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भास्कर एक्सप्लेनर:ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की कोरोनावायरस वैक्सीन के बारे में वह सबकुछ जो आपके लिए जानना जरूरी है

9 महीने पहले
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  • वैक्सीन ChAdOx1 nCoV-19 सर्दी के एक वायरस (एडेनोवायरस) के कमजोर वर्जन का इस्तेमाल कर बनाई गई है
  • रिसर्चर्स का दावा है कि उनका वैक्सीन शरीर को स्पाइक प्रोटीन को पहचानेगा और उसके खिलाफ इम्युन रेस्पांस तैयार करेगा

कोरोना वायरस से निपटने के लिए ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी ने जो वैक्सीन बनाया है उसके ह्यूमन ट्रायल्स उम्मीदों से भरे हैं। बताया गया है कि यह वैक्सीन दोहरी सुरक्षा देगा। इम्यून रेस्पांस बढ़ाएगा ताकि शरीर में जल्द से जल्द एंटीबॉडी बन सके और, साथ ही साथ 'किलर टी-सेल्स' भी बनेंगे। लेकिन यह वैक्सीन क्या करेगी, यह किस तरह काम करेगी और आगे क्या होगा?

वैक्सीन क्या है?
यह वैक्सीन ChAdOx1 nCoV-19 सर्दी के एक वायरस (एडेनोवायरस) के कमजोर वर्जन का इस्तेमाल कर बनाई गई है। यह वायरस चिम्पांजी में होने वाला इंफेक्शन है। जेनेटिकली बदलाव कर इसे वैक्सीन के लायक बनाया है ताकि यह मनुष्यों में बढ़ न सकें।

रिसर्चर्स का दावा है कि उनका वैक्सीन शरीर को स्पाइक प्रोटीन को पहचानेगा और उसके खिलाफ इम्युन रेस्पांस तैयार करेगा। इस प्रोटीन की पहचान वायरस की तस्वीरों में की गई है।  यह कोविड-19 को ह्यमून सेल्स में जाने से रोकेगा और इस तरह संक्रमण से बचाव होगा।

शुरुआती नतीजे क्या बता रहे हैं?

  • रिसर्चर्स ने स्पष्ट किया है कि 20 जुलाई से पहले फेज-1 क्लिनिकल ट्रायल्स के नतीजे प्रकाशित नहीं होंगे। हालांकि, रिपोर्ट्स बताती है कि वैक्सीन के कोई साइड-इफेक्ट नहीं दिखे हैं। थकान, सिरदर्द, ठंड लगना और शरीर में दर्द जैसी छोटी-मोटी समस्याएं ही सामने आई हैं।
  • इस वैक्सीन ने इम्युन सिस्टम में दोतरफा रेस्पांस को बढ़ावा दिया। यह इम्युन सिस्टम को एंटीबॉडी बनाने के लिए स्टिमुलेट करता है। इससे शरीर में टी-सेल्स भी बनने लगते हैं। एंटीबॉडी वह प्रोटीन हैं जो शरीर में बाहर से आने वाले हानिकारक पदार्थों यानी एंटीजन को रोकते हैं।  
  • यदि किसी घुसपैठिये (एंटीजन) से निपटने में नॉन-स्पेसिफिक इम्युन सेल्स नाकाम रहते हैं तो टी-सेल्स एक्टिव होते हैं। यह दो तरह के होते हैं- हेल्पर टी-सेल्स और किलर टी-सेल्स। किलर टी-सेल्स सीधे वायरस पर हमला करते हैं।
  • कोविड-19 के खिलाफ एंटीबॉडी के रेस्पांस की अवधि पर प्रश्न उठ रहे हैं। इस पर रिसर्च बताती है कि टी-सेल्स की इस संक्रमण से बचाव में महत्वपूर्ण भूमिका होगी। यह अब तक स्पष्ट नहीं है कि ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी का वैक्सीन लंबी अवधि तक इम्युनिटी दे सकेगा या नहीं।

ट्रायल्स किस तरह आगे बढ़ रहे हैं?

