भास्कर एक्सप्लेनर:यूक्रेन पर हमले से न डरने वाले फिनलैंड-स्वीडन NATO से जुड़ेंगे, जानिए कैसे पुतिन की गलत स्ट्रैटजी से खतरे में पड़ा रूस

3 महीने पहलेलेखक: अभिषेक पाण्डेय / नीरज सिंह

दिसंबर 2021 की बात है। यूक्रेन ने अमेरिकी दबदबे वाले सैन्य गठबंधन NATO से जुड़ने की इच्छा जाहिर की थी। पुतिन को यूक्रेन की ये कोशिश नागवार गुजरी और उन्होंने कीव पर 24 फरवरी 2022 को हमला कर दिया। ये NATO में जाने की कोशिश में लगे यूरोपीय देशों के लिए पुतिन की चेतावनी थी। हालांकि, यूक्रेन में युद्ध के करीब 3 महीने बाद हालात अब बदल गए हैं।

रूस के सीमावर्ती 2 देशों फिनलैंड और स्वीडन ने 30 सदस्यों वाले NATO से जुड़ने की घोषणा की है। स्वीडन और फिनलैंड के NATO से जुड़ने की घोषणा को पुतिन के लिए दोहरे झटके के रूप में देखा जा रहा है। इसका कारण है कि स्वीडन और फिनलैंड 200 साल से तटस्थ रुख अपनाए हुए थे। स्वीडन और फिनलैंड की घोषणा से न सिर्फ पुतिन की अंतरराष्ट्रीय छवि, बल्कि घर के अंदर भी उनकी इमेज को धक्का पहुंचा है।

ऐसे में चलिए जानते हैं कि आखिर क्यों फिनलैंड और स्वीडन का NATO से जुड़ना रूस के लिए है झटका? आखिर क्यों कई साल तटस्थ रहने के बाद स्वीडन और फिनलैंड जा रहे NATO के पाले में? रूस की तुलना में कितनी है फिनलैंड और स्वीडन की सैन्य ताकत? इससे पहले इस पोल के जरिए आप अपनी राय जाहिर कर सकते हैं...

फिनलैंड-स्वीडन का NATO के पाले में जाना क्यों पुतिन के लिए झटका?

यूक्रेन को NATO में जाने से रोकने के लिए ही रूस ने उस पर हमला किया था। अब रूस का यही हमला दो और देशों स्वीडन और फिनलैंड के NATO से जुड़ने की वजह बनता नजर आ रहा है।

एक्सपर्ट्स का मानना है कि ये NATO को रोकने की कोशिशों में जुटे रूसी राष्ट्रपति पुतिन के लिए दोहरा झटका है। पहला झटका उन्हें अंतरराष्ट्रीय फ्रंट पर लगा है-दरअसल, यूक्रेन पर हमले के बावजूद रूस NATO से जुड़ने के इच्छुक अन्य देशों को ऐसा करने से रोकने में नाकाम होता नजर आ रहा है। यानी किसी देश को NATO से जुड़ने से रोकने के लिए उसके खिलाफ रूस की आक्रामक रणनीति कारगर होती नहीं नजर आ रही है।

उल्टे हाल के वर्षों में रूस की बढ़ती आक्रामकता को ही फिनलैंड और स्वीडन जैसे लंबे समय से तटस्थ रहे देशों के NATO के पाले में जाने की सबसे प्रमुख वजह माना जा रहा है। दरअसल, यूक्रेन पर पुतिन की सैन्य कार्रवाई के बाद स्वीडन-फिनलैंड अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं और उनके NATO से जुड़ने की सबसे प्रमुख वजह यही मानी जा रही है।

वहीं कुछ जानकारों का मानना है कि फिनलैंड और स्वीडन के मन में रूस को लेकर डर, संदेह और अविश्वास है। दरअसल, ये दोनों देश रूस के यूक्रेन पर हमले और पहले ही रूस द्वारा NATO में शामिल होने पर फिनलैंड-स्वीडन को गंभीर परिणाम भुगतने की चेतावनी देने से डरे हुए हैं। वहीं इसकी ऐतिहासिक वजह भी है-अतीत में रूस फिनलैंड का बहुत बड़ा हिस्सा हड़प चुका है।

फिनलैंड-स्वीडन के NATO से जुड़ने की घोषणा से पुतिन को दूसरा झटका घरेलू फ्रंट पर लगा है। पुतिन यूक्रेन पर हमले को रूस के आसपास के इलाके में NATO के विस्तार को रोकने की कोशिशों के तौर पर प्रचारित करते रहे हैं। अब दो और देशों के NATO की ओर कदम बढ़ाने से पुतिन के लिए अब घर में भी यूक्रेन के खिलाफ सैन्य कार्रवाई को उचित ठहरा पाना मुश्किल होगा।

