EWS रिजर्वेशन पर सुप्रीम बहस:वकील बोले- सवर्णों को आरक्षण संविधान के सीने में छुरा घोंपने जैसा; SC ने कहा- जांचेंगे सही है या गलत

3 महीने पहलेलेखक: अनुराग आनंद

शिक्षा और सरकारी नौकरी में आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को 10% EWS रिजर्वेशन मिलना चाहिए या नहीं, ये इन दिनों देश में बहस का हॉट टॉपिक बना हुआ है। 13 सितंबर, 14 सितंबर और 15 सितंबर को इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट में तीखी बहस हुई। इस दौरान संविधान, जाति, सामाजिक न्याय जैसे शब्दों का भी जिक्र हुआ।

आज हम भास्कर एक्सप्लेनर में इस विषय पर सुप्रीम कोर्ट में चली बहस की रोचक दलीलें और न्यायाधीशों की सख्त टिप्पणियां पेश कर रहे हैं…

एडवोकेट मोहन गोपाल
सामाजिक और आर्थिक रूप से जो असल में पिछड़े हैं, उन्हें EWS आरक्षण से बाहर रखा गया है। ऐसे में यह समानता और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन करता है, जो संविधान के मूल ढांचे के खिलाफ है।

एडवोकेट मीनाक्षी अरोड़ा
ऐतिहासिक रूप से जिन वर्गों के साथ अन्याय हुआ, उन्हें मेन स्ट्रीम में लाने के लिए आरक्षण की व्यवस्था लाई गई। इसे केवल आर्थिक आधार पर नहीं दिया जा सकता है। आर्थिक रूप से पिछड़े सवर्ण की गरीबी मिटाने के लिए आरक्षण की जरूरत नहीं है, बल्कि पैसा देकर भी उनकी समस्या का समाधान किया जा सकता है।

एडवोकेट संजय पारीख
पिछड़े, दलित और आदिवासी समुदाय के गरीबों को EWS कोटे से अलग रखना संविधान में दिए गए समानता के अधिकार का उल्लंघन है।

एडवोकेट मोहन गोपाल
EWS कोटे का लाभ पाने की सीमा 8 लाख रुपए सालाना कमाई तक है। यानी, इसका लाभ उन्हें मिलेगा जिनकी मंथली इनकम 66 हजार रुपए है। देश के ज्यादातर परिवारों की मंथली इनकम 25 हजार है। इससे साफ होता है कि इसका लाभ पाने वाले वर्ग की आर्थिक स्थिति दूसरे वर्गों से बेहतर है।

सुनवाई 14 सितंबर को सुबह 10.30 बजे के लिए लिस्ट की गई।

सीनियर एडवोकेट पी विल्सन
विलियम ए ने कहा था कि ‘शेर और बैल के लिए एक तरह का कानून बनाना भी उत्पीड़न ही है।’ SC, ST, OBC को छोड़ उच्च जातियों को EWS आरक्षण देने के बारे में भी मैं यही कहना चाहता हूं।

चीफ जस्टिस यूयू ललित
मिस्टर विल्सन हम सिर्फ पैराग्राफ नहीं, आपके विचार चाहते हैं।

सीनियर एडवोकेट पी विल्सन
समाज में जातिगत भेदभाव मौजूद है। इसके लिए मैं एकलव्य और महाभारत का जिक्र नहीं करना चाहता। देश के राष्ट्रपति को मंदिर में घुसने से रोक दिया गया, इससे जाहिर होता है कि भेदभाव अभी भी है। आरक्षण ही केवल इस ऐतिहासिक अन्याय को ठीक करने की दवा है।

प्रोफेसर रवि वर्मा कुमार
सिर्फ इसलिए कि मैं अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति या अन्य पिछड़ा वर्ग के रूप में पैदा हुआ हूं, मुझे EWS माने जाने से अयोग्य ठहराया जा रहा है। 10% कोटा मेरी उस जाति की निंदा करता है जिसमें मैं पैदा हुआ हूं। ऐसे में अनुच्छेद 19 के तहत समान अवसर के मौलिक अधिकार और अनुच्छेद 19 के तहत किसी विशेष जाति से जुड़े होने के मेरे अधिकार से मुझे वंचित कर दिया गया है।

