38 साल पहले सियाचिन में पाकिस्तान को मिली थी मात:भारत ने चलाया था ऑपरेशन मेघदूत, अब मिला उसमें लापता हुए शहीद का शव

2 महीने पहलेलेखक: अभिषेक पाण्डेय

29 मई 1984: सियाचिन ग्लेशियर, दुनिया का सबसे ऊंचा जंग का मैदान। इस पर कब्जे के लिए चलाए गए ऑपरेशन मेघदूत में शामिल सेना के 20 जवान पेट्रोलिंग के लिए निकले थे, लेकिन रास्ते में ही हिमस्खलन का शिकार बन गए। 15 जवानों के शव कुछ दिन बरामद हो गए, लेकिन 5 जवानों का कुछ पता नहीं चला।

15 अगस्त 2022: भारतीय सेना ने 38 साल पहले ऑपरेशन मेघदूत के दौरान सियाचिन में लापता हुए जवानों में से एक लांस नायक चंद्रशेखर हरबोल के शव को खोज निकाला।

एक्सप्लेनर में जानते हैं कि क्या था ऑपरेशन मेघदूत, जिससे भारत ने सियाचिन पर लहराया था परचम, कैसे 38 साल पहले सियाचिन में लापता हुए थे लांस नायक चंद्रशेखर...

ऑपरेशन मेघदूत की कहानी

1984 में भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ को सूचना मिली कि पाकिस्तान सियाचिन पर कब्जे की फिराक में है। इसके लिए वो जर्मनी से बड़ी संख्या में बर्फीले इलाके में तैनात सैनिकों के पहनने वाले कपड़े और सैन्य-उपकरण खरीद रहा था।

पाकिस्तान की ऑपरेशन अबाबील के जरिए 17 अप्रैल 1984 तक सियाचिन पर कब्जा करने की योजना थी। जानकारी मिलते ही तत्कालीन PM इंदिरा गांधी ने सेना को सियाचिन पर कब्जे की मंजूरी दे दी।

मार्च 1984 में लेफ्टिनेंट-कर्नल डीके खन्ना की अगुआई में कुमाऊं रेजिमेंट की एक बटालियन और लद्दाख स्काउट्स की यूनिट्स बर्फ से ढंके जोजिला पास से होते हुए पैदल ही सियाचिन के लिए रवाना हो गईं। भारतीय सेना के जवान पैदल इसलिए गए, ताकि पाकिस्तानी रडार उनकी मूवमेंट को पकड़ न पाएं।

इसके बाद भारत ने 10 अप्रैल से 30 अप्रैल 1984 के बीच लेफ्टिनेंट जनरल प्रेम नाथ हूण की अगुआई में ऑपरेशन मेघदूत चलाने की योजना बनाई। सियाचिन में स्थित सलटारो रिज पर कब्जे की जिम्मेदारी ब्रिगेडियर विजय चन्ना को दी गई।

चन्ना ने 13 अप्रैल की तारीख चुनी, क्योंकि उस दिन वैशाखी का त्योहार था और पाकिस्तानी सेना ये सोच भी नहीं सकती थी कि भारत त्योहार के दिन सैन्य कार्रवाई करेगा।

13 अप्रैल 1984 को भारत ने ऑपरेशन मेघदूत चलाते हुए सियाचिन ग्लेशियर पर कब्जा जमा लिया था। पाकिस्तान की योजना 17 अप्रैल 1984 तक सियाचिन पर कब्जा करने की थी। (प्रतीकात्मक तस्वीर)
13 अप्रैल 1984 को भारत ने ऑपरेशन मेघदूत चलाते हुए सियाचिन ग्लेशियर पर कब्जा जमा लिया था। पाकिस्तान की योजना 17 अप्रैल 1984 तक सियाचिन पर कब्जा करने की थी। (प्रतीकात्मक तस्वीर)

13 अप्रैल को सुबह 5.30 बजे भारतीय सेना का पहला चीता हेलिकॉप्टर बेस कैंप से उड़ा। दोपहर तक 17 और हेलिकॉप्टर 29 और सैनिकों को लेकर बिलाफोंड ला पास पर उतरे। इसके बाद खराब मौसम की वजह से सैनिकों का संपर्क हेडक्वॉर्टर से टूट गया।

चार दिन बाद 17 अप्रैल को दोबारा संपर्क तब स्थापित हुआ, जब सेना के 5 चीता और दो MI-8 हेलिकॉप्टरों ने सिया ला पास के लिए रिकॉर्ड 32 उड़ानें भरीं। उसी दिन एक पाकिस्तानी हेलिकॉप्टर ने ग्लेशियर के ऊपर से उड़ान भरी और उसे वहां पहले से ही तैनात भारतीय सैनिक नजर आए।

