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भास्कर एक्सप्लेनर:महंगाई दर @ 7.61%; छह साल में सबसे ज्यादा; लॉकडाउन के बाद तो थमी ही नहीं, जानिए क्यों?

6 महीने पहले
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केंद्र सरकार ने अक्टूबर के लिए महंगाई के आंकड़े जारी कर दिए हैं। इसके मुताबिक अक्टूबर में महंगाई दर 7.61% रही। यह पिछले छह साल में यानी जब से नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने हैं, तब से अब तक सबसे ज्यादा है। इससे पहले मई 2014 में महंगाई दर 8.33% थी, जो मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली UPA सरकार के गिरने की एक बड़ी वजह भी बनी थी। पिछले नौ महीनों से लगातार महंगाई बढ़ ही रही है। ऐसा क्यों हुआ और इसका क्या असर होगा?

क्यों बढ़ी महंगाई?

रिटेल महंगाई दर को कंज्यूमर प्राइज इंडेक्स (CPI) के आधार पर निकाला जाता है। यदि अक्टूबर का इंडेक्स देखें तो खाद्य वस्तुओं की महंगाई दर 10.16% की रफ्तार से बढ़ी। महंगाई दर में खाद्य वस्तुओं की कीमतों का वेटेज (हिस्सा) 45.8% है।

अक्टूबर में कई शहरों में प्याज-आलू की कीमतें आसमान छू रही थीं। प्याज तो 100 रुपए प्रति किलो की दर पर पहुंच गया था। इसका असर यह हुआ कि अक्टूबर-2019 के मुकाबले सब्जियां पिछले महीने 22% महंगी रही। इसने खाद्य महंगाई दर और ओवरऑल रिटेल महंगाई दर को बढ़ाया।

...पर महंगाई तो नौ महीने से बढ़ रही है?

यह सच है। महंगाई दर नौ महीने से बढ़ रही है। अप्रैल और मई में लॉकडाउन की वजह से सरकार देशभर के बाजारों से आंकड़े नहीं जुटा सकी थी। जब जून से फिर मार्केट से आंकड़े मिले तब से लगातार महंगाई बढ़ ही रही है। इसका कारण खाद्य महंगाई दर का बढ़ना ही है।

दरअसल, देशभर में लॉकडाउन की वजह से सब्जियों के साथ-साथ अंडे, मछली और अन्य प्रोटीन प्रोडक्ट्स की सप्लाई प्रभावित हुई है। इससे यह महंगे होते जा रहे हैं। अक्टूबर में ही अंडे 21% और मांस-मछली 18% की दर से महंगे हुए हैं। इसने भी खाद्य महंगाई दर को बढ़ाने में भूमिका निभाई।

क्या दुनियाभर में ऐसा हो रहा है?

नहीं। दुनियाभर में इसके विपरीत ट्रेंड सामने आ रहा है। चीन में अक्टूबर में महंगाई दर 11 साल में सबसे कम 0.5% रही। इसकी वजह है अफ्रीकन स्वाइन फीवर। लोगों ने सुअर खाना बंद कर दिया और उसकी आबादी बढ़ने से कीमतों में गिरावट दर्ज हुई है। वहां तो नवंबर में महंगाई दर निगेटिव रहने का अनुमान लगाया जा रहा है।

अमेरिका में भी अक्टूबर में महंगाई दर 1.3% रही। ब्रिटेन और जापान में भी महंगाई दर 0.5% के आसपास ही रही। दरअसल, इन देशों में मंदी और डिफ्लेशन का खतरा मंडरा रहा है। जिस तरह बहुत ज्यादा महंगाई यानी इन्फ्लेशन अच्छा नहीं होता, वैसे ही डिफ्लेशन भी इकोनॉमी के लिए अच्छी नहीं मानी जाती। इससे ग्रोथ रेट गिरने का डर रहता है।

महंगाई दर बढ़ने से क्या बदल जाएगा?

सरकार ने रिजर्व बैंक (RBI) को 2 प्रतिशत की घट-बढ़ के साथ 4% पर महंगाई दर रखने की जिम्मेदारी सौंपी है। लेकिन लॉकडाउन लगने के बाद से महंगाई थम ही नहीं रही। अक्टूबर लगातार सातवां महीना है जब महंगाई दर 6% से ऊपर बनी हुई है। RBI ने पिछले रिव्यू में ब्याज दरें नहीं घटाई थीं। यदि महंगाई दर इसी तरह बढ़ती रही तो लगता नहीं कि ब्याज दरों में कोई गिरावट होगी।

यूनियन बैंक के MD और CEO राजकिरण राय का कहना है कि जब तक महंगाई दर कम नहीं होगी, तब तक ब्याज दरों में गिरावट की संभावना नहीं दिख रही। उनके मुताबिक दिसंबर में थोड़ी राहत मिलेगी और अच्छी फसल के बाद फरवरी में महंगाई दर के कम होने की संभावना दिख रही है।

दो दिन पहले रिजर्व बैंक ने स्टेट ऑफ द इकॉनॉमी रिपोर्ट में कहा कि प्याज पर स्टॉक लिमिट लगाने, आलू-प्याज का इम्पोर्ट बढ़ाने, अनाज पर इम्पोर्ट ड्यूटी घटाने से भी खाद्य वस्तुओं की कीमतें कम नहीं हुई हैं। इससे डर है कि मौजूदा कीमतें ही सामान्य न हो जाएं।

वहीं, आर्थिक मामलों के सचिव तरुण बजाज ने कहा था कि खाद्य वस्तुओं की बढ़ी हुई कीमतें अस्थायी हैं। यह ज्यादा दिन तक नहीं टिकने वाला। आवश्यक वस्तुओं की सप्लाई सामान्य होने पर कीमतें कम होने लगेंगी।

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