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भास्कर एक्सप्लेनर:क्या कमेटी बनाने से सुलझ जाएगा किसानों का मसला? सबसे बड़ा सवाल आंदोलन में आगे क्या होगा?

15 दिन पहलेलेखक: जयदेव सिंह/ प्रियंक द्विवेदी
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खेती से जुड़े तीनों कृषि कानूनों को चुनौती देने वाली याचिका पर मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। मांग तो थी इन तीनों कानूनों को रद्द करने की, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने अगले आदेश तक कानून के लागू होने पर रोक लगा दी है। पूरा मामला सुलझाने के लिए 4 सदस्यों की एक कमेटी भी बना दी है। इस कमेटी की रिपोर्ट के बाद ही सुप्रीम कोर्ट कोई फैसला लेगी। सुप्रीम कोर्ट में आज जो कुछ भी हुआ, उससे साफ है कि न इसमें किसानों की जीत हुई है और न ही सरकार की हार हुई है। लेकिन कैसे, आइए समझते हैं....

सबसे पहले बात सुप्रीम कोर्ट का आदेश क्या है?
सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस एसए बोबड़े, जस्टिस एएस बोपन्ना और जस्टिस वी रामासुब्रमण्यम की बेंच किसान आंदोलन और कृषि कानूनों से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। सुप्रीम कोर्ट ने इन तीनों कृषि कानूनों के अमल पर अगले आदेश तक रोक लगा दी है। इसके साथ ही 4 सदस्यों की एक कमेटी भी बनाई है, जो इस पूरे विवाद या मसले को सुलझाएगी। ये कमेटी ज्यूडिशियल प्रोसिडिंग का हिस्सा होगी, जो अपनी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को सौंपेगी। उसके बाद सुप्रीम कोर्ट इस पर कोई फैसला लेगी।

सुप्रीम कोर्ट ने आज क्या कहा?
चीफ जस्टिस एसए बोबड़े ने कहा, "हम इस समस्या का समाधान ढूंढ रहे हैं। अगर आप समाधान नहीं चाहते और सिर्फ प्रदर्शन ही करना चाहते हैं, तो कर सकते हैं। हर वो व्यक्ति जो इस समस्या का हल निकालना चाहता है, वो कमेटी के सामने अपनी बात रख सकता है। कमेटी कोई भी आदेश जारी नहीं कर सकती। वो हमें अपनी रिपोर्ट देगी। हम इसमें सभी संगठनों की राय लेंगे। हम ये कमेटी इसलिए बना रहे हैं, ताकि पिक्चर क्लियर हो जाए।'

जो कमेटी बनी है, उसका क्या काम होगा?
संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप बताते हैं कि कमेटी सरकार की भी बात सुनेगी और किसानों की भी सुनेगी। उसके बाद सुप्रीम कोर्ट में अपनी रिपोर्ट देगी। कमेटी मध्यस्थता की कोशिश भी करेगी। अगर मध्यस्थता के जरिए कोई हल निकल जाता है, तो ठीक है, वरना रिपोर्ट तो सुप्रीम कोर्ट के पास जाएगी ही और फिर सुप्रीम कोर्ट ही फैसला देगी।

क्या कमेटी कानून में संशोधन या निरस्त करने को कह सकती है? इस बारे में सुभाष कश्यप बताते हैं कि कमेटी के पास कोई ताकत नहीं है। वो सिर्फ सिफारिश कर सकती है, कोई फैसला या आदेश नहीं दे सकती।

सबसे बड़ा सवाल क्या आंदोलन खत्म होगा?
नहीं, भारतीय किसान यूनियन (टिकैत) के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष दिवाकर सिंह चौधरी का कहना है कि हमें सुप्रीम कोर्ट पर पूरा भरोसा है, लेकिन आज के आदेश से किसानों को इसका ज्यादा फायदा नहीं होगा। सुप्रीम कोर्ट ने आंदोलन खत्म करने का आदेश भी नहीं दिया है और हमारी मांग तीनों कानूनों को रद्द करने की है। जब तक कानून रद्द नहीं होंगे, तब तक आंदोलन भी खत्म नहीं होगा।

