भास्कर एक्सप्लेनर:UK के वैज्ञानिकों का दावा- वैक्सीन लगने के 10 हफ्ते बाद आधी रह गई एंटीबॉडी; यानी लगाना पड़ सकता है बूस्टर डोज

3 महीने पहलेलेखक: रवींद्र भजनी

यूनाइटेड किंगडम (UK) में एक नई स्टडी के नतीजे सामने आए हैं। यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ इन्फॉर्मेटिक्स के वैज्ञानिकों ने पाया कि 10 हफ्ते बाद वैक्सीन से कोविड-19 के खिलाफ बनी एंटीबॉडी कम होने लगती है। इससे कई तरह के सवाल उठ रहे हैं। आखिर वैक्सीन कोविड-19 से कितने दिन तक बचाए रखेगी? क्या ऐसा सभी वैक्सीन के साथ हो रहा है? इस स्टडी के नतीजों के बाद अब क्या बूस्टर डोज लेने की वाकई जरूरत पड़ेगी? आइए, सिलसिलेवार ढंग से समझते हैं...।

क्या कहती है UK में हुई नई स्टडी?

  • यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन (UCL) की वायरस वॉच स्टडी में पाया गया है कि फाइजर और एस्ट्राजेनेका की वैक्सीन से बनी एंटीबॉडी छह हफ्ते बाद कम होने लगती है। 10 हफ्ते बाद तो यह सिर्फ 50% रह गई।
  • UCL की टीम ने 50-70 साल के 605 वैक्सीनेटेड लोगों के ब्लड सैम्पल का एनालिसिस किया है। उन्होंने पाया कि सभी व्यक्तियों में एंटीबॉडी का लेवल अलग-अलग था। पर फाइजर की वैक्सीन ने एस्ट्राजेनेका की वैक्सीन के मुकाबले अधिक एंटीबॉडी बनाई।
  • फाइजर की वैक्सीन के दूसरे डोज के छह हफ्ते बाद एंटीबॉडी का लेवल 7,500 यूनिट्स प्रति मिली लीटर था, पर 10 हफ्ते बाद यह घटकर 3,320 रह गया। वहीं, एस्ट्राजेनेका की वैक्सीन से एंटीबॉडी का लेवल 1,200 यूनिट्स प्रति मिली लीटर से घटकर 10 हफ्ते में 190 यूनिट्स प्रति मिली लीटर रह गया। लैंसेट में प्रकाशित नतीजों में रिसर्चर्स ने दावा किया है कि इस तरह का ट्रेंड उन्हें 4,500 पार्टिसिपेंट्स पर की गई स्टडी में दिखा है।

एंटीबॉडी का लेवल घटने का कोविड-19 के खिलाफ लड़ाई में क्या महत्व है?

  • वैज्ञानिकों का कहना है कि वैक्सीनेशन के कुछ हफ्तों बाद एंटीबॉडी के लेवल में गिरावट को लेकर चिंतित होने की जरूरत नहीं है। पर रिसर्चर्स का कहना है कि कहीं न कहीं यह वैक्सीन की इफेक्टिवनेस को कम कर सकता है। इसका यह मतलब भी नहीं है कि इसकी वजह से लोग ब्रेकथ्रू इन्फेक्शन का शिकार हो रहे हैं। ब्रेकथ्रू इन्फेक्शन यानी वैक्सीनेशन के बावजूद कोविड-19 से इन्फेक्ट हो जाना।
  • कोविड-19 से प्रोटेक्शन में एंटीबॉडी लेवल महत्वपूर्ण है, पर इम्यून सिस्टम के पास इन्फेक्शन से लड़ने के और भी हथियार हैं। मेमोरी बी सेल्स वायरस को याद रखते हैं और जब भी इन्फेक्शन होता है तो वह तत्काल एंटीबॉडी बनाने लगते हैं। टी किलर सेल्स इन्फेक्टेड सेल्स को टारगेट कर खत्म करते हैं, जो प्रोटेक्शन का एक्स्ट्रा कवच देते हैं।
  • भारत में महामारी से जुड़े मामलों के विशेषज्ञ डॉ. चंद्रकांत लहारिया कहते हैं कि सिर्फ एंटीबॉडी लेवल्स को प्रोटेक्शन मानना सही नहीं होगा। हमें प्रोटेक्शन कई स्तरों पर मिलता है और वह कितने दिन तक मिलता रहेगा, इसके बारे में और स्टडी की जरूरत है।

तो क्या बूस्टर डोज की जरूरत पड़ सकती है?

