तेजी से आगे बढ़ रहा चक्रवात सितरंग:क्यों आते हैं साइक्लोन, कैसे पड़ता है नाम; इस बार कितना खतरनाक?

5 महीने पहलेलेखक: अभिषेक पाण्डेय
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बंगाल की खाड़ी में एक साइक्लोन यानी चक्रवात बना है, जो भारत की तरफ बढ़ रहा है। 25 अक्टूबर को इसके पश्चिम बंगाल के तट से टकराने की आशंका है। इसकी वजह से कई इलाकों में दीपावली के दौरान भारी बारिश होने के साथ तेज हवाएं चल सकती हैं। बंगाल की खाड़ी में तीन साल बाद कोई चक्रवात आ रहा है। इससे पहले अक्टूबर 2018 में तितली साइक्लोन आया था।

साइक्लोन सितरंग क्या है और कितना खतरनाक है? साइक्लोन क्यों आते हैं? इनके नाम कौन तय करता है? भास्कर एक्सप्लेनर में हम ऐसे ही 8 जरूरी सवालों के आसान जवाब दे रहे हैं…

सवाल 1: साइक्लोन सितरंग का रूट क्या है और ये कितना खतरनाक है?

जवाब: साइक्लोन सितरंग के 25 अक्टूबर को पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश के तट से टकराने की आशंका है। इस तूफान से 110 किलोमीटर/घंटे की रफ्तार से हवाएं चल सकती हैं। इससे पश्चिम बंगाल और ओडिशा में हल्की से मध्यम बारिश होने की संभावना है। सबसे ज्यादा असर सुंदरबन और पूर्वी मिदनापुर के तटीय इलाकों पर पड़ सकता हैं।

मौसम विभाग के अनुमान के मुताबिक, सितरंग के दो साल पहले पश्चिम बंगाल में तबाही मचाने वाले साइक्लोन अम्फान जितना खतरनाक होने की उम्मीद नहीं है।

साइक्लोन सितरंग के आने पर बंगाल में बारिश और तेज हवाएं चलने का अनुमान है।
साइक्लोन सितरंग के आने पर बंगाल में बारिश और तेज हवाएं चलने का अनुमान है।

सवाल 2: चक्रवात क्या होते हैं और ये बनते कैसे हैं?

जवाब: साइक्लोन शब्द ग्रीक भाषा के साइक्लोस (Cyclos) से लिया गया है, जिसका अर्थ है सांप की कुंडलियां। इसे ऐसा इसलिए कहा जाता है क्योंकि बंगाल की खाड़ी और अरब सागर में ट्रोपिकल साइक्लोन समुद्र में कुंडली मारे सांपों की तरह दिखाई देते हैं।

चक्रवात एक गोलाकार तूफान (सर्कुलर स्टॉर्म) होते हैं, जो गर्म समुद्र के ऊपर बनते हैं। जब ये चक्रवात जमीन पर पहुंचते हैं, तो अपने साथ भारी बारिश और तेज हवाएं लेकर आते हैं। ये हवाएं उनके रास्ते में आने वाले पेड़ों, गाड़ियों और कई बार तो घरों को भी तबाह कर सकती हैं।