  • 4,000 से ज्यादा वॉलेंटियर यूके में एनरोलमेंट करा चुके हैं। ChAdOx1 nCoV-19 वैक्सीन को टेस्ट कर रहे रिसर्चर्स 10 हजार और वॉलेंटियर चाहते हैं। दक्षिण अफ्रीका और ब्राजील में ट्रायल्स हो रहे हैं। यह उम्मीद है कि इसी साल के अंत तक प्रभावी वैक्सीन तैयार हो जाएगी।
  • ट्रायल का उद्देश्य कोविड-19 से विभिन्न आयु वर्गों को सुरक्षा प्रदान करना है। इससे वैक्सीन से जुड़े सुरक्षा पहलुओं और वायरस के खिलाफ अच्छा इम्युन रेस्पांस बनाने के संबंध में भी महत्वपूर्ण सूचना मिलेगी।

क्या वैक्सीन की इफेक्टिवनेस दिखाने के लिए यूके में कोविड-19 के पर्याप्त मरीज है?

  • ऑक्सफोर्ड की रिसर्च का नेतृत्व कर रही प्रोफेसर सारा गिलबर्ट का कहना है कि यूके में ट्रांसमिशन रेट काफी कम है। इससे कोरोनवायरस वैक्सीन की इफेक्टिवनेस को साबित करने के लिए उनकी संभावना काफी कम हो जाती है।
  • पर्याप्त संख्या में वॉलेंटियर को वायरस से एक्सपोज करना होगा, तभी पता चल सकेगा कि वैक्सीन उन्हें बचा पाती है या नहीं। हालांकि, यदि इंफेक्टेड व्यक्ति से संपर्क की संभावना काफी कम होगी तो वैक्सीन की इफेक्टिवनेस दिखाने में लंबा वक्त लगेगा।

यूके में पर्याप्त रोगी नहीं है तो कैसे कर रहे हैं ट्रायल्स?

  • रिसर्चर्स ने वैक्सीन का उन देशों में ट्रायल शुरू किया है जहां इंफेक्शन रेट ज्यादा है। लेकिन कुछ लोग चैलेंज ट्रायल्स की अपील कर रहे हैं। इसमें वैक्सीन लगाने के बाद लोगों को जान-बूझकर वायरस के सामने एक्सपोज किया जाता है। 
  • नोबल पुरस्कार विजेताओं समेत कई प्रमुख वैज्ञानिकों ने यूएस नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ हेल्थ (एनआईएच) को ओपन लेटर लिखकर मांग की है कि चैलेंज ट्रायल्स करवाना आवश्यक है। तभी पता चलेगा कि वैक्सीन इफेक्टिव है या नहीं।

यदि सफल वैक्सीन बन गई तो क्या बड़े पैमाने पर उसका उत्पादन हो सकेगा?

  • वैक्सीन के उत्पादन की तैयारी ट्रायल के साथ ही शुरू हो गई है ताकि भविष्य में जल्द से जल्द संभावित वैक्सीन को लोगों तक पहुंचाया जा सके।
  • एस्ट्राजेनेका ने यूरोप के इन्क्लूसिव वैक्सीन्स अलायंस (आईवीए) से एग्रीमेंट किया है। इसके तहत नो-प्रॉफिट आधार पर ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी को 400 मिलियन डोज उपलब्ध कराए जाएंगे। इसकी डिलीवरी इसी साल के अंत तक हो जाएगी। 
  • ब्रिटिश सरकार ने 100 मिलियन डोज के लिए भुगतान के लिए हामी भरी है। सितंबर तक यूके के नागरिकों के लिए 30 मिलियन वैक्सीन तैयार हो जाएंगे।

भारत में यह वैक्सीन कब तक उपलब्ध हो सकेगा?

  • ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी का वैक्सीन दुनिया का इकलौता है जो फेज-III ट्रायल्स कर रहा है। ब्रिटेन में सितंबर तक वैक्सीन उपलब्ध होने की संभावना है। हालांकि, भारत आते-आते अक्टूबर हो सकता है।
  • जून की शुरुआत में एस्ट्राजेनेका ने सीरम इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया (एसआईआई) से लाइसेंसिंग एग्रीमेंट किया था। इसके तहत एक बिलियन डोज मध्यम और कम आय वाले देशों में भेजे जाएंगे।
  • सीरम इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया के सीईओ अदार पूनावाला ने एक इंटरव्यू में कहा कि  हम कोविड-19 वैक्सीन बनाने के लिए तैयार हैं। हम दो महीने में इसका उत्पादन शुरू कर देंगे। इसके लिए हमने इस फेसिलिटी पर 100 मिलियन डॉलर खर्च किए हैं।
  • पूनावाला के मुताबिक कंपनी अपने जोखिम पर मिलियन डोज बना रही है। एस्ट्राजेनेका से कंपनी की डील के तहत भारत और अन्य देशों के लिए एक बिलियन डोज बनाकर सप्लाई करना है।  

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