यानी ऑपरेशन मेघदूत के जरिए भारतीय सेना ने 4 दिनों के अंदर ही सियाचिन के दो प्रमुख पास सिया-ला और बिलाफोंड ला समेत करीब 3 हजार वर्ग किलोमीटर इलाके पर कब्जा कर लिया था। इस अभियान में करीब 300 भारतीय सैनिकों ने हिस्सा लिया था, इस अभियान में कितने सैनिकों की मौत हुई, इसकी जानकारी नहीं है।

सियाचिन ग्लेशियर पर कब्जे के बाद नॉर्दन आर्मी कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल एमएल छिब्बर ने आधिकारिक नोट में लिखा था, ‘सियाचिन के दो प्रमुख पास पर कब्जा। दुश्मन पूरी तरह हैरान रहा और पाक और US मैप में PoK के कब्जे में अवैध तरीके से दिखाए गए करीब 3300 वर्ग किलोमीटर पर अब हमारा कब्जा है।’

29 मई 1984 को इसी ऑपरेशन मेघदूत के तहत सियाचिन के एक ऊंचे पॉइंट 5965 पर कब्जे के मिशन में शामिल चंद्रशेखर समेत कुमाऊं रेजिमेंट के 20 जवान हिमस्खलन यानी ग्लेशियर टूटने की वजह से लापता हो गए थे।

1987 में ऑपरेशन राजीव के जरिए भारत ने पाक से छीना था सियाचिन की एक और पोस्ट

अगले 3 सालों में पाकिस्तानी सेना ने सियाचिन में सबसे ऊंची जगह पर ‘कायदे आजम पोस्ट’ बना ली थी। इस पोस्ट से पाकिस्तानी सेना भारतीय सेना की हर एक्टिविटी पर नजर रख रही थी।

25 जून 1987 को भारत ने ऑपरेशन राजीव चलाते हुए कायदे आजम पोस्ट को पाकिस्तानी सेना से छीन लिया था। इस लड़ाई में बहादुरी दिखाने के लिए सूबेदार बाना सिंह को परमवीर चक्र दिया गया था और इस पोस्ट का नाम उनके सम्मान में बाना पोस्ट रख दिया गया।

तब से अब तक पूरे सियाचिन ग्लेशियर पर भारत का कब्जा है। अब भी दोनों ओर से हजारों की संख्या में सैनिक सियाचिन ग्लेशियर के आसपास तैनात हैं।

भारत के लिए क्यों जरूरी है सियाचिन

  • सियाचिन ग्लेशियर लद्दाख में स्थित करीब 20 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित बेहद दुर्गम इलाका है। ये कराकोरम पर्वत रेंज में स्थित है।
  • सियाचिन दुनिया का सबसे ऊंचा जंग का मैदान है, जहां पिछले 38 सालों से भारत-पाकिस्तान की सेनाएं आमने-सामने हैं।
  • 1984 से ही करीब 76 किलोमीटर लंबे पूरे सियाचिन ग्लेशियर और इसके सभी प्रमुख दर्रे भारत के नियंत्रण में हैं।
  • सियाचिन की भौगोलिक स्थिति उसे भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण बनाती है। इसके एक तरफ पाकिस्तानी नियंत्रण वाला इलाका है तो वहीं दूसरी तरफ चीन।
  • यहां से भारत पाकिस्तान के साथ ही चीन की भी गतिविधियों पर नजर रख सकता है। साथ ही भारत, पाक और चीन के सैन्य गठबंधन को रोकता है, जो लद्दाख की सुरक्षा के लिए बहुत जरूरी है।
  • सियाचिन उस पॉइंट NJ9842 के ठीक उत्तर में हैं, जहां भारत और पाकिस्तान के बीच नियंत्रण रेखा यानी LoC खत्म होती है।
  • सियाचिन सालभर बर्फ से ढंका रहता है। यहां औसत तापमान जीरो से भी कम -10 डिग्री सेंटीग्रेड रहता है। सर्दियों में यहां का तापमान -50 से -70 डिग्री सेंटीग्रेड हो जाता है।

सियाचिन ग्लेशियर को लेकर भारत-पाकिस्तान के बीच क्यों है विवाद

1947 में कश्मीर को लेकर भारत-पाकिस्तान की जंग के बाद 1949 में यूनाइटेड नेशंस की देखरेख में भारत-पाकिस्तान के बीच समझौता हुआ। इसके तहत कश्मीर में भारत-पाकिस्तान के बीच एक संघर्ष विराम लाइन या CFL खींची गई, लेकिन इस एग्रीमेंट में संघर्ष विराम लाइन के सबसे उत्तरी सिरे पर स्थित एक पॉइंट NJ9842 के आगे सीमा रेखा नहीं खींची गई।

ऐसा इसलिए किया गया, क्योंकि उसके आगे का इलाका पहाड़ी और बर्फ से ढंके होने की वजह से बेहद निर्जन था। उस समय किसी ने ये नहीं सोचा था कि पॉइंट NJ9842 के ऊपर के इलाके में भी कभी सैन्य ऑपरेशन भी हो सकता है।

