भास्कर एक्सप्लेनर:किसान MSP की मांग पर अड़े; ये क्या है? कैसे कैलकुलेट होती है? किसानों को MSP कानून क्यों चाहिए?

10 महीने पहले

केंद्र सरकार ने तीनों कृषि कानूनोें को रद्द कर दिया है, लेकिन किसान अभी भी MSP की मांग पर अड़े हुए हैं। किसानों की मांग है कि सरकार MSP का लागू करने का लिखित आश्वासन दे उसके बाद ही किसान आंदोलन खत्म करेंगे। इसके बाद केंद्र सरकार ने MSP पर चर्चा के लिए समिति गठित करने का फैसला लिया है।

समझते हैं, MSP क्या होती है? कौन तय करता है? कैसे कैलकुलेट की जाती है? सरकार अभी किस हिसाब से किसानों को MSP देती है? MSP को लेकर किसानों की क्या मांग है? और क्या दूसरे देशों में भी किसानों को MSP दी जाती है?...

सबसे पहले समझते हैं MSP क्या होती है?

MSP यानी मिनिमम सपोर्ट प्राइस या फिर न्यूनतम समर्थन मूल्य। केंद्र सरकार फसलों की एक न्यूनतम कीमत तय करती है, इसे ही MSP कहा जाता है। अगर बाजार में फसल की कीमत कम भी हो जाती है, तो भी सरकार किसान को MSP के हिसाब से ही फसल का भुगतान करेगी। इससे किसानों को अपनी फसल की तय कीमत के बारे में पता चल जाता है कि उसकी फसल के दाम कितने चल रहे हैं। ये एक तरह फसल की कीमत की गारंटी होती है।

कौन तय करता है MSP?

फसलों की MSP कमीशन फॉर एग्रीकल्चरल कॉस्ट्स एंड प्राइसेस (CACP) तय करता है। आयोग समय के साथ खेती की लागत और बाकी पैमानों के आधार पर फसलों की कम से कम कीमत तय करके अपने सुझाव सरकार के पास भेजता है।

MSP तय कैसे की जाती है?

MSP कैलकुलेट करने के लिए 3 अलग-अलग वेरिएबल का प्रयोग किया जाता है। इसमें A2, A2+FL और C2 शामिल हैं।

  • A2 में उन खर्चों को गिना जाता है, जो किसान अपनी जेब से देता है। जैसे कि खाद बीज, बिजली, पानी और मजदूरी पर किया गया खर्च। इसे इनपुट कॉस्ट भी कहा जाता है। मोटे तौर पर बुआई से लेकर कटाई तक का खर्च इसमें आता है।
  • A2+FL में बुआई से लेकर कटाई तक के सारे खर्च के साथ फैमिली लेबर को भी जोड़ा जाता है। फैमिली लेबर यानी किसान के परिवार के सदस्यों ने खेती में जो कामकाज किया उसकी मजदूरी। अगर खेती का काम किसान मजदूरों से करवाता तो उन्हें मजदूरी देनी पड़ती। इसी तरह अगर घर के सदस्य भी खेत में काम कर रहे हैं, तो उन्हें भी मजदूरी देनी चाहिए।
  • C2 में बुआई से लेकर कटाई तक के खर्च के साथ ही जमीन का किराया और उस पर ब्याज को शामिल किया जाता है। साथ ही इसमें उस पूंजी के ब्याज को भी शामिल किया जाता है, जो किसान ने मशीन की खरीदी पर लगाई है। मोटे तौर पर समझें, तो इसमें खेती के खर्चों के अलावा जमीन और पूंजी के ब्याज को भी तय किया जाता है।

किसानों को किन फसलों पर मिलती है MSP?

सरकार अनाज, दलहल, तिलहन और बाकी फसलों पर MSP देती है।

  • अनाज वाली फसलें: धान, गेहूं, बाजरा, मक्का, ज्वार, रागी, जौ।
  • दलहन फसलें: चना, अरहर, मूंग, उड़द, मसूर।
  • तिलहन फसलें: मूंग, सोयाबीन, सरसों, सूरजमुखी, तिल, नाइजर या काला तिल, कुसुम।
  • बाकी फसलें: गन्ना, कपास, जूट, नारियल।

सरकार अभी किस हिसाब से देती है MSP?

सरकार अभी A2+FL फार्मूले के आधार पर ही MSP दे रही है।

MSP पर किसानों की क्या मांग है?

  • किसान मांग कर रहे है कि उन्हें MSP C2+FL फॉर्मूले पर दी जाए।
  • किसानों की मांग है कि सरकार MSP से कम कीमत पर फसल की खरीदी को अपराध घोषित करे और MSP पर सरकारी खरीद लागू रहे।
  • साथ ही दूसरी फसलों को भी MSP के दायरे में लाया जाए। हालांकि, केंद्र सरकार के कई मंत्री और खुद प्रधानमंत्री भी ये बात कह चुके हैं कि MSP की व्यवस्था जारी रहेगी, लेकिन किसान संगठन चाहते हैं कि ये बात कानून में शामिल की जाए।

क्या देश में MSP पर कोई कानून है?

