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भास्कर एक्सप्लेनर:ASI पता करेगी क्या ज्ञानवापी मस्जिद के नीचे मंदिर है, कितना पुराना है ये विवाद और कौन उठाएगा सर्वे का खर्च? जानें सबकुछ

एक वर्ष पहले

बनारस में एक मस्जिद है, नाम है ज्ञानवापी मस्जिद। ये मस्जिद काशी की पहचान काशी विश्वनाथ मंदिर से बिल्कुल लगी हुई है। दावा है कि ये मस्जिद औरंगजेब ने एक मंदिर तोड़कर बनवाई थी। दावा करने वाले कोर्ट पहुंचे हैं और कोर्ट ने भी ऑर्डर दिया है। ऑर्डर ये पता लगाने का कि क्या मस्जिद के नीचे पहले कुछ था भी या नहीं।

लेकिन, देश का एक कानून इस ऑर्डर में पेंच फंसा सकता है। कानून का नाम है पूजा स्थल कानून-1991, जो सन 1991 में पीवी नरसिम्हा राव सरकार ने बनाया था। आखिर अचानक से मामला सुर्खियों में क्यों आ गया है? इसे लेकर विवाद क्या है? पूजा स्थल कानून क्या कहता है? इस मामले में और क्या पेंच हैं? आइए समझते हैं...

अभी क्या हुआ है जो ये मामला चर्चा में आया?

वाराणसी की फास्ट ट्रैक कोर्ट ने गुरुवार को आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (ASI) को ज्ञानवापी मस्जिद के आर्कियोलॉजिकल सर्वे का आदेश दिया। सर्वे के बाद ASI को अपनी रिपोर्ट कोर्ट को सौंपनी है। इसके लिए 5 सदस्यों की एक कमेटी भी बनाई गई है। कोर्ट ने ये आदेश उस याचिका पर दिया, जिसमें कहा गया है कि ज्ञानवापी मस्जिद जिस जगह बनी है वो मंदिर है। इसलिए इस जमीन पर हिंदू पक्ष का कब्जा बहाल किया जाए ।

ये कमेटी क्या करेगी और सर्वे का खर्च कौन देगा?

  • 5 सदस्यों की कमेटी में अल्पसंख्यक समुदाय के 2 लोग शामिल होंगे। पुरातत्व विज्ञान के एक विशेषज्ञ और अनुभवी व्यक्ति को इस कमेटी का पर्यवेक्षक बनाया जाएगा।
  • कमेटी जांच करेगी कि क्या मौजूदा ढांचा किसी इमारत को तोड़कर बना है या फिर इमारत में कुछ जोड़कर। कमेटी इस बात का भी पता लगाएगी कि क्या विवादित स्थल पर मस्जिद के निर्माण से पहले वहां कोई हिंदू समुदाय से जुड़ा मंदिर कभी मौजूद था।
  • कमेटी इस पूरे कार्य की फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी कराएगी। सर्वे के पूरे काम को गोपनीयता के साथ किया जाएगा। सर्वेक्षण स्थल पर आम जनता एवं मीडिया को प्रवेश की अनुमति नहीं रहेगी। इस संबंध में किसी के भी द्वारा मीडिया से कोई बात नहीं की जाएगी। कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को इस पूरे सर्वे का खर्च उठाने का आदेश दिया है।

1991 का पूजा स्थल कानून तो इस तरह के केस को रोकता है उसका क्या?

पहले 1991 के पूजा स्थल कानून को समझ लेते हैं। सितंबर 1991 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव की कांग्रेस सरकार ने पूजा स्थल कानून बनाया। ये कानून कहता है कि 15 अगस्त 1947 से पहले अस्तित्व में आए किसी भी धर्म के पूजा स्थल को किसी दूसरे धर्म के पूजा स्थल में नहीं बदला जा सकता। अगर कोई ऐसा करने की कोशिश करता है तो उसे एक से तीन साल तक की जेल और जुर्माना हो सकता है। अयोध्या का मामला उस वक्त कोर्ट में था इसलिए उसे इस कानून से अलग रखा गया था।

सुप्रीम कोर्ट में पूजा स्थल कानून को चुनौती देने वाली याचिका लगाने वाले अश्विनी उपाध्याय कहते हैं कि कोर्ट ने इस कानून पर केंद्र को नोटिस जारी किया है। अब ये कानून ही सब ज्यूडिशियल है तो मामले की सुनवाई हो सकती है।

वहीं, सुप्रीम कोर्ट के वकील और 'अयोध्याज राम टेंपल इन कोर्ट्स' किताब लिखने वाले विराग गुप्ता कहते हैं कि जज ने साक्ष्य अधिनियम की धारा 45 और 49 के साथ सीपीसी के रूल 10 ऑर्डर 26 के तहत एएसआई जांच का आदेश दिया है। सिविल जज ने जांच का फैसला देने के लिए एम सिद्दीक मामले में सुप्रीम कोर्ट के 2019 के फैसले को भी नजीर माना है।

क्यों बनाया गया था पूजा स्थल कानून?