1972 में हुए शिमला समझौते के बाद हुए सुचेतगढ़ समझौते में CFL को ही दोनों देशों ने लाइन ऑफ कंट्रोल या LoC माना, लेकिन पॉइंट NJ9842 के आगे की सीमा का निर्धारण फिर भी नहीं किया गया। हालांकि, इस समझौते में ये सहमति बनी कि पॉइंट NJ9842 से ऊपर जाती हुई नियंत्रण रेखा सियाचिन त्रिकोण के दूसरे सिरे को छुएगी जिसे इंदिरा कोल कहा जाता है।

इंदिरा कोल-कराकोरम पर्वत रेंज में स्थित ऐसी पहाड़ी जगह है, जहां भारत की सीमा पाकिस्तानी और चीनी नियंत्रित इलाकों से मिलती है।

पाकिस्तान ने की थी सियाचिन पर कब्जे के लिए कौन सी कोशिश?

1964 से 1972 के दौरान पाकिस्तानी मैप में पॉइंट NJ9842 के आगे सीजफायर लाइन को उत्तर में इंदिरा कोल तक न दिखा कर पश्चिम में कराकोरम पास तक दिखाया गया था। यानी पाकिस्तान ने इस इलाके पर अपना दावा जताना शुरू कर दिया था।

जल्द ही ग्लोबल माउंटेनियर मैप ने इसे ही असली मान लिया। इसका फायदा उठाकर पाकिस्तान ने सियाचिन ग्लेशियर में विदेशी पर्वतारोहियों को जाने की इजाजत दे दी।

1978 तक पर्वतारोहण की इन घटनाओं को लेकर भारत भी चौकन्ना हो गया और उसने भी वहां पर्वतारोहण शुरू कर दिया। इससे दोनों देशों की सेनाओं के बीच एक अघोषित पर्वतारोहण प्रतिद्वंद्विता छिड़ गई।

1978 में भारतीय सेना के प्रमुख पर्वतारोहियों में से एक कर्नल नरेंद्र कुमार को एक जर्मन पर्वतारोही का बनाया मैप मिला। उस मैप में पूरे सियाचिन ग्लेशियर के साथ ही करीब 4 हजार वर्ग किलोमीटर के इलाके को पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में दिखाया गया था।

1978 में कुमार की अगुआई में भारतीय सेना सियाचिन ग्लेशियर की निगरानी के लिए पहुंची। इसके बाद भारतीय सेना ने गर्मियों में सियाचिन की निगरानी करने का फैसला किया। बाद में पाकिस्तानी मंसूबों पर पानी फेरते हुए भारत ने अप्रैल 1984 पर सियाचिन पर कब्जा कर लिया।

खबर में आगे बढ़ने से पहले इस पोल में हिस्सा लेते हैं...

कौन हैं लांस नायक चंद्रशेखर, 38 साल बाद सियाचिन से मिला जिनका शव

लांस नायक चंद्रशेखर हरबोल उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले के रानीखेत के बिंटा गांव के थे। 1971 में वे भारतीय सेना की 19वीं कुमाऊं रेजिमेंट से जुड़े।

वे 1984 में सियाचिन ग्लेशियर पर कब्जे के लिए चलाए गए ऑपरेशन मेघदूत का हिस्सा थे। उस ऑपरेशन के दौरान चंद्रशेखर समेत कुमाऊं रेजिमेंट के 20 जवान सियाचिन में हिमस्खलन की वजह से लापता हो गए थे। इनमें चंद्रशेखर समेत 5 जवानों का कुछ पता नहीं चल पाया था।

अब 38 साल बाद अगस्त 2022 में सियाचिन में राजस्थान राइफल्स के निगरानी दल के जवानों को चंद्रशेखर का शव मिला। बाकी के चार जवान अब भी लापता हैं। चंद्रशेखर के शव की पहचान वहां से मिली आर्मी डिस्क से हुई। आर्मी डिस्क-मेटल से बना एक चक्र होता है, जिस पर सैनिक का आर्मी नंबर दर्ज होता है।

पत्नी को उम्मीद- देश याद रखेगा कुर्बानी, बेटी ने कहा- काश पापा जिंदा लौटते

1975 में चंद्रशेखर ने अल्मोड़ा की शांति देवी से शादी की थी। 1984 में जब चंद्रशेखर सियाचिन से लापता हुए थे, तब उनकी पत्नी शांति की उम्र 25 साल थी। उनकी दो बेटियां थीं- 4 साल की कविता और डेढ़ साल की बबिता। शांति ने फिर शादी नहीं की और अपना जीवन अपनी दोनों बेटियों की परवरिश में लगा दिया।

अब 63 साल की हो चुकीं शांति देवी का कहना है कि उन्हें उम्मीद है कि उनके पति की शहादत को भी हमेशा याद रखा जाएगा। वहीं अब 42 साल की हो चुकीं चंद्रशेखर की बड़ी बेटी कविता का कहना है- 'पापा घर आ गए हैं, लेकिन काश कि वो जीवित लौटते और हम सब साथ में स्वतंत्रता दिवस मनाते।'