एटम बम का ऐलान किया फिर प्लेन क्रैश:होमी भाभा समेत 117 लोग आज तक नहीं मिले; हादसा या अमेरिकी साजिश?

10 दिन पहले

1965 की बात है। ऑल इंडिया रेडियो पर डॉ. होमी जहांगीर भाभा ने एक इंटरव्यू दिया। इस इंटरव्यू में उन्होंने एक ऐसी घोषणा की, जिसने दुनिया के बड़े-बड़े मुल्कों को चौंका दिया। भाभा ने कहा, ‘अगर मुझे छूट मिले, तो मैं 18 महीने में भारत के लिए एटम बम बनाकर दिखा सकता हूं।’

इस इंटरव्यू के 3 महीने बाद 24 जनवरी 1966 को एअर इंडिया के बोइंग 707 विमान ने मुंबई से लंदन के लिए उड़ान भरी, लेकिन यह पहुंच नहीं सका। यूरोप के आल्प्स माउंटेन रेंज में यह विमान क्रैश हो गया। हादसे में 117 लोगों की जान गई। इनमें भारत के न्यूक्लियर प्रोग्राम के जनक वैज्ञानिक डॉक्टर होमी जहांगीर भाभा भी थे।

आज उनकी 56वीं बरसी पर जानेंगे कि भारत के लिए कितने अहम थे होमी भाभा, कैसे हुआ उनका प्लेन हादसा और क्या इसके पीछे अमेरिकी खुफिया एजेंसी की साजिश थी…

भारत के न्यूक्लियर प्रोग्राम के जनक थे होमी भाभा

होमी भाभा 1909 में एक अमीर पारसी परिवार में पैदा हुए। 1927 में कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। इसके बाद एटॉमिक फिजिक्स में काम शुरू कर दिया। 1939 में वो इंग्लैंड छोड़कर भारत लौट आए।

उनका भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से करीबी रिश्ता था। नेहरू को बस दो लोग भाई कहते थे। एक थे जयप्रकाश नारायण और दूसरे होमी भाभा। होमी भाभा ने अपने सभी पत्रों में नेहरू को माई डियर भाई कहकर संबोधित किया है।

ट्राम्बे स्थित न्यूक्लियर पावर प्लांट पर होमी भाभा और जवाहर लाल नेहरू। तस्वीर- INC
ट्राम्बे स्थित न्यूक्लियर पावर प्लांट पर होमी भाभा और जवाहर लाल नेहरू। तस्वीर- INC

इंदिरा गांधी ने संसद में दिए अपने एक भाषण में इस बात का जिक्र किया है कि नेहरू को भाभा अक्सर देर रात में फोन करते थे और नेहरू हमेशा उनसे बात करने के लिए समय निकालते थे।

होमी भाभा ने भारत के परमाणु कार्यक्रमों की रूपरेखा तय की। देश के आजादी के तुरंत बाद साल 1948 में उन्होंने परमाणु ऊर्जा आयोग की स्थापना की और इसी साल नेहरू ने उन्हें परमाणु कार्यक्रमों का निदेशक बना दिया। 1955 में उन्होंने परमाणु कार्यक्रमों पर आधारित यूनाइटेड नेशन की उस सभा की अध्यक्षता की जिसमें 73 देशों के 1,428 प्रतिनिधि मौजूद थे।

1961 में चीन-भारत युद्ध हुआ और भारत की हार के बाद परमाणु हथियारों को लेकर होमी भाभा ने सार्वजनिक रूप से काम तेज कर दिया। सरकार ने भी सपोर्ट किया और परमाणु रिएक्टरों से उत्पन्न बिजली को तीसरी पंचवर्षीय योजना (1961-1966) में शामिल कर लिया।

