भास्कर डेटा स्टोरी:दूसरी लहर का पीक 8 हफ्ते पीछे छूटा, पर मौतों का आंकड़ा कम नहीं हो रहा; तो क्या पीक में राज्यों ने मौतें छुपा लीं और अब कर रहे एडजस्ट?

7 महीने पहलेलेखक: जयदेव सिंह

कोरोना की दूसरी लहर कमजोर पड़ चुकी है। हर रोज आने वाले मामले इस हफ्ते 40 हजार के स्तर पर आ गए, लेकिन मौतों का आंकड़ा उस तरह से नहीं घट रहा, जैसे केस घट रहे हैं। बुधवार को 48 हजार से ज्यादा नए केस आए। वहीं, 1002 कोरोना संक्रमितों की जान गई। यानी, नए आए केस के मुकाबले 2% से ज्यादा मौतें। पहली लहर में रोज आने वाले नए केस की तुलना में उस दिन होने वाली मौतों का प्रतिशत 1.3% से भी कम था। जबकि दूसरी लहर में तो ये कई बार 5% के करीब तक जा पहुंचा है। 9 जून को तो ये आंकड़ा 6.5% भी हो गया था।

ऐसा क्यों हो रहा है? क्या अब तक राज्य सरकारें मौतों का आंकड़ा छुपा रही थीं, जो अब इसे एडजस्ट करने की कोशिश की जा रही है? क्या प्रधानमंत्री मोदी की अपील के बाद वास्तविक आंकड़े सामने आ रहे हैं? या फिर इसकी वजह कोई और भी है? आइए समझते हैं....

पहली लहर में कुल केस का 1.5% भी नहीं थीं रोज की मौतें, दूसरी में ये 6.5% तक पहुंचीं

भारत में पहली लहर का पीक 16 सितंबर 2020 को आया। उस दिन देश में कुल 97,860 केस आए। उसी दिन 1,140 कोरोना संक्रमितों की जान गई थी। यानी, नए आए केस का 1.16% मौतें। पहली लहर के पीक से दो हफ्ते पहले 2 सिंतबर को देश में 82,865 नए केस आए थे और उस दिन 1026 की जान गई थी। यानी, नए केस का 1.24% माैत।

दूसरी लहर के पीक से दो हफ्ते पहले यानी 22 अप्रैल को देशभर में 3,32,531 नए केस आए और उस दिन 2257 लोगों की कोरोना से जान गई। यानी नए आए केस का 0.68% मौत। 6 मई को दूसरी लहर का पीक आया। उस दिन देशभर में 4,14,280 नए केस आए और 3,923 की जान गई। यानी, कुल केस का 0.95% मौत। इन आंकड़ों से साफ है कि दूसरी लहर के दौरान पहली लहर की तुलना में केस के मुकाबले कम मौतें हो रही थीं।

दूसरी लहर का पीक गुजरने के 10 दिन बाद केस की तुलना में मौतें बढ़ने लगीं

दूसरी लहर का पीक गुजरने के दस दिन बाद यानी, 16 मई को आए कुल केस की तुलना में मौतों का प्रतिशत 1.45% हो गया। पहली और दूसरी लहर के दौरान ये पहली बार था जब किसी दिन आए कुल केस की तुलना में उस दिन हुई मौतों का प्रतिशत 1.4% या उससे ज्यादा रहा हो।

इसके बाद तो रोज आने वाले केस की तुलना में देश में होने वाली मौतों का प्रतिशत लगातार बढ़ता ही गया। 28 मई को नए आए केस की तुलना में 2% से ज्यादा मौतें हुईं। वहीं, 9 जून को जब बिहार ने पहली बार राज्य में हुई मौतों के डेटा को अपडेट किया तो नए आए केस की तुलना में देशभर में हुई कुल मौतों की हिस्सेदारी 6.50% हो गई। 31 दिन बाद 29 जून को नए आए केस की तुलना में हुई मौतों का प्रतिशत 2% से कम रहा। हालांकि, 30 जून को फिर ये 2% से ज्यादा हो गया।

7 से 13 जून के दौरान रोज आए केस के मुकाबले सबसे ज्यादा मौतें

हर हफ्ते आने वाले केस और मौतों की तुलना करें तब भी ट्रेंड वैसा ही है। यानी, दूसरी लहर की शुरुआत और पीक के वक्त रोज आने वाले केस की तुलना में मौतें पहली लहर के मुकाबले कम थीं, लेकिन ये 20 जून को खत्म हुए हफ्ते तक लगातार बढ़ती रहीं। अभी भी ये 2% से ज्यादा हैं।

नए आए केस की तुलना में सबसे ज्यादा 18% मौतें 16 मई 2020 को हुईं

किसी एक दिन में आए नए केसेज की तुलना में सबसे ज्यादा मौतें 16 मई 2020 को हुई थीं। उस दिन देशभर में 11,085 नए केस आए और मौतें 2004 लोगों की हुईं। यानी, नए आए केस का 18% मौतें।