वहीं फिनलैंड-स्वीडन के आने से NATO का सैन्य रूप से भी घेरा रूस के आसपास और मजबूत होगा। कुल मिलाकर अगर फिनलैंड और स्वीडन NATO से जुड़ते हैं, तो ये पुतिन के लिए अच्छा कतई नहीं होगा।

रूस को कैसे घेर रहा NATO का विस्तार
सोवियत संघ को रोकने के लिए 1949 में जब NATO बना तो उसके 12 सदस्य थे। लेकिन 1991 में सोवियत संघ के पतन के बाद NATO ने रूस के आसपास यानी पूर्वी यूरोप में काफी तेजी से अपना विस्तार किया और 1997 के बाद से ही इससे 14 और देश जुड़े हैं। इससे 1991 में 16 से इसके सदस्य देशों की संख्या बढ़कर अब 30 हो चुकी है। इनमें से 11 पूर्वी यूरोप के ऐसे देश हैं जो कभी मॉस्को के सैटेलाइट स्टेट हुआ करते थे और साथ ही 3 सोवियत संघ का हिस्सा रहे देश-एस्टोनिया, लातविया और लिथुआनिया भी NATO से जुड़ चुके हैं।

रूस हमेशा से NATO को अपने लिए खतरा मानता रहा है। रूस की 1300 किलोमीटर लंबी सीमा फिनलैंड से मिलती है। इसीलिए रूस फिनलैंड के NATO में जाने का विरोध करता है क्योंकि वह नहीं चाहता कि NATO उसके और करीब आए। फिलहाल नाटो के सदस्य देशों नॉर्वे, पोलैंड, एस्टोनिया, लातविया, लिथुआनिया की रूस के साथ करीब 1200 किलोमीटर लंबी सीमा है। अगर फिनलैंड भी NATO में आ जाता है, तो यह बढ़कर दोगुनी हो जाएगी।

फिनलैंड और स्वीडन के NATO में जाने की वजह इतिहास से समझिए

1. 700 साल तक स्वीडन का हिस्सा था फिनलैंड

फिनलैंड के पश्चिम में गल्फ ऑफ बॉथनिया के पार स्वीडन बसा है। फिनलैंड करीब 700 साल तक स्वीडन का हिस्सा था। बाल्टिक सागर पर अधिकार को लेकर 1808-1809 में स्वीडन और रूस के बीच फिनिश युद्ध हुआ। सितंबर 1809 में यह युद्ध खत्म हुआ। इस दौरान स्वीडन का एक तिहाई क्षेत्र रूस के कब्जे में आ गया, जिसमें फिनलैंड भी था। फिनलैंड को रूसी साम्राज्य का ऑटोनॉमस हिस्सा बना दिया गया।

2. 105 साल पहले फिनलैंड को रूस से आजादी मिली

1917 में फिनलैंड, रूस से आजाद हुआ, लेकिन नवंबर 1939 में सोवियत यूनियन ने फिनलैंड पर हमला कर दिया। 1940 में फिनलैंड को मजबूरन सोवियत यूनियन के साथ संधि करनी पड़ी। फिनलैंड ने वादा किया कि वह तटस्थता के सिद्धांत पर अमल करेगा, बशर्ते कि उस पर हमला ना हो। यह संधि सोवियत संघ के खत्म होने से 1992 में रद्द हो गई। इसी साल रूस और फिनलैंड के बीच एक नई संधि हुई, जिसमें दोस्ताना रिश्ते बनाए रखने की बात थी।

स्वीडन-फिनलैंड का क्यों उठा रूस से भरोसा, NATO की तरफ क्यों गए?