साइक्लोन बनने का प्रॉसेस कुछ इस तरह है…

  • चक्रवात समुद्र के गर्म पानी के ऊपर बनते हैं। समुद्र का तापमान बढ़ने पर उसके ऊपर मौजूद हवा गर्म और नम हवा होने की वजह से ऊपर उठती है। इससे उस हवा का एरिया खाली हो जाता है और नीचे की तरफ हवा का प्रेशर यानी वायु दाब कम हो जाता है।
  • इस खाली जगह को भरने के लिए आसपास की ठंडी हवा वहां पहुंचती है। इसके बाद ये नई हवा भी गर्म और नम होकर ऊपर उठती है।
  • इसका एक साइकिल शुरू हो जाता है, जिससे बादल बनने लगते हैं। पानी के भाप में बदलने से और भी बादल बनने लगते हैं। इससे एक स्टोर्म साइकिल या तूफान चक्र बन जाता है, जो धरती के घूमने के साथ ही घूमते रहते हैं।
  • स्टॉर्म सिस्टम के तेजी से घूमने की वजह से उसके सेंटर में एक आई बनता है। तूफान के आई को उसका सबसे शांत इलाका माना जाता है, जहां एयर प्रेशर सबसे कम होता है।
  • ये स्टॉर्म सिस्टम हवा की स्पीड 62 किमी/घंटे होने तक ट्रोपिकल स्टॉर्म कहलाते हैं। हवा की रफ्तार 120 किमी/घंटे पहुंचने पर ये स्टॉर्म साइक्लोन बन जाते हैं।
  • साइक्लोन आमतौर पर ठंडे इलाकों में नहीं बनते है, क्योंकि इन्हें बनने के लिए गर्म समुद्री पानी की जरूरत होती है। लगभग हर तरह के साइक्लोन बनने के लिए समुद्र के पानी के सरफेस का तापमान 25-26 डिग्री के आसपान होना जरूरी होता है।
  • इसीलिए साइक्लोन को ट्रोपिकल साइक्लोन भी कहा जाता है। ट्रॉपिकल इलाके आमतौर गर्म होते हैं, जहां साल भर औसत तापमान 18 डिग्री से कम नहीं रहता।
साइक्लोन के सेंटर में उसका आई होता है, जो सबसे शांत इलाका होता है। इसके बाद साइक्लोन वॉल या आईवॉल होती है, जो सबसे घातक होती है। इसे छत के पंखे से समझ सकते हैं, जिसमें पंखे के घूमते हुए पर साइक्लोन के खतरनाक इलाके जैसे होते हैं।
साइक्लोन के सेंटर में उसका आई होता है, जो सबसे शांत इलाका होता है। इसके बाद साइक्लोन वॉल या आईवॉल होती है, जो सबसे घातक होती है। इसे छत के पंखे से समझ सकते हैं, जिसमें पंखे के घूमते हुए पर साइक्लोन के खतरनाक इलाके जैसे होते हैं।

सवाल 3ः चक्रवात, टाइफून, हरिकेन और टॉरनेडो में क्या अंतर है?

जवाब: स्ट्रॉर्म या तूफान वातावरण में एक तरह का डिस्टर्बेंस होता है, जो तेज हवाओं के जरिए सामने आता है और उसके साथ बारिश, बर्फ या ओले पड़ते हैं। जब ये धरती पर होते हैं तो आम तूफान कहलाते है, लेकिन समुद्र से उठने वाले स्टोर्म को साइक्लोन कहते हैं। साइक्लोन आम स्टोर्म से ज्यादा तीव्र और खतरनाक होते हैं।

साइक्लोन, हरिकेन और टाइफून तीनों एक ही चीज होते हैं और इन्हें ट्रोपिकल साइक्लोन भी कहा जाता है। दुनिया भर में साइक्लोन को अलग-अलग नामों से बुलाया जाता है।

जैसे- उत्तरी अमेरिका और कैरेबियन आइलैंड में बनने वाले साइक्लोन को हरिकेन, फिलीपींस, जापान और चीन में आने वाले साइक्लोन को टाइफून और ऑस्ट्रेलिया और हिंद महासागर यानी भारत के आसपास आने वाले तूफान को साइक्लोन कहा जाता है।

समुद्रों के लिहाज से देखें तो अटलांटिक और उत्तर पश्चिम महासागरों में बनने वाले साइक्लोन हरिकेन कहलाते हैं। उत्तर पश्चिम प्रशांत महासागर में बनने वाले साइक्लोन टाइफून कहलाते हैं।

वहीं दक्षिण प्रशांत महासागर और हिंद महासागर में उठने वाले तूफान साइक्लोन कहलाते हैं। इसी वजह से भारत के आसपास के इलाकों में आने वाले समुद्री तूफान साइक्लोन कहलाते हैं।

वहीं टॉरनेडो भी भयानक तूफान होते हैं, लेकिन ये साइक्लोन नहीं होते हैं क्योंकि ये समुद्र के बजाय ज्यादातर धरती पर ही बनते हैं। टॉरनेडो सबसे ज्यादा अमेरिका में आते हैं।

सवाल 4: कोई चक्रवात खतरनाक या हल्का है, ये कैसे तय होता है?