1963 में राजस्थान में भारत का पहला न्यूक्लियर पावर प्लांट लगाने के अंतरराष्ट्रीय समझौते पर हस्ताक्षर हुए। इन समझौतों में कई कठोर नियम थे जिससे यह सुनिश्चित किया गया कि इनका प्रयोग युद्ध और सेना के अन्य कार्यक्रमों में नहीं किया जाएगा।

राजस्थान में स्थित देश का पहला एटॉमिक पावर स्टेशन। तस्वीर- VSSC.GOV.IN
राजस्थान में स्थित देश का पहला एटॉमिक पावर स्टेशन। तस्वीर- VSSC.GOV.IN

होमी भाभा जल्द ही भारत को अमेरिका, सोवियत यूनियन, चीन की लीग में खड़ा कर देते, लेकिन 24 जनवरी की मनहूस तारीख को प्लेन क्रैश में भाभा का निधन हो गया।

24 जनवरी 1966, दुर्घटना वाले दिन क्या हुआ?

एअर इंडिया की कंचनजंघा नाम की फ्लाइट मुंबई से 11 क्रू और 106 पैसेंजर्स को लेकर सुबह 8:02 बजे लंदन के लिए उड़ी। ये फ्लाइट अपने तीसरे स्टॉपेज जेनेवा में उतरने वाली थी। मुंबई से दिल्ली, दिल्ली से बेरूत और बेरूत से जेनेवा होते हुए लंदन जाने वाली ये फ्लाइट उतरने से ठीक पहले इटली और फ्रांस के सीमा पर स्थित मोंट ब्लांक की बर्फीली पहाड़ियों से टकरा गई।

रेस्क्यू टीम पहुंची तो विमान का नामों निशान मिट चुका था। पता चला कि प्लेन का मलबा ग्लेशियर में धंस चुका है। वहां सिर्फ कुछ डेली यूज के सामान और चिट्ठियां वगैरह मिलीं। न ब्लैक बॉक्स मिला न ही पूरी तरह से मलबे का पता लग सका। मौसम खराब था तो फ्रांस के अधिकारियों ने रेस्क्यू ऑपरेशन रोक दिया।

प्लेन क्रैश के बाद द स्टेटमैन अखबार का पहला पन्ना।
प्लेन क्रैश के बाद द स्टेटमैन अखबार का पहला पन्ना।

सितंबर 1966 में जांच फिर से शुरू की गई, लेकिन कुछ नहीं मिला। फ्रांस सरकार ने रिपोर्ट बनाई कि बेरूत से उड़ते वक्त ही विमान के एक उपकरण में खराबी थी। जांच के दौरान जेनेवा कंट्रोल रूम को बताया गया कि लैंडिग के वक्त जिस उपकरण की मदद से (वेरी हाई फ्रिक्वेंसी ऑमिनी रेंज VOR) जमीन की दूरी नापी जाती है, वो खराब था।

कंट्रोल रूम को पायलट ने अपनी ऊंचाई 19000 फीट बताई थी। यानी मोंट ब्लांक पहाड़ी से 3000 फीट की ऊंचाई पर। कंट्रोल रूम ने रडार की हेल्प से पायलट को विमान का पोजिशन क्लियर किया और उसे उतरने के लिए कहा।

जेनेवा एयरपोर्ट और पीछे मोंट ब्लांक पहाड़ी। साल- 2022। तस्वीर- AFP
जेनेवा एयरपोर्ट और पीछे मोंट ब्लांक पहाड़ी। साल- 2022। तस्वीर- AFP

जांच अधिकारियों ने कहा कि यहां पायलट ने एक गलती कर दी थी। उसे लगा कि उसने ग्लेशियर की सबसे ऊंची पहाड़ी मोंट ब्लांक क्रॉस कर ली है, जबकि ऐसा नहीं था और लैंडिंग के वक्त आलप्स की पहाड़ियों में विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया।

इस थ्योरी पर भरोसा कम था, लेकिन चूंकि सरकारी निष्कर्ष यही था तो इसे माना जाता रहा। फ्रांसीसी तर्क को भारत सरकार द्वारा भी स्वीकार कर लिया गया।

