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भास्कर इंटरव्यू:घर के बड़े अब कोरोना से सुरक्षित, तीसरी लहर में बच्चों को खतरा; घबराने की जरूरत नहीं, सितंबर तक उनके लिए भी वैक्सीन: डॉ. कंग

9 दिन पहलेलेखक: रवींद्र भजनी
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110 दिन में 1.80 लाख से अधिक लोगों की जान लेने के बाद देश में कोरोना की दूसरी लहर कमजोर पड़ती दिख रही है। लेकिन अब तीसरे लहर की चर्चा है। कहा जा रहा है कि यह बच्चों के लिए अधिक खतरनाक हो सकती है।

तीसरी लहर कब आएगी? आई तो कैसी रहेगी? हमारी तैयारी कैसी है? क्या तब तक वैक्सीन अपना काम कर चुकी होगी? ये ऐसे कई सवाल हैं, जो आपसे सीधे जुड़े हैं।

हमने ऐसे सभी सवाल देश की नामी वैक्सीन वैज्ञानिक डॉ. गगनदीप कंग से पूछे। डॉ. कंग पहली भारतीय महिला वैक्सीन साइंटिस्ट हैं, जिन्हें लंदन की रॉयल सोसायटी ने फैलो बनाया है। वे क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज, वेल्लोर की प्रोफेसर भी हैं।

अब चलते हैं सीधे सवाल-जवाब पर...

भास्करः क्या भारत में कोरोना वायरस की तीसरी लहर आएगी?

डॉ. कंगः हां, बिल्कुल आ सकती है। तीसरी ही नहीं बल्कि चौथी, पांचवीं, छठी लहर भी आ सकती है। पैंडेमिक (महामारी) में यह होता ही है। धीरे-धीरे कमजोर होकर यह एंडेमिक (स्थानीय बीमारी) बन जाएगी। इसकी चिंता नहीं करनी चाहिए कि तीसरी या चौथी लहर आएगी। ज्यादा से ज्यादा लोग वैक्सीनेट हो जाएंगे तो गंभीर लक्षणों के खिलाफ उन्हें प्रोटेक्शन मिल जाएगा। इससे बीमारी खुद-ब-खुद कमजोर हो जाएगी।

भास्करः क्या तीसरी लहर में बच्चे ज्यादा प्रभावित होंगे?

डॉ. कंगः अगर आप व्यापक स्तर पर आंकड़ों की बात करें तो यह सही नहीं है। अनुपात में जरूर ऐसा हो सकता है। चिंतित होना भी चाहिए। अभी हमारा फोकस 18+ को वैक्सीनेट करने पर है। ज्यादा से ज्यादा वयस्क इन्फेक्शन या वैक्सीन से एंटीबॉडी हासिल कर लेंगे तो उनमें केस कम आएंगे। तब इन्फेक्ट होने का खतरा बच्चों को ही रहेगा। भले ही इन्फेक्ट होने वाले बच्चों का आंकड़ा अधिक न हो, अनुपात में वह ज्यादा दिखेगा।
वैसे, ज्यादातर बच्चों में अब तक हल्के लक्षण ही दिखे हैं। कुछ ही बच्चों में मल्टीसिस्टम इनफ्लेमेटरी सिंड्रोम (MIS-C) दिखा है। पर जब इन्फेक्ट होने वाले बच्चों के नंबर बढ़ेंगे तो तुलनात्मक रूप से MIS-C से पीड़ित बच्चों के नंबर भी बढ़ेंगे। ऐसे में अगर सरकार ने पीडियाट्रिक्स को तैयार रहने को बोला है, तो यह अच्छा है।

भास्करः अमेरिका में बच्चों पर सफल रही फाइजर और मॉडर्ना की वैक्सीन क्या भारत में उपलब्ध हो सकती है?

