म्यू या C.1.2 से बचाने में वैक्सीन या मौजूदा दवाएं कारगर हैं या नहीं।

ये वैरिएंट्स क्या हैं और इनसे क्या खतरा है?

  • देश की नामी वैक्सीन साइंटिस्ट और क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज, वेल्लोर की प्रोफेसर डॉ. गगनदीप कंग के मुताबिक वायरस में म्यूटेशन कोई नई बात नहीं है। यह स्पेलिंग मिस्टेक की तरह है। वायरस लंबे समय तक जीवित रहने और ज्यादा से ज्यादा लोगों को इन्फेक्ट करने के लिए जीनोम में बदलाव करते हैं। ऐसे ही बदलाव कोरोना वायरस में भी हो रहे हैं।
  • महामारी विशेषज्ञ डॉ. चंद्रकांत लहारिया के मुताबिक वायरस जितना ज्यादा मल्टीप्लाई होता है, उसमें म्यूटेशन होते जाएंगे। जीनोम में होने वाले बदलावों को ही म्यूटेशन कहते हैं। इससे नए और बदले रूप में वायरस सामने आता है, जिसे वैरिएंट कहते हैं।
  • WHO की एक रिपोर्ट कहती है कि वायरस जितने समय तक हमारे बीच रहेगा, उतने ही उसके गंभीर वैरिएंट्स सामने आने की आशंका बनी रहेगी। अगर इस वायरस ने जानवरों को इन्फेक्ट किया और ज्यादा खतरनाक वैरिएंट्स बनते चले गए तो इस महामारी को रोकना बहुत मुश्किल होने वाला है।

क्या सभी वैरिएंट्स खतरनाक होते हैं?

  • नहीं। वैरिएंट ज्यादा या कम खतरनाक हो सकता है। यह इस बात पर डिपेंड करता है कि उसके जेनेटिक कोड में किस जगह म्यूटेशन हुआ है। म्यूटेशन ही तय करता है कि कोई वैरिएंट कितना इन्फेक्शियस है? वह इम्यून सिस्टम को चकमा दे सकता है या नहीं? वह गंभीर लक्षणों की वजह बन सकता है या नहीं?
  • उदाहरण के लिए अल्फा वैरिएंट ओरिजिनल वायरस से 43% से 90% तक ज्यादा इन्फेक्शियस है। अल्फा वैरिएंट की वजह से गंभीर लक्षण भी दिखे और मौतें भी हुईं। जब डेल्टा वैरिएंट सामने आया तो यह अल्फा वैरिएंट से भी ज्यादा इन्फेक्शियस निकला। अलग-अलग स्टडी में यह ओरिजिनल वायरस के मुकाबले 1000 गुना ज्यादा इन्फेक्शियस मिला है।

क्या और भी वैरिएंट्स आ सकते हैं?

  • हां। इस समय पूरी दुनिया में भारत में सबसे पहले मिला कोरोना का डेल्टा वैरिएंट तेजी से फैल रहा है, पर कुछ अन्य वैरिएंट्स भी तेजी से बढ़ रहे हैं। उन्हें भी वैज्ञानिक ट्रैक कर रहे हैं। WHO ने भी करीब 16 वैरिएंट्स को निगरानी सूची में डाल रखा है। इन पर स्टडी चल रही है। ताकि इम्यूनिटी को होने वाले नुकसान का आकलन किया जा सके।
  • पेरू में सबसे पहले दिखे लेम्ब्डा वैरिएंट को भी नए खतरे के तौर पर देखा जा रहा था। बाद में इसके केस तेजी से घटते चले गए। रॉयटर्स की एक रिपोर्ट कहती है कि भले ही लेम्ब्डा वैरिएंट को WHO ने वैरिएंट्स ऑफ इंटरेस्ट की सूची में रखा हो, पर अभी इसके इन्फेक्शियस होने या गंभीर लक्षण बढ़ाने की क्षमता की पड़ताल हो रही है। इस बीच ईटा वैरिएंट भी चर्चा में आया है। भारत में तो ईटा वैरिएंट के कई केस भी सामने आ चुके हैं।
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