जवाब: समुद्र में लगभग साल भर साइक्लोन बनते हैं, लेकिन ये सभी खतरनाक नहीं होते हैं। इनमें से जो साइक्लोन धरती की ओर बढ़ते हैं वही खतरनाक होते हैं।

साइक्लोन को स्पीड के हिसाब से 5 कैटेगरी में बांट सकते हैं:

साइक्लोनिक स्टॉर्म: इसमें हवा की अधिकतम स्पीड 62 से 88 किमी/घंटे होती है। ये साइक्लोन का सबसे कम घातक रूप है।

सेवेर साइक्लोन: इस साइक्लोन में हवा की अधिकतम स्पीड 89 से 120 किमी/घंटे तक होती है। ये समुद्र में मौजूद नावों या जहाजों के लिए खतरनाक हो सकते हैं।

वेरी सेवेर साइक्लोन: 118 से 165 किमी/घंटे की रफ्तार तक की हवाओं वाले साइक्लोन सेवेर कहलाते हैं। ये साइक्लोन जमीन की ओर बढ़ने पर जान-माल को नुकसान पहुंचा सकते हैं।

एक्सट्रीमली सेवेर साइक्लोन: ये बेहद घातक होते हैं, इनमें हवाओं की स्पीड 166-220 किमी/घंटे होती है।

सुपर साइक्लोन: इसमें हवा की स्पीड 220 किमी/घंटे से ज्यादा होती है, जो कई बार 300-400 किमी/घंटे से भी ज्यादा हो सकती है। ये रास्ते में आने वाले पेड़ों, गाड़ियों और यहां तक बिल्डिंगों को भी तबाह कर सकते हैं।

सवाल 5: अक्टूबर में क्यों आते हैं ज्यादा साइक्लोन?

जवाब: अक्टूबर-नवंबर और मई-जून के महीने में उत्तरी हिंद महासागर, बंगाल की खाड़ी और अरब सागर में साइक्लोन बनते हैं। हर साल औसतन इस समय यहां पांच साइक्लोन बनते हैं। खासतौर पर ओडिशा में अक्टूबर में सबसे ज्यादा साइक्लोन आते रहे हैं।

इसकी वजह क्या है? एक्सपर्ट्स के अनुसार, दक्षिण-पश्चिम मानसून के जाने के बाद समुद्र का तापमान बढ़ जाता है, जिससे बंगाल की खाड़ी में समुद्र के सरफेस का तापमान बढ़ता है। उस समय समुद्री इलाके में नमी की भी अधिकता रहती है। ऐसे में जब साउथ चाइना सी से हवाएं बंगाल की खाड़ी में पहुंचती हैं, तो उन्हें अनुकूल कंडीशन मिलती है और वे साइक्लोन में बदल जाती हैं।

पिछले 131 सालों के डेटा के अनुसार, अक्टूबर महीने में बंगाल की खाड़ी में 61 तो अरब सागर में 32 साइक्लोन आए हैं।

सवाल 6: बंगाल की खाड़ी में तीन साल बाद साइक्लोन आने वाला है, भारत में बंगाल की खाड़ी वाली तटीय इलाके के मुकाबले अरब सागर के तट पर चक्रवात कम क्यों आते हैं?

जवाब: भारत में ज्यादातर साइक्लोन बंगाल की खाड़ी और पूर्वी तट पर आते हैं। यानी बंगाल की खाड़ी में अरब सागर की तुलना में ज्यादा साइक्लोन आते हैं। भारतीय मौसम विभाग के अनुसार, हिंद महासागर में हर साल आने वाले औसतन 5 साइक्लोन में से 4 बंगाल की खाड़ी और केवल एक अरब सागर में आता है।

भारत के पूर्वी और पश्चिमी तटों पर साइक्लोन आने के 1891 से 1990 यानी करीब 100 साल के डेटा पर नजर डालने से पता चलता है कि इस दौरान पूर्वी तट या बंगाल की खाड़ी में करीब 262 साइक्लोन आए, जबकि पश्चिमी तट यानी अरब सागर में 33 साइक्लोन ही आए।

इसकी प्रमुख वजह ये है कि बंगाल की खाड़ी के समुद्र के पानी की तुलना में अरब सागर के पानी का तापमान कम रहता है, इसीलिए बंगाल की खाड़ी में ज्यादा साइक्लोन बनते हैं।

सवाल 7: साइक्लोन समय के साथ धीमे क्यों पड़ जाते हैं?