फ्रांस की सरकार द्वारा जांच करने के बाद भारत को सौंपी गई रिपोर्ट का पहला पन्ना।
फ्रांस की सरकार द्वारा जांच करने के बाद भारत को सौंपी गई रिपोर्ट का पहला पन्ना।

फिर मीडिया वाले नई बात ले आए

इस थ्योरी को सबसे पहले नकारा फ्रांस की सरकारी न्यूज एजेंसी ORTF के एडिटर फिलीपे रेयाल ने। उन्होंने ग्लेशियर वाले दुर्घटनास्थल पर अपने कैमरा मैन और रिपोर्टर्स भेजे। इसके बाद 1843 नाम की मैगजीन में एक रिपोर्ट छपी।

रिपोर्ट में कहा गया कि फिलीपे को वहां दो सबूत मिले हैं। वहां एक प्लेन का टुकड़ा मिला जिस पर जून 1960 लिखा था, जबकि एअर इंडिया की जो प्लेन दुर्घटनाग्रस्त हुई था वो 1961 में बना था।

क्रैश हो चुके विमान की तरह का ही दूसरा एअर इंडिया बोइंग 707। तस्वीर- Comments
क्रैश हो चुके विमान की तरह का ही दूसरा एअर इंडिया बोइंग 707। तस्वीर- Comments

इसके अलावा प्लेन के सामने के हिस्से का पीले रंग का टुकड़ा भी मिला जो एअर इंडिया के प्लेन का नहीं था। इसके बाद फिलीपे की टीम ने मोंट ब्लांक पर जाकर और तहकीकात करने का फैसला किया, लेकिन फ्रांस सरकार के एक मंत्री ने न्यूज एजेंसी ORTF की टीम को वापस बुला लिया।

मामला लगभग शांत हो ही रहा था और टीम वापस लौट ही रही थी कि टीम के एक मेंबर ने अपना पक्ष सबके सामने रख दिया। उसने कहा कि एअर इंडिया की फ्लाइट पहाड़ी से नहीं टकराई थी, बल्कि एक दूसरे विमान से टकराकर दुर्घटनाग्रस्त हुई थी। इस थ्योरी को बल तब मिल गया जब टीम के लौटते ही उनकी खोज में मिली चीजों को सरकार ने अपने कब्जे में ले लिया।

हादसे के 42 साल बाद अमेरिका की खुफिया एजेंसी CIA की साजिश का दावा

साल 2008 में CIA के एजेंट रॉबर्ट क्रॉली और अमेरिकी पत्रकार ग्रेगरी डगलस के बीच कथित बातचीत पर एक किताब प्रकाशित हुई। कन्वर्सेशन विद द क्रो नाम की इस किताब के मुताबिक भारत जैसे देश के परमाणु हथियार बनाने का ऐलान करने के बाद अमेरिका परेशान था।

CIA एजेंट के इंटरव्यू के आधार पर लिखी गई किताब का कवर
CIA एजेंट के इंटरव्यू के आधार पर लिखी गई किताब का कवर

साल 1945 से ही अमेरिका परमाणु हथियार से लैस इकलौता देश बना हुआ था। 1964 में सोवियत संघ और चीन दोनों ने परमाणु परीक्षण किया और फिर साल 1965 में होमी भाभा ने ऑल इंडिया रेडियो को एक इंटरव्यू दिया। जिसमें उन्होंने कहा कि भारत 18 महीने के अंदर परमाणु हथियार बना लेगा। इस इंटरव्यू के तीन महीने बाद ही प्लेन क्रैश में होमी भाभा की जान चली गई।

इससे पहले लाल बहादुर शास्त्री ने चीन-भारत युद्ध के बाद की स्थिति से निपटते हुए परमाणु हथियार के ऐक्सपैरिमैंट को और तेज करने की स्वीकृति प्रदान कर दी थी। इस किताब में शास्त्री जी की मृत्यु के लिए भी CIA को ही जिम्मेदार बताया गया है।