डॉ. कंगः हां, हो सकती है। देखिए, बच्चों और बड़ों के लिए वैक्सीन अलग नहीं होती। एक ही वैक्सीन होती है। बच्चों के लिए डोज एडजस्ट करना होता है। अमेरिका में हमने देखा कि फाइजर और मॉडर्ना की वैक्सीन के उतने ही डोज 12 वर्ष से बड़े बच्चों को भी लग रहे हैं, जितने बड़ों को लगे थे। डोज एडजस्ट करने की जरूरत नहीं पड़ी है। अब अमेरिका में दो साल से कम उम्र के बच्चों में ट्रायल्स चल रहे हैं। यह देखा जा रहा है कि डोज को आधा करना है या क्वार्टर। दो-तीन महीने में हमारे पास रिजल्ट होंगे कि छोटे बच्चों के लिए डोज को घटाने की जरूरत है या नहीं।

भास्करः भारत में बच्चों को कोवैक्सिन कब तक उपलब्ध हो सकती है?

डॉ. कंगः भारत में जून में कोवैक्सिन के ट्रायल्स शुरू हो रहे हैं। इसे ट्रायल्स के बजाय इम्युनोजेनेसिटी स्टडी कहना बेहतर होगा। इसमें यह देखा जाता है कि वैक्सीन इम्यून रिस्पॉन्स पैदा कर रही हैं या नहीं। 28 दिन के गैप से दो डोज दिए जाएंगे। चार हफ्ते बाद सैम्पल लिया जाएगा। दो हफ्ते बाद भी सैम्पल ले सकते हैं। यानी यह स्टडी दो महीने में पूरी हो जानी चाहिए। तीसरे महीने में हमारे पास डेटा उपलब्ध होगा। कोवैक्सिन के ट्रायल्स जून में शुरू हो रहे हैं तो मानकर चलिए कि सितंबर तक वैक्सीन को लाइसेंस मिल सकता है।

भास्करः क्या वयस्कों को वैक्सीन कवर देने से पहले बच्चों को वैक्सीन लगानी चाहिए?

डॉ. कंगः पहले रिस्क ग्रुप्स को कवर करना चाहिए। यूके में देखिए, उन्होंने उम्र को आधार बनाकर स्ट्रैटजी बनाई। पहले 80+ को वैक्सीन ऑफर की, फिर 75+ और 70+ को। इस तरह अब वहां 32 से 33+ को वैक्सीन लग रही है। उनका टारगेट है कि जून तक सभी वयस्क आबादी को कम से कम एक डोज दे दिया जाए।
हमारी सरकार को भी इसी तरह कोई स्ट्रैटजी बनाने की जरूरत है। उन्हें देखना चाहिए कि भारत जैसे बड़े देश में सबके लिए एक साथ वैक्सीनेशन खोलने का कोई लाभ है या नहीं। हमारे यहां भी उम्र को आधार बनाकर वैक्सीनेशन किया जा सकता था।
एक विकल्प यह भी है कि हम लोकेशन बेस्ड स्ट्रैटजी बनाएं। शहरों में ज्यादा इन्फेक्शन है तो वहां पहले वैक्सीन दें। इससे गांवों तक इन्फेक्शन फैलने से रोक सकते हैं। प्रायोरिटी सेट करना सरकार का फैसला है। यह देखना चाहिए कि किस स्ट्रैटजी के क्या लाभ हैं, उस आधार पर ही फैसले लेने चाहिए।

भास्करः क्या आप वैक्सीनेशन की स्पीड से संतुष्ट हैं?