जवाब: जमीन पर पहुंचने के कुछ घंटों या दिनों बाद साइक्लोन आमतौर पर कमजोर पड़ने लगते हैं, क्योंकि उन्हें गर्म समुद्री पानी से मिलने वाली एनर्जी और नमी मिलना बंद हो जाती है। हालांकि तब भी कई बार साइक्लोन जमीन में काफी दूर तक सफर तय करते हैं और अपने साथ तेज बारिश और हवा लाते हैं, जिससे भारी तबाही होती है। साइक्लोन वैसे तो कई दिनों या हफ्तों तक जारी रह सकता है, लेकिन बड़े जमीनी इलाके या ठंडे समुद्र के ऊपर से गुजरने के साथ ही ये धीमे पड़ने लगते हैं और खत्म हो जाते हैं।

सवाल 8: चक्रवातों के नाम कैसे रखे जाते हैं?

जवाब: 18वीं सदी तक साइक्लोन के नाम कैथोलिक संतों के नाम पर रखे जाते थे। 19वीं सदी में साइक्लोन के नाम महिलाओं के नाम पर रखे जाने लगे। 1979 से इन्हें पुरुष नाम भी देने का चलन शुरू हुआ।

  • 2000 से विश्व मौसम संगठन यानी WMO और यूनाइटेड नेशंस इकोनॉमिक एंड सोशल कमिशन फॉर द एशिया पैसेफिक यानी ESCAP ने एशिया-प्रशांत क्षेत्र के तूफानों के नामकरण का मेथेड शुरू किया।
  • वर्तमान में साइक्लोन के नाम रखने का काम दुनिया भर में मौजूद छह विशेष मौसम केंद्र यानी रीजनल स्पेशलाइज्ड मेट्रोलॉजिकल सेंटर्स यानी RSMCS और पांच चक्रवाती चेतावनी केंद्र यानी ट्रॉपिकल साइक्लोन वॉर्निंग सेंटर्स यानी TCWCS करते हैं।
  • RSMSC और TCWCS चक्रवात और तूफानों को लेकर अलर्ट जारी करने और नामकरण में भूमिका निभाते हैं।
  • भारतीय मौसम विभाग यानी IMD भी RSMCS के छह सदस्यों में शामिल है, जो चक्रवात और आंधी को लेकर एडवायजरी जारी करता है।
  • IMD हिंद महासागर, बंगाल की खाड़ी और अरब सागर इलाके में आने वाले साइक्लोन के नाम रखने और इस इलाके के 13 अन्य देशों को अलर्ट करने का काम करता है।
  • हिंद महासागर के इलाकों में आने वाले साइक्लोन के नाम रखने के फॉर्मूले पर 2004 में सहमति बनी थी। पहले इसमें आठ देश-भारत, बांग्लादेश, मालदीव, म्यांमार, ओमान, पाकिस्तान, श्रीलंका और थाईलैंड शामिल थे, 2018 में इसमें ईरान, कतर, सऊदी अरब, यूएई और यमन भी शामिल हुए, जिन्हें मिलाकर इनकी संख्या 13 हो गई।
  • साइक्लोन के नाम इसलिए रखे जाते हैं, ताकि उनकी पहचान करना आसान हो। हर साल साइक्लोन के नाम अल्फाबेटकली क्रम में यानी A से Z तक तय होते हैं। एक नाम का दोबारा इस्तेमाल कम से कम 6 साल बाद ही हो सकता है।
  • साइक्लोन का नाम कौन सा देश रखेगा, इसका फैसला उस देश नाम से अल्फाबेटकली तय होता है। आने वाले साइक्लोन का नाम सितरंग थाईलैंड ने दिया है।
  • हिंद महासागर इलाके में आने वाले साइक्लोन के हुदहुद, तितली, फेथाई, फानी, वायु और अम्फान जैसे नाम दिए जा चुके हैं।
  • हर साइक्लोन का नाम नहीं रखा जाता है। केवल 65 किमी/घंटे की रफ्तार से ज्यादा वाले साइक्लोन का नाम रखना जरूरी होता है।
  • भारत में सबसे तेज साइक्लोन 1970 में आया भोला साइक्लोन था। ये भारत ही नहीं दुनिया का सबसे घातक साइक्लोन था। इसने भारत के पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश (तब पूर्वी पाकिस्तान) में भारी तबाही मचाई थी, जिसमें 3-5 लाख लोगों की मौत हुई थी।
  • दुनिया का सबसे लंबा हरिकेन या साइक्लोन 1979 में उत्तरपश्चिम प्रशांत महासागर में बना था। इसका डाइमीटर 2200 किलोमीटर था, जोकि अमेरिका के साइज का लगभग आधा है।

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