भास्कर एक्सप्लेनर:क्या कोरोना की दूसरी लहर में प्रेग्नेंसी और बच्चे को जन्म देना सुरक्षित है? जानिए क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स

2 वर्ष पहलेलेखक: रवींद्र भजनी
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पिछले हफ्ते मेडिकल जर्नल द लैंसेट में प्रकाशित एक रिव्यू के अनुसार कोविड-19 की वजह से मां ही नहीं, पेट में पल रहे नवजात शिशुओं को भी खतरा बढ़ गया है। जनवरी 2020 से जनवरी 2021 के बीच मृत बच्चे के जन्म (स्टिलबर्थ) और प्रसव के दौरान मां की मौत के मामले तीन गुना तक बढ़ गए हैं। एक्टोपिक प्रेग्नेंसी के मामले 6 गुना बढ़े हैं। इसमें भ्रूण महिला की कोख के बाहर बढ़ने लगता है, जो जानलेवा ब्लीडिंग का कारण बन सकता है।

द लैंसेट में प्रकाशित रिव्यू में 17 देशों में की गई 40 स्टडी के डेटा को एनालाइज किया गया है। लंदन के सेंट जॉर्ज यूनिवर्सिटी के रिसर्चर्स का कहना है कि महामारी की वजह से प्रेग्नेंसी में सही तरीके से इलाज नहीं मिल पा रहा है और समस्याएं बढ़ रही हैं। अस्पतालों में कोविड-19 मरीजों की भीड़ है। कुछ महिलाएं तो कोविड-19 के डर से डॉक्टरों तक पहुंचने में भी डर रही हैं। महिलाओं में डिप्रेशन कई गुना बढ़ गया है। 10 में से 6 स्टडी में रिसर्चर्स ने इसकी पुष्टि की है। प्रेग्नेंट महिलाओं में एंग्जाइटी भी तुलनात्मक रूप से बढ़ी है।

क्या दूसरी लहर में प्रेग्नेंसी और मां बनना सुरक्षित है?

  • हां। काफी हद तक। मुंबई में मलाड के ली नेस्ट हॉस्पिटल में ऑब्स्टेट्रिशियन और गायनेकोलॉजिस्ट डॉ. मुकेश गुप्ता का कहना है कि वायरस नए अवतार में सामने आ रहा है। उसके नए स्ट्रेन सामने आ रहे हैं। प्रेग्नेंसी और पेट में पल रहे बच्चे पर इसके असर को लेकर कई तरह की बातें सामने आ रही हैं। सच तो यह है कि प्रेग्नेंट महिलाएं सही तरीके से अपना ख्याल रखती हैं तो कोई दिक्कत नहीं आने वाली। हमने कोरोना काल में भी प्रेग्नेंसी देखी है और प्रसव कराए हैं।
  • वहीं, मुंबई के जसलोक हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर में ऑब्स्टेट्रिक्स और गायनेकोलॉजी डिपार्टमेंट में कंसल्टंट डॉ. शिल्पा अग्रवाल का कहना है कि प्रेग्नेंसी के दौरान शरीर की इम्युनिटी में बदलाव होता है। इम्यून सिस्टम पर असर पड़ता है। प्रेग्नेंसी में सांस से जुड़े इन्फेक्शन सामान्य होते हैं। प्रेग्नेंट महिलाओं को भी कोविड-19 से उतना ही खतरा है, जितना अन्य वयस्कों को। हां, यह बात अलग है कि एहतियात के तौर पर उन्हें तत्काल ICU में एडमिट किया जाता है। उनमें गंभीर लक्षण भी देखे जा सकते हैं।
  • डॉ. अग्रवाल का कहना काफी हद तक सही भी है। वह कहती हैं कि इम्युनिटी में होने वाले बदलाव और घर पर होने वाली देखभाल की तुलना में अस्पताल में ज्यादा अच्छे-से ध्यान रखा जा सकता है। ऐसे में अगर कोई प्रेग्नेंट महिला कोविड-19 पॉजिटिव होती है तो उसे तत्काल अस्पताल में भर्ती हो जाना चाहिए।

पेट में पल रहे बच्चे का क्या होगा?

  • इंटरनेशनल स्तर पर हुई स्टडी कहती है कि स्टिलबर्थ बढ़ा है। पर उसकी वजह इन्फेक्शन नहीं है। इन्फेक्शन से जुड़े अन्य विकार इसका कारण बन रहे हैं। डॉ. अग्रवाल कहती हैं कि पहली लहर में भी हमने प्रेग्नेंट महिलाओं को देखा है। इससे हमने इस इन्फेक्शन के साथ रहते हुए आगे बढ़ना सीखा है। इस वजह से हम कोरोना इन्फेक्शन से लड़ने में काफी हद तक तैयार हैं।
  • डॉक्टर कहते हैं कि वर्टिकली देखने पर बच्चे में इन्फेक्शन नहीं दिखा है। यानी पेट में पल रहे बच्चे पर कोविड-19 पॉजिटिव मां के इन्फेक्शन का असर नहीं होता। पर प्रीमैच्योर डिलीवरी बढ़ी है। इस वजह से इस स्थिति को गंभीरता से लेने की जरूरत है।

प्रेग्नेंसी में क्या करें?

  • डॉ. गुप्ता कहते हैं कि पिछले एक साल में हमने सख्त सुरक्षा मापदंड अपनाए हैं और इससे सुरक्षित प्रसव कराने में मदद मिली है। हां, जो महिलाएं प्रेग्नेंट हैं उनकी उचित देखभाल जरूरी है। सरकार ने जो कोविड-19 प्रोटोकॉल जारी किया है, उसका पालन करना होगा। सोशल डिस्टेंसिंग रखनी होगी और भीड़ से बचना होगा।
  • वहीं, डॉ. अग्रवाल कहती हैं कि ज्यादातर अस्पतालों ने टेलीमेडिसिन, ऑनलाइन कंसल्टेशन उपलब्ध कराई है। ऐसे में सोशल डिस्टेंसिंग, हाथों की सफाई, मास्क, ग्लोव्स, पीपीई जैसे प्रोटेक्टिव गियर को महत्व देना जरूरी है। हम कोविड-19 के साथ प्रेग्नेंसी को मैनेज करने में सक्षम हैं।

इबोला महामारी के बाद भी ऐसे ही नतीजे दिखे थे

  • द लैंसेट का रिव्यू कहता है कि हायर इनकम देशों में प्रीमैच्योर प्रेग्नेंसी के मामले अन्य गरीब और मध्यम इनकम वाले देशों के मुकाबले 10% कम रहे। एमोरी यूनिवर्सिटी में गायनेकोलॉजी और ऑब्स्टेट्रिक्स में जेम्स रॉबर्ट मैककॉर्ड चेयर डॉ. डेनिस जैमिसन का कहना है कि स्टडी के नतीजे चिंताजनक हैं।
  • डॉ. जैमिसन अमेरिकन कॉलेज ऑफ ऑब्स्टेट्रिशियंस और गायनेकोलॉजिस्ट के कोविड-19 ओबी एक्सपर्ट वर्क ग्रुप के सदस्य भी हैं। उनका कहना है कि कोरोना इन्फेक्शन के बाद भी महामारी का असर लंबे समय तक रहने वाला है। यह महामारी के बाद भी जच्चा-बच्चा दोनों को प्रभावित कर सकता है। 2013 में इबोला महामारी से जो देश प्रभावित हुए थे, वहां भी इसी तरह की समस्याएं देखने में आई थीं।
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