डॉ. कंगः नहीं, हमारे यहां वैक्सीनेशन बहुत धीमा है। अगस्त-सितंबर के बाद सप्लाई बढ़ जाएगी, तब स्पीड बढ़ने की उम्मीद की जा सकती है। जिन देशों ने आबादी से कई गुना ज्यादा वैक्सीन बुक कर रखी है, वहां से भी हमारे देश को वैक्सीन मिलने लगेगी। कनाडा ने तो इतनी वैक्सीन बुक कर ली है कि वह अपनी आबादी को पांच बार वैक्सीन लगा सकता है। जब उनकी आबादी को वैक्सीन लग चुकी होगी तो बची हुई वैक्सीन को रिलीज करेंगे।
हमारी कंपनियां भी प्रोडक्शन बढ़ा चुकी होंगी। दो-चार महीने में सप्लाई बढ़ जाएगी। सरकार ने 2.1 अरब डोज अगस्त-दिसंबर के बीच मिलने का प्रोजेक्शन दिया है। उतना नहीं भी हुआ तो भी डोज की उपलब्धता तो बढ़ेगी ही। जुलाई से नहीं तो अगस्त से वैक्सीन डोज की उपलब्धता बढ़ सकती है। तब स्पीड भी बढ़ जाएगी।

भास्करः हर्ड इम्युनिटी के लिए कितनी आबादी को वैक्सीनेट करना जरूरी है?

डॉ. कंगः यह समझना होगा कि आप हर्ड इम्युनिटी से आखिर चाहते क्या हैं? अगर आप सोच रहे हैं कि कोई बीमार नहीं होगा, तो ऐसा नहीं होने वाला। हर व्यक्ति की क्षमता अलग होती है। आपको पहले कभी इन्फेक्शन नहीं हुआ है और वैक्सीन भी नहीं लगी है तो आप बीमार हो सकते हैं। ज्यादा से ज्यादा लोग इन्फेक्शन या वैक्सीन से इम्युनिटी हासिल कर लेंगे, तो वह गंभीर रूप से बीमार नहीं होंगे।
हमारा मानना है कि जब इन्फेक्शन या वैक्सीनेशन के जरिए इम्युनिटी 70-80% लोगों तक पहुंच जाएगी तो यह पैंडेमिक एक एंडेमिक बन जाएगी। यानी यह बीमारी पूरी तरह से गायब नहीं होगी। वायरस हमारे बीच रहेगा जरूर, पर गंभीर रूप से बीमार नहीं कर सकेगा। जो हालात अभी बने हैं, वह वापस नहीं आएंगे।

भास्करः क्या वैरिएंट्स को लेकर भारत में जो स्टडी हो रही है, उससे आप संतुष्ट हैं?

डॉ. कंगः नहीं, वैरिएंट्स पर नजर रखना जरूरी है। इसके लिए जीनोम सिक्वेंसिंग के सैम्पल बढ़ाने की जरूरत है। इससे ही भविष्य की स्ट्रैटजी बनाने में मदद मिलेगी। अब भारत में मिले डेल्टा वैरिएंट यानी B.1.617.2 की बात करें तो यूके ने चार हजार सैम्पल्स की सिक्वेंसिंग की है, जबकि भारत में सिर्फ तीन हजार सैम्पल की सिक्वेंसिंग हुई है। हम इन वैरिएंट्स के बारे में जितनी ज्यादा जानकारी हासिल करेंगे, उतनी ही हमें उन्हें फैलने से रोकने में मदद मिलेगी। अब तक जो हुआ, उसे छोड़ दीजिए। पर हम जो वैक्सीन लगा रहे हैं, उसका तो मूल्यांकन होना ही चाहिए।

भास्करः इजराइल, यूएस में लोगों के मास्क उतर गए, हमारे कब उतरेंगे?

डॉ. कंगः अमेरिका ने जब यह फैसला लिया तब वहां की 38% आबादी वैक्सीनेट हो चुकी थी। सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल ने भी कहा है कि सभी लोग मास्क लगाकर थक चुके थे। उन्हें कोई एडवांटेज देना था। इस वजह से कहा गया कि जिन्होंने वैक्सीन लगवा ली है, वे मास्क उतार सकते हैं। इससे वैक्सीन का दायरा बढ़ेगा। भारत की बात करें तो अभी तो हम यही कह सकते हैं कि केसेज बहुत ज्यादा हैं। मास्क तब उतरेंगे, जब ज्यादा से ज्यादा लोग वैक्सीनेट हो जाएंगे और केसेज काफी कम हो जाएंगे।

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