1814 के बाद से स्वीडन ने किसी युद्ध में हिस्सा नहीं लिया। न ही वह कभी किसी सैन्य गठबंधन में शामिल रहा है। दोनों देशों ने 1995 में यूरोपीय यूनियन, यानी EU की सदस्यता ली। हालांकि, इसके बाद भी दोनों देशों में बहुसंख्यक राय NATO सदस्यता के खिलाफ थी, लेकिन यह स्थिति इस साल जनवरी के बाद से बदलने लगी।

यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद 30 मार्च को हुए हालिया सर्वेक्षण के मुताबिक, फिनलैंड के 61% लोग NATO सदस्यता के पक्ष में थे। वहीं हाल में कराए एक सर्वे में देश के 76% लोग इस कदम के पक्ष में थे। कई राजनीतिक दलों ने भी इसका समर्थन करने के संकेत दिए हैं।

इस साल जनवरी महीने में जब रूसी सेना यूक्रेन से लगी सीमा के पास जमा हो रही थी तो फिनलैंड की प्रधानमंत्री सना मरीन ने कहा था कि उनके देश के NATO से जुड़ने की संभावना बहुत कम है। वहीं यूक्रेन पर हमले के बाद 2 अप्रैल को सना ने कहा कि रूस वैसा पड़ोसी नहीं है, जैसा हमने सोचा था। उसके साथ हमारे रिश्ते इस तरह बदले हैं कि अब इसके बेहतर होने या पहले जैसे होने की उम्मीद नहीं है।

यूक्रेन पर हमले ने रूस के लिए मुसीबत बढ़ाई

एक्सपर्ट्स का मानना है कि स्वीडन-फिनलैंड का NATO से जुड़ना रूस के लिए एक बड़ी सामरिक हार है, क्योंकि जिस तरह यूक्रेन के साथ युद्ध छिड़ा हुआ है और जो विवाद है, उसका बड़ा कारण NATO था। ऐसे में यदि फिनलैंड और स्वीडन जो अब तक औपचारिक तौर पर NATO से न ही जुड़े थे और ना ही उनकी ऐसी कोई मंशा थी, अब अगर NATO से जुड़ते हैं तो ये रूस की सुरक्षा के लिए खतरनाक होगा। दरअसल, फिनलैंड की रूस से लगती करीब 1300 किलोमीटर लंबी सीमा है और उसके NATO से जुड़ने से NATO सेनाओं की रूस की सीमा के आसपास पहुंच 1300 किलोमीटर और बढ़ जाएगी।

स्वीडन-फिनलैंड के जुड़ने से कैसे बढ़ेगी रूस के आसपास NATO की ताकत?

स्वीडन और फिनलैंड के जुड़ने से रूस के आसपास NATO की ताकत और बढ़ेगी। उदाहरण के लिए फिनलैंड के पास यूरोप की सबसे ताकतवर वायुसेनाओं में से एक मौजूद है।

फिनलैंड के पास F/A-18 सुपरसोनिक फाइटर प्लेन हैं, साथ ही वह अमेरिका से F-35 फाइटर प्लेन भी खरीदने जा रहा है। वहीं स्वीडन के पास ग्रिपेन फाइटर प्लेन हैं, जिनके बारे में स्वीडन ने दावा किया था कि वे रूसी सुखोई फाइटर प्लेन को मात देते हुए उन्हें मार गिराने में सक्षम हैं।

वहीं जमीनी फौज के मामले में भी फिनलैंड के पास यूरोप की सबसे ज्यादा ताकतवर आर्टिलरी फोर्सेज हैं। उसके पास करीब 1500 अलग-अलग आर्टिलरी सिस्टम हैं। साथ ही फिनलैंड के पास करीब 9 लाख की रिजर्व फोर्स है। दिसंबर 2021 में हुए एक पोल में करीब 90% फिनलैंड के पुरुषों और 84% महिलाओं ने कहा था कि वे अपनी क्षमता के अनुसार अपने देश की रक्षा के लिए तैयार हैं।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, बर्फ में और आर्किटिक इलाके में लड़ाई के मामले में फिनलैंड की सेना का जवाब नहीं है।

वहीं स्वीडन ने नेवल वॉर गेम में अपनी क्षमता साबित की है। स्वीडन के पास HSMS गॉटलैंड नामक सबमरीन है, जो डिस्ट्रॉयर और न्यूक्लियर अटैक सबमरीन को चमका देने में सक्षम है।

जानकारों का मानना है कि रूस के साथ हजारों किलोमीटर लंबी सीमा साझा करने वाले फिनलैंड के जुड़ने से NATO को अतिरिक्त खुफिया जानकारी मिल सकती है, जोकि युद्ध की स्थिति में महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।

एक्सपर्ट्स का मानना है कि NATO के पास अपनी एक्टिव खुफिया क्षमता नहीं है, वह इसके लिए अपने सहयोगी देशों पर निर्भर है। ऐसे में फिनलैंड इस मामले में एक बड़ी भूमिका निभा सकता है, क्योंकि वह रूस का सीमावर्ती देश है और NATO के किसी और सहयोगी की तुलना में रूस से ज्यादा परिचित है।

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