सुनवाई 15 सितंबर को सुबह 10.30 बजे के लिए लिस्ट की गई।

एडवोकेट शादान फरासत
किसानों के खाते में 6,000 रुपए भेजना सरकार की सकारात्मक पहल का आधार हो सकता है, लेकिन आरक्षण को सरकार की सकारात्मक पहल का आधार कहना सही नहीं है। आरक्षण हर समस्या का समाधान नहीं है। यह केवल समाज के सामाजिक और शैक्षणिक तौर पर पिछड़े लोगों को समाज की मुख्यधारा यानी मेन स्ट्रीम में लाने का एक जरिया है।

एडवोकेट के एस चौहान
संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में 8 जनवरी को और राज्यसभा में 9 जनवरी को पारित हुआ था। मुझे इस पर कोई बहस होती नहीं दिखी। संसद में बिना ज्यादा बहस के कानून पारित किए जा रहे हैं।

चीफ जस्टिस यूयू ललित
जब हम यह जानते हैं कि विधायिका के कामों में हस्तक्षेप नहीं कर सकते, तो फिर इस पर चर्चा और बहस क्यों कर रहे हैं?

जस्टिस एस रवींद्र भट
हम इस बारे में और ज्यादा बात करेंगे, तो हम अपनी ही ऊर्जा बर्बाद कर रहे होंगे।

एडवोकेट गोपाल शंकर नारायण
मैं EWS आरक्षण के मुद्दे पर युवा, समानता और स्वतंत्र समूह की वकालत कर रहा हूं, जो जाति आधारित रिजर्वेशन के खिलाफ हो।

चीफ जस्टिस यूयू ललित
मैंने तो अब तक नहीं सुना कि अगड़ी जाति का कोई व्यक्ति EWS आरक्षण का विरोध कर रहा है।

एडवोकेट यादव नरेंद्र सिंह
हमारे देश में 70% लोगों की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है। ऐसे में कुछ लोगों को EWS आरक्षण मिलना ठीक नहीं है। वैकल्पिक रूप से EWS आरक्षण तो BPL कैटेगरी के लोगों को दिया जाना चाहिए क्योंकि हमारे पास उनका सही डेटा भी है।

एडवोकेट दिव्या कुमार
आरक्षण का गरीबी खत्म करने से कोई लेना-देना नहीं है बल्कि यह पिछड़े वर्गों के उत्पीड़न को कम करने का एक जरिया है। समाज में समानता लाने के लिए पिछड़ों को सरकारी नौकरी में रिजर्वेशन दिया जाता है, जिससे उनका प्रतिनिधित्व और भागीदारी बढ़े।

केंद्र सरकार की ओर से सर्वोच्च न्यायालय में अभी पक्ष रखा जाना बाकी है। हालांकि सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने कहा है कि सरकार की जिम्मेदारी है कि वह संविधान के अनुच्छेद 46 के तहत आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के हितों की रक्षा करे।

अब इस मामले में 20 सितंबर यानी आज सुबह 10.30 बजे से एक बार फिर सुनवाई होनी है।

अब आप हिजाब पर शुरुआती 3 दिनों की सुनवाई को नीचे पढ़िए....

सुप्रीम कोर्ट में सीनियर एडवोकेट राजीव धवन ने 5 सितंबर को दोपहर 2 बजे हिजाब मामले पर मुस्लिम लड़कियों का पक्ष रखना शुरू किया। उन दलीलों की कुछ हाइलाइट्स...

एडवोकेट धवनः आर्टिकल 145 (3) के मुताबिक इस मामले को पांच-सदस्यीय संविधान पीठ के पास भेजा जाए। इसमें बड़ी संख्या में औरतें शामिल हैं, जिनके सामने सवाल है कि क्या वो ड्रेस कोड के सामने झुक जाएं या हिजाब एक जरूरी धार्मिक प्रथा है।

जस्टिस गुप्ताः हिजाब पहनना जरूरी धार्मिक प्रथा हो सकती है या नहीं भी, लेकिन हम एक सेकुलर देश हैं और सरकार ड्रेस कोड रेगुलेट कर सकती है। (यहां क्लिक कर पढ़िए शुरुआती 3 दिनों की पूरी जिरह..)

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