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भास्कर एक्सप्लेनर:कोरोना की जांच में RT-PCR में आने वाली CT वैल्यू क्या है? इससे क्या पता चलता है आपके इन्फेक्शन के बारे में?

9 दिन पहले
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कोरोना के बढ़ते आंकड़ों के बीच वैक्सीनेशन और टेस्टिंग पर जोर दिया जा रहा है। हल्के लक्षण दिखते ही आपको सलाह दी जाती है कि कोरोना का टेस्ट कराएं। कोरोना की पुष्टि के लिए भी अलग-अलग टेस्ट होते है जैसे रैपिड एंटीजन टेस्ट, RT-PCR टेस्ट आदि। इसमें RT-PCR टेस्ट को गोल्ड स्टैंडर्ड टेस्ट माना गया है। यानी इस टेस्ट के नतीजे अन्य टेस्ट के मुकाबले ज्यादा सटीक होते है।

आइए समझते हैं कि RT-PCR क्या है, यह कैसे किया जाता है और इसमें सबसे जरूरी CT वैल्यू क्या है...

RT-PCR टेस्ट होता क्या है?
RT- PCR टेस्ट यानी रिवर्स ट्रांसक्रिप्शन पोलीमरेज़ चेन रिएक्शन टेस्ट। इस टेस्ट में किसी भी वायरस के जेनेटिक मटेरियल को टेस्ट किया जाता है। दरअसल, कोरोना वायरस एक RNA वायरस है यानी यह केवल RNA प्रोटीन से बना है। इसलिए कोरोना वायरस के RNA को पहले DNA में बदला जाता है। इस प्रक्रिया को रिवर्स ट्रांसक्रिप्शन कहा जाता है। फिर इस DNA में चेन रिएक्शन करवाई जाती है। आसान भाषा में इसे आप फोटोकॉपी की तरह मान सकते हैं। इस चेन रिएक्शन के जरिए सैंपल में कोरोना वायरस का पता लगाया जाता है।

CT वैल्यू क्या है?
आसान भाषा में समझें तो आपके DNA में कितनी बार चेन रिएक्शन करवाई जाए, जिससे वायरस के होने या न होने की पुष्टि हो जाए, इसे ही CT वैल्यू यानी साइकिल थ्रेशोल्ड कहते है। ICMR ने कोरोना वायरस की पुष्टि के लिए ये संख्या 35 निर्धारित कर रखी है। यानी एक सैंपल में 35 बार ही ये रिएक्शन करवाना है।

CT वैल्यू का संक्रमण से क्या लेना-देना है?
लोगों को ये भ्रम रहता है कि कम CT वैल्यू का मतलब कम संक्रमण, लेकिन CT वैल्यू का संक्रमण से एकदम उल्टा संबंध है। यानी CT वैल्यू जितनी कम, संक्रमण उतना ही ज्यादा और CT वैल्यू जितनी ज्यादा, संक्रमण उतना ही कम।

कैसे डिसाइड होता है कि सैंपल पॉजिटिव है या निगेटिव?
किसी भी सैंपल को पॉजिटिव या निगेटिव मानने के लिए CT वैल्यू को आधार बनाया जाता है। फिलहाल ICMR ने CT वैल्यू 35 निर्धारित कर रखी है। यानी 35 और इससे कम CT वैल्यू के सभी सैंपल पॉजिटिव माने जाएंगे और 35 के ऊपर के सभी सैंपल निगेटिव।

इन्फेक्शन होने पर भी RT-PCR निगेटिव क्यों आ रहा है?
मुंबई के जसलोक हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर में कंसल्टंट डॉ. पिनांक पांड्या का कहना है कि कहीं न कहीं नए वैरिएंट्स इसके लिए जिम्मेदार हैं। दरअसल, RT-PCR S-जीन को डिटेक्ट करता है। HV69 और HV70 को डिटेक्ट नहीं कर रहा। S-जीन की रिपोर्ट निगेटिव आने पर लैब निगेटिव रिपोर्ट दे देते हैं। ORF और N जीन पॉजिटिव आते हैं तो उसे निगेटिव नहीं मानते।
वहीं, मुंबई में पीडी हिंदुजा हॉस्पिटल एंड मेडिकल रिसर्च सेंटर, खार फेसिलिटी के हेड क्रिटिकल केयर डॉ. भरेश डेढ़िया कहते हैं कि RT-PCR टेस्ट वायरस के RNA को डिटेक्ट करता है। नए वैरिएंट्स में RNA में बड़ा बदलाव नहीं हुआ है। समस्या यह है कि RT-PCR टेस्ट का एफिकेसी रेट 60-70% , जिसका मतलब है कि 30-40% पॉजिटिव केसेज निगेटिव रिजल्ट दे सकते हैं।
उनका कहना है कि अन्य टेस्ट की बात करें तो रैपिड एंटीजन टेस्ट का एफिकेसी रेट 50-60% है, जो RT-PCR से काफी कम है। पहली बार में RT-PCR टेस्ट में एफिकेसी रेट 60-70% है। वहीं दो दिन के अंतर से दूसरी बार टेस्ट करेंगे तो एफिकेसी रेट 80% होगा। तीन बार टेस्ट करने पर एफिकेसी रेट 90% हो जाएगा। यानी तीन बार टेस्ट करने पर सबसे सटीक नतीजा मिलेगा। फिर भी बेहतर होगा कि लक्षण होने पर HR-CT टेस्ट करा लिया जाए, जिसका एफिकेसी रेट 80% है। मेडिकल प्रोफेशनल्स ब्लड टेस्ट भी करा रहे हैं, ताकि सही स्थिति का पता चल सके।

RT-PCR निगेटिव आने पर चेस्ट सीटी स्कैन का क्या रोल है?
फेफड़ों में संक्रमण का पता लगाने के लिए चेस्ट का सीटी स्कैन भी किया जाता है। डॉ. चंदानी के मुताबिक कोविड-19 रिपोर्ट निगेटिव आने के बाद लोग अपने घरों में रहते हैं। प्रोटोकॉल का पालन नहीं करते हैं और अन्य लोगों को वायरस ट्रांसमिट कर रहे हैं। जब हम CT स्कैन कराते हैं तो पता चलता है कि फेफड़ों में 10, 20 से 30% तक इन्फेक्शन है। पहली लहर के मुकाबले यह बहुत ज्यादा हो रहा है।
वहीं, भोपाल में ही कोरोना वार्ड में सेवाएं दे रहे डॉ. तेजप्रताप तोमर का कहना है कि पहली और दूसरी लहर में बहुत अंतर है। पहले 10 में से एक मरीज के CT स्कैन में डैमेज दिखता था, अब 10 में से 5-6 मरीज के फेफड़ों में इन्फेक्शन दिख रहा है।

CT स्कोर और CT वैल्यू में क्या अंतर है?
CT वैल्यू RT-PCR से आती है, जिससे पता चलता है कि इन्फेक्शन का स्तर कितना है। इसके मुकाबले CT स्कोर का मतलब है सीटी स्कैन में फेफड़ों को कितना नुकसान पहुंचा है। इन दोनों का आशय भी अलग होता है। CT वैल्यू जितनी कम, उतना ही वायरल लोड ज्यादा। इसी तरह CT स्कोर जितना ज्यादा, फेफड़ों को नुकसान उतना अधिक।

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