दिवाकर सिंह बताते हैं कि हमने जो तय किया था, वही करेंगे। 13 जनवरी को हम लोहड़ी के दिन को "किसान संकल्प दिवस' के रूप में मनाएंगे और तीनों कानूनों की प्रतियां जलाएंगे। हमारा पूरा फोकस 26 जनवरी पर है। हम राजपथ पर ट्रैक्टर परेड निकालेंगे।

क्यों ये किसानों की जीत और सरकार की हार नहीं?
किसानों की जीत क्यों नहीं:
किसान संगठन तीनों कृषि कानूनों को रद्द करने की मांग पर अड़े हैं। सरकार कानून वापस लेने को साफ मना कर चुकी है। सुप्रीम कोर्ट ने भी कानून रद्द करने पर कुछ नहीं कहा है। कोर्ट ने अभी सिर्फ कानूनों के अमल पर रोक लगाई है। निरस्त नहीं किया है और न ही सरकार को कोई आदेश दिया है।

सरकार की हार क्यों नहींः किसानों के साथ मीटिंग में सरकार बार-बार कमेटी का ही जिक्र करती है। सरकार का कहना है कि कमेटी के जरिए विवाद सुलझा लिया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने भी अब कमेटी के जरिए ही विवाद सुलझाने की बात कही है और 4 सदस्यों की कमेटी बना दी है।

कमेटी में कौन-कौन लोग हैं और ये क्या करेंगे?
कमेटी में चार लोग शामिल किए गए हैं। दो किसान संगठनों से जुड़े हैं जबकि दो खेती के एक्सपर्ट हैं।

  1. भूपेंद्र सिंह मान: भारतीय किसान यूनियन से जुड़े हैं। खुद किसान हैं। लंबे समय से किसानों के हितों के लिए काम कर रहे हैं। किसानों के हितों के लिए किए कामों को देखते हुए उन्हें 1990 से 1996 तक राज्यसभा के लिए भी मनोनीत किया जा चुका है। मान अखिल भारतीय किसान समन्वय समिति के चेयरमैन भी हैं। उनकी समिति ने 14 दिसंबर को कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर को पत्र लिख तीनों कानूनों का समर्थन किया था।
  2. अशोक गुलाटी: एग्रीकल्चर इकोनॉमिस्ट हैं। एमएसपी तय करने वाले आयोग कमिशन फॉर एग्रीकल्चर कॉस्ट एंड प्राइजेज के अध्यक्ष रहे हैं। खेती के नए कानूनों के समर्थक माने जाते हैं। पिछले महीने एक इंटरव्यू में कह चुके हैं कि कानूनों को छह महीने के लिए सस्पेंड करके किसानों की शंकाओं का समधान होने चाहिए लेकिन, कानूनों को रद्द नहीं किया जाए।
  3. अनिल घनवट: महाराष्ट्र के किसान संगठन शेतकारी संगठन के अध्यक्ष हैं। ये संगठन नए कानूनों का समर्थक है। घनवट पहले कह चुके हैं कि ओपन मार्केट सिस्टम में किसानों के पास अपना माल बेचने के लिए अधिक ऑप्शन रहेंगे। जिससे उन्हें बेहतर दाम मिलेंगे।
  4. प्रमोद जोशी: इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट के पूर्व डायरेक्टर हैं। देश के किसानों और खेती की स्थिति पर कई किताबें लिख चुके हैं। कॉन्ट्रैक्ट फॉर्मिंग के पक्ष में भी अखबारों में लिखते रहे हैं। किसान जिन कानूनों का विरोध कर रहे हैं उनमें कॉन्ट्रैक्ट फॉर्मिंग भी शामिल है।

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