  • हां। रिसर्चर्स ने फाइजर और एस्ट्राजेनेका की वैक्सीन के इफेक्टिवनेस की पड़ताल की है। उनका कहना है कि स्टडी के नतीजे बताते हैं कि जो शुरुआत में वैक्सीनेट हुए थे और जिन्हें एस्ट्राजेनेका की वैक्सीन लगी थी, उन्हें कुछ महीनों बाद बूस्टर डोज लगाना चाहिए।
  • यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन में प्रोफेसर रॉब एलड्रिज ने कहा है कि हमें पता है कि एंटीबॉडी शुरुआत में हाई होती है और कुछ समय बाद लो होने लगती है। हमें इस बात की चिंता है कि अगर इसी रफ्तार से एंटीबॉडी का लेवल गिरता रहा तो वैक्सीन का प्रोटेक्शन भी कम होने लगेगा। हमारे लिए बड़ा सवाल यह है कि ऐसा कब होगा?
  • एलड्रिज कहते हैं कि एंटीबॉडी ही रिस्क को मापने का परफेक्ट तरीका नहीं है। हम नहीं जानते कि इसका मैजिक नंबर क्या है, जब इन्फेक्शन या हॉस्पिटलाइजेशन का खतरा कम होगा। इस मैजिक नंबर का पता लगाना जरूरी है।

बूस्टर डोज को लेकर अलग-अलग देशों में क्या हो रहा है?

  • फाइजर ने ब्रेकथ्रू इन्फेक्शन सामने आने के बाद बूस्टर यानी तीसरे डोज की जरूरत की बात कही थी। इसके बाद इजराइल समेत कई देशों ने हाई रिस्क ग्रुप यानी किसी न किसी तरह की गंभीर बीमारी का सामना कर रहे लोगों को बूस्टर डोज लगाना शुरू कर दिया है।
  • बूस्टर डोज की जरूरत के पीछे एक तर्क डेल्टा वैरिएंट भी है। इस समय यह वैरिएंट 125 से अधिक देशों में सक्रिय है। भारत में तो 86% नए केस डेल्टा वैरिएंट के हैं। यहां भी ब्रेकथ्रू इन्फेक्शन सामने आए हैं, जिन पर इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) ने स्टडी भी की है।
  • अमेरिका ने कहा है कि लोगों को बूस्टर डोज की जरूरत पड़ सकती है, लेकिन अभी इस संबंध में और रिसर्च की जा रही है। वैक्सीन की मिक्स एंड मैच स्ट्रैटजी पर भी विचार किया जा रहा है। रिसर्च के रिजल्ट के बाद ही इस बारे में फैसला लिया जाएगा।
  • विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने कहा है कि इस बात की कोई वैज्ञानिक पुष्टि नहीं है कि वैक्सीन का बूस्टर डोज कितना जरूरी है। संगठन ने ये भी कहा है कि विकसित देशों को वैक्सीन का बूस्टर डोज देने की बजाय ऐसे देशों को वैक्सीन देना चाहिए जहां वैक्सीन की कमी है।
  • भारत का टारगेट पहले अपनी ज्यादा से ज्यादा आबादी को वैक्सीनेट करने का है। उसके बाद ही रिसर्च के नतीजों के आधार पर वैक्सीन के बूस्टर डोज पर आवश्यकता के अनुसार फैसला लिया जाएगा।

क्या वैक्सीन अलग-अलग वैरिएंट के खिलाफ कारगर नहीं है?

  • वैक्सीन सभी वैरिएंट के खिलाफ एंटीबॉडी बना रही है। ब्रिटेन में फाइजर और मॉडर्ना वैक्सीन की इफेक्टिवनेस पर की गई स्टडी में ये सामने आया है कि फाइजर के दोनों डोज डेल्टा वैरिएंट से संक्रमित व्यक्ति को हॉस्पिटलाइजेशन से बचाने में 96% कारगर हैं।
  • भारत बायोटेक ने कोवैक्सिन के फेज-3 ट्रायल डेटा में डेल्टा वैरिएंट के खिलाफ वैक्सीन की इफेक्टिवनेस 65% बताई है। रूसी वैक्सीन स्पूतनिक V भी डेल्टा वैरिएंट के खिलाफ 90% इफेक्टिव है। हालांकि स्पूतनिक ओरिजिनल वायरस पर 92% इफेक्टिव थी।
  • चीनी वैक्सीन सिनोवेक की डेल्टा वैरिएंट के खिलाफ इफेक्टिवनेस कम हुई है। इसके बाद थाईलैंड ने घोषणा की है कि चीनी वैक्सीन लेने वाले हेल्थवर्कर को एस्ट्राजेनेका की तीसरी डोज दी जाएगी। खाड़ी देशों ने भी चीनी वैक्सीन लगवाई थी और वहां केस बढ़े तो बूस्टर डोज के तौर पर तीसरा डोज फाइजर का लगाया जा रहा है।
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