तो ऐसा हुआ क्यों? जवाब है महाराष्ट्र और दिल्ली की वजह से। दोनों राज्यों ने उस दिन अपने यहां हुई मौतों के आंकड़े अपडेट किए थे। पिछले साल 16 मई को महाराष्ट्र और दिल्ली ने मौत के पुराने आंकड़े जोड़े थे। ऐसा करने वाले ये पहले राज्य थे। महाराष्ट्र ने 16 मई 2020 को 1409 मौतें रिपोर्ट की थीं। इनमें से सिर्फ 81 मौतें 16 मई की थीं, बाकी 1328 पुरानी मौतों को जोड़ा गया था। जो पहले रिपोर्ट नहीं हुई थीं। वहीं, दिल्ली में 16 मई 2020 को 437 मौतें रिपोर्ट हुई थीं। इनमें से 344 मौतें लेट रिपोर्ट की गई थीं।

महाराष्ट्र मई 2020 से लगातार पुरानी मौतें जोड़ता रहा है। हर 15 से 30 दिन में पुरानी मौतों को अपडेट किया जाता है। जैसे- इसी महीने 9 जून को राज्य में हुई 661 मौतों में से 400 मौतें ऐसी थीं जो पिछले एक हफ्ते से पहले हुईं, लेकिन रिपोर्ट नहीं की जा सकी थीं। 261 बाकी मौतों में भी 170 मौतें पिछले 48 घंटे के दौरान हुईं। जबकि, 91 पिछले एक हफ्ते के दौरान, जो पहले रिपोर्ट नहीं हुईं।

दूसरी लहर में केस की तुलना में मौतें क्यों नहीं घट रहीं?

ऐसा नहीं है कि ये सिर्फ भारत में हो रहा है। कोरोना में ऐसा पहले भी हुआ है, जब केस और मौतों के ट्रेंड अलग-अलग रहे हैं। पब्लिक हेल्थ एक्सपर्ट डॉक्टर चन्द्रकांत लहारिया कहते हैं कि केस चाहे बढ़ रहे हों या घट रहे हों, मौतों की संख्या पर इसका असर दिखने में करीब 14 दिन का समय लगता है। यही इन्फेक्शन की साइकिल है। ऐसा दूसरे देशों में भी पीक के दौरान देखने में आया है। हालांकि एक्सपर्ट्स ये भी कहते हैं कि केस भले काफी कम हो जाएं, लेकिन मौतों का आंकड़ा उसकी तुलना में इतना कम नहीं होगा।

डॉक्टर लहारिया मौतों की संख्या ज्यादा होने की वजह इनकी बेहतर रिपोर्टिंग को भी मानते हैं। वो कहते हैं कि मौतों की संख्या को लेकर पिछले दिनों जिस तरह से सरकारों की फजीहत हुई, उसके बाद इनकी रिपोर्टिंग बेहतर हुई है। इसलिए कई राज्यों में केस कम होने का ट्रेंड 14 दिन से ज्यादा होने के बाद भी मौतों की संख्या में कमी नहीं दिख रही है।

वहीं, कुछ एक्सपर्ट्स कहते हैं कि कई राज्यों द्वारा मौत के मामलों को देरी से रिपोर्ट किए जाने के कारण केस घटने के बाद भी मौतों की संख्या में इजाफा दिख रहा है। जैसा बिहार में हुआ। वहां के स्वास्थ्य विभाग के प्रधान सचिव ने 18 मई को एक कमेटी बनाई। इस कमेटी ने कोरोना से होने वाली मौत की समीक्षा की। मेडिकल कॉलेज और जिलों में हुई समीक्षा में पाया गया कि 72% मौतें रिकॉर्ड में आई ही नहीं हैं।

9 जून को स्वास्थ्य विभाग के प्रधान सचिव प्रत्यय अमृत ने कोरोना से हुई 3,951 मौतों के बारे में बताया, जो अब तक रिपोर्ट ही नहीं हुई थीं। हालांकि, ये मौतें कब हुईं, ये नहीं बताया गया। ऐसे में हो सकता है कि इनमें से कुछ मौतें पिछले साल कोरोना की पहली लहर के दौरान हुई हों।

तो क्या अब तक सिर्फ बिहार ने कोरोना से मौतों के आंकड़े दुरुस्त किए हैं?

बिहार में भले ही आंकड़े दुरुस्त करने की कोशिश पहली बार हुई हो, लेकिन कई राज्य ऐसा लगातार करते रहते हैं। जैसे महाराष्ट्र में हर महीने के अंत में ऐसी एक्सरसाइज की जाती है। यहां तक कि महाराष्ट्र के रोज के आंकड़ों में पिछले 48 घंटे में हुई मौतें और पिछले एक सप्ताह में हुई मौतों के अलग-अलग आंकड़े दिए जाते हैं।

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