  • नहीं। इसीलिए किसान MSP पर कानून बनाने की भी मांग कर रहे हैं। दरअसल, अभी MSP एक पॉलिसी के तौर पर लागू की जाती है। सरकार MSP देने के लिए कानूनन बाध्य नहीं है। यानी सरकार चाहे तो दे न चाहे तो न दे।
  • साथ ही MSP पर CACP बस सरकार को सुझाव दे सकता है, कानूनी रूप से MSP लागू करने का अधिकार CACP के पास भी नहीं होता। इसका मतलब है कि MSP पर फसल खरीदी के लिए न तो सरकार कानूनी रूप से बाध्य है और न ही वो प्राइवेट ट्रेडर्स को ऐसा करने के लिए कह सकती है।
  • हालांकि, सिर्फ गन्ना ही एक ऐसी फसल है जिसे MSP पर खरीदने के लिए कुछ हद तक कानूनी पाबंदी लागू होती है। आवश्यक वस्तु अधिनियम के एक आदेश के मुताबिक, गन्ने पर उचित और लाभकारी मूल्य देना जरूरी है।

क्या सभी किसानों को MSP का फायदा मिलता है?

2012-13 की नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस की रिपोर्ट के मुताबिक, 10% से भी कम किसान अपनी फसल को MSP पर बेचते हैं। ताजा आंकड़े बताते हैं कि MSP पर फसल बेचने वाले किसानों की संख्या कम होकर 6% हो गई है। यानी किसानों का एक बड़ा वर्ग अभी भी MSP पर अपनी फसल नहीं बेचता।

MSP की शुरुआत कैसे हुई?

दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान भारत में खाद्य संकट गहराने लगा था। तब ब्रिटिश सरकार ने इससे निपटने के लिए 1 दिसंबर 1942 को फूड डिपार्टमेंट की स्थापना की थी। आजादी के बाद भारत सरकार ने इस डिपार्टमेंट को फूड मिनिस्ट्री यानी खाद्य मंत्रालय में बदल दिया। 1960 में खाद्य मंत्रालय को दो अलग-अलग डिपार्टमेंट में बांट दिया गया - डिपार्टमेंट फॉर फूड और डिपार्टमेंट फॉर एग्रीकल्चर। अभी तक भारत में खाद्य संकट का कोई हल नहीं निकला था और इसी दशक में भारत ने ग्रीन रिवॉल्यूशन पर काम करना शुरू किया। 1965 में एग्रीकल्चर प्राइसेस कमीशन बना जिसका बाद में नाम बदलकर कमीशन फॉर एग्रीकल्चरल कॉस्ट एंड प्राइसेस (CACP) कर दिया गया। इसी कमीशन का काम किसानों से उनकी फसल सही कीमत पर खरीदना था। इस कीमत को ही MSP कहा जाता है। 1966-67 में देश में पहली बार गेंहू को MSP पर खरीदने की शुरुआत हुई। धीरे-धीरे MSP को बाकी फसलों पर भी लागू किया गया।

दुनियाभर के देश किस तरह अपने किसानों की वित्तीय मदद करते हैं, वो भी जान लीजिए

यूरोपीयन यूनियन

यूरोपीयन यूनियन के सभी सदस्य देशों के लिए एक कॉमन एग्रीकल्चरल पॉलिसी है। इस पॉलिसी के तहत किसानों को सब्सिडी देने की व्यवस्था है। यूरोपीयन यूनियन में किसानों को सब्सिडी देने का मुख्य उद्देश्य छोटे किसानों की आर्थिक मदद करना है। 2019 में यूरोपीयन यूनियन के 103 बिलियन यूरो के कुल बजट में से 57 बिलियन यूरो CAP के लिए आवंटित किया गया था।

अमेरिका

1930 के दशक में आए भयानक ग्रेट डिप्रेशन में किसानों की आर्थिक सहायता के लिए अमेरिका में फार्म बिल्स पेश किए गए थे। इसके तहत किसानों को आर्थिक सहायता के साथ ही फसल का बीमा किया जाने का प्रावधान था। फसल बीमे के कुल खर्च का 70% तक सरकार देती है और बची राशि किसान को देना होती है। 2020 में अमेरिका ने किसानों को 46 बिलियन डॉलर की सब्सिडी दी थी।

चीन

चीन में भी किसानों को वित्तीय मदद देने के लिए अलग-अलग योजनाएं हैं। 2006 में चीन ने कृषि पर लगने वाले लगभग हर तरह के टैक्स को खत्म कर दिया था। साथ ही भारत की ही तरह चीन अपने किसानों को MSP भी देता है।