CIA एजेंट ने होमी भाभा का जिक्र करते हुए कहा, "तुम मेरी बात मानो, वो (होमी भाभा) बहुत खतरनाक था। हमारे लिए और अधिक परेशानी खड़ी करने के लिए विएना जा रहा था और उसके बोइंग 707 के कार्गो होल्ड में बम फट गया।’

फिर 2017 में एक शख्स ने नई थ्योरी दी

डेनियल रौश फ्रांस के पुराने बिजनेसमैन और स्पोर्ट्समैन थे। उन्हें विमान हादसों में बहुत इंट्रेस्ट रहता था। उन्हें जब इस विमान हादसे के बारे में मालूम चला तो उन्होंने खोज शुरू की।

साल 2017 में उन्हें आल्प्स की पहाड़ियों पर एक विमान के अवशेष मिले। इसके बाद बारी बारी से उन्हें सीट बेल्ट, कॉकपिट का हिस्सा, एक फ्लेयर पिस्टल, कागजातों से भरा बैग, कैमरा वगैरह मिला।

साल 2018 में उन्हें फ्लाइट 101 का जेट इंजन मिला। उसके बाद उन्होंने भी किसी दूसरे विमान से टक्कर की थ्योरी पर जोर दिया। कहा, 'अगर एअर इंडिया की फ्लाइट पहाड़ी से टकराकर गिरी होती तो बहुत तेज आग लगती और विस्फोट होता, क्योंकि प्लेन में 41,000 टन फ्यूल था। मेरे हिसाब से एअर इंडिया के प्लेन की टक्कर इटली के किसी विमान से हो गई थी। चूंकि ऊंचाई ज्यादा थी, ऑक्सीजन कम था तो आग नहीं लगी।'

आल्प्स की पहाड़ियों पर अवशेष खोजता रौशे का हेलिकॉप्टर। तस्वीर साभार- AFP
आल्प्स की पहाड़ियों पर अवशेष खोजता रौशे का हेलिकॉप्टर। तस्वीर साभार- AFP

होमी भाभा के बारे में रौश ने कहा, 'विमान हादसा उनकी मौत के लिए कोई साजिश थी या नहीं इसका अंदाजा नहीं है, लेकिन चूंकि वो भारत को पहला परमाणु हथियार देने वाले थे, इसलिए भारत सरकार चाहे तो मैं वहां से प्राप्त भारतीय यात्रियों के दस्तावेज उन्हें दे सकता हूं। मेरी जिम्मेदारी है कि मैं सबूतों के आधार पर दुनिया को सच बताऊं।'

रौश ने फ्रांस के अधिकारियों पर आरोप भी लगाया कि उन्हें रोकने की बार-बार कोशिश की गई। रौश ने दूसरे प्लेन का नाम भी बता दिया। F-104G स्टार फाइटर जेट। रौश का कहना है, ‘1960 के आसपास इटली वाले फ्रांस की सेना की जासूसी के लिए स्टार फाइटर प्लेन की मदद लेते थे। इसमें फ्रांस की नजर से बचने के लिए ट्रांसपोंडर हटा देते थे।’

ट्रांसपोंडर की मदद से एक विमान दूसरे को रेडियो सिग्नल भेजते हैं जिससे पायलट एयर ट्रैफिक या दूसरे विमान की स्थिति का अंदाजा लगाता है। रैश की थ्योरी के मुताबिक स्टार फाइटर जेट में ट्रांसपोंडर नहीं था जिसके चलते वो एअर इंडिया के 'कंचनजंघा' से भिड़ गया। रैश कहते हैं कि चूंकि ये मामला सेना से जुड़ा हुआ था, इसलिए इसे वहीं दबा दिया गया।

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