दरअसल, ये वो दौर था जब राम मंदिर आंदोलन अपने चरम पर था। भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने 25 सितंबर 1990 को सोमनाथ से रथयात्रा निकाली। इसे 29 अक्टूबर को अयोध्या पहुंचना था, लेकिन 23 अक्टूबर को उन्हें बिहार के समस्तीपुर में गिरफ्तार कर लिया गया। गिरफ्तार करने का आदेश दिया था जनता दल के मुख्यमंत्री लालू यादव ने। इस गिरफ्तारी का असर ये हुआ कि केंद्र में जनता दल की वीपी सिंह सरकार गिर गई, जो भाजपा के समर्थन से चल रही थी।

इसके बाद वीपी सिंह से अलग होकर चंद्रशेखर ने कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाई, लेकिन ये भी ज्यादा नहीं चल सकी। नए सिरे से चुनाव हुए और केंद्र में कांग्रेस की सरकार आई। पीवी नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री बने। राम मंदिर आंदोलन के बढ़ते प्रभाव के चलते अयोध्या के साथ ही कई और मंदिर-मस्जिद विवाद उठने लगे थे। इन विवादों पर विराम लगाने के लिए ही नरसिम्हा राव सरकार ये कानून लेकर आई थी।

ज्ञानवापी मस्जिद को लेकर विवाद क्या है?

ज्ञानवापी विवाद को लेकर हिन्दू पक्ष का कहना है कि विवादित ढांचे के नीचे 100 फीट ऊंचा आदि विश्वेश्वर का स्वयंभू ज्योतिर्लिंग है। काशी विश्वनाथ मंदिर का निर्माण करीब 2050 साल पहले महाराजा विक्रमादित्य ने करवाया था, लेकिन मुगल सम्राट औरंगजेब ने साल 1664 में मंदिर को तुड़वा दिया। दावे में कहा गया है कि मस्जिद का निर्माण मंदिर को तोड़कर उसकी भूमि पर किया गया है जो कि अब ज्ञानवापी मस्जिद के रूप में जाना जाता है।

याचिकाकर्ता ने मांग की है कि ज्ञानवापी परिसर का पुरातात्विक सर्वेक्षण कर यह पता लगाया जाए कि जमीन के अंदर का भाग मंदिर का अवशेष है या नहीं। साथ ही विवादित ढांचे का फर्श तोड़कर ये भी पता लगाया जाए कि 100 फीट ऊंचा ज्योतिर्लिंग स्वयंभू विश्वेश्वरनाथ भी वहां मौजूद हैं या नहीं। मस्जिद की दीवारों की भी जांच कर पता लगाया जाए कि ये मंदिर की हैं या नहीं। याचिकाकर्ता का दावा है कि काशी विश्वनाथ मंदिर के अवशेषों से ही ज्ञानवापी मस्जिद का निर्माण हुआ था।

इस विवाद को लेकर कोर्ट में अब तक क्या-क्या हुआ?

  • काशी विश्वनाथ ज्ञानवापी केस में 1991 में वाराणसी कोर्ट में मुकदमा दाखिल हुआ था। याचिका में ज्ञानवापी परिसर में पूजा की अनुमति मांगी गई। प्राचीन मूर्ति स्वयंभू भगवान विश्वेश्वर की ओर से सोमनाथ व्यास, रामरंग शर्मा और हरिहर पांडेय बतौर वादी इसमें शामिल हैं।
  • मुकदमा दाखिल होने के कुछ महीनों बाद ही केंद्र ने पूजा स्थल कानून बना दिया। इसी कानून का हवाला देकर मस्जिद कमेटी ने याचिका को हाईकोर्ट में चुनौती दी। 1993 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्टे लगाकर यथास्थिति कायम रखने का आदेश दिया था।
  • 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि किसी भी मामले में स्टे ऑर्डर की वैधता केवल छह महीने के लिए ही होगी। उसके बाद ऑर्डर प्रभावी नहीं रहेगा।
  • इसी आदेश के बाद 2019 में वाराणसी कोर्ट में फिर से इस मामले में सुनवाई शुरू हुई। गुरुवार को वाराणसी की सिविल जज सीनियर डिवीजन फास्ट ट्रैक कोर्ट से ज्ञानवापी मस्जिद के पुरातात्विक सर्वेक्षण की मंजूरी दी है।

विवादित स्थल की वर्तमान स्थिति क्या है?

स्थानीय पत्रकार तरुण प्रताप सिंह का कहना है कि मंदिर परिसर में हमेशा 6-7 हजार भक्त उपस्थित रहते हैं। चूंकि ये जगह संवेदनशील मानी जाती है इसलिए ज्ञानवापी मस्जिद में प्रशासन ने केवल कुछ ही लोगों को नमाज पढ़ने की अनुमति दे रखी है। ये वो लोग हैं जो हमेशा से यहां नमाज पढ़ते आए हैं। इन लोगों के अलावा यहां किसी को भी नमाज पढ़ने की अनुमति नहीं है।

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