भास्कर एक्सप्लेनरपुराने पार्ट्स न होने का बहाना नहीं बना पाएंगी कंपनियां:मोबाइल-टैब हो या कार, आपको मिलेगा राइट टु रिपेयर; 7 सवालों से समझिए

6 महीने पहले

अभी पिछले महीने की बात है। अपने मोबाइल की रिपेयरिंग के लिए सर्विस सेंटर गया था, लेकिन कंपनी ने यह कहके रिपेयरिंग से इनकार कर दिया कि आपका फोन पुराना हो गया है, अब इसके पार्ट्स बनना बंद हो गए हैं। मजबूरन मुझे नया फोन लेना पड़ा।

यह परेशानी सिर्फ मेरी नहीं है। ज्यादातर लोगों को इस तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ता है, लेकिन केंद्र सरकार के नए कानून 'राइट टु रिपेयर' के आने के बाद बहुत हद तक इससे निजात मिलेगा। डिपार्टमेंट ऑफ कंज्यूमर अफेयर्स ने इसके लिए एक कमेटी भी बना दी है। कानून के लागू होने बाद कंपनी ग्राहक के पुराने प्रोडक्ट्स की मरम्मत से इनकार नहीं कर पाएंगी।

ऐसे में आज हम एक्सप्लेनर में बताएंगे कि राइट टु रिपेयर कानून है क्या? इसके तहत कौन से प्रोडक्ट आएंगे? राइट टु रिपेयर कानून लाने का उद्देश्य क्या है? कंपनियों को क्या करना होगा?

इन सवालों के जवाब जानने से पहले इस पोल पर आप अपनी राय दे सकते हैं...

सवाल 1 : राइट टु रिपेयर के तहत कौन से प्रोडक्ट आएंगे?

जवाब: राइट टु रिपेयर में मोबाइल, लैपटॉप, टैबलेट जैसे इलेकट्रॉनिक गैजेट्स समेत वाशिंग मशीन, रेफ्रिजरेटर , एसी, फर्नीचर और टेलीविजन जैसे कन्यूमर ड्यूरेबल्स शामिल होंगे।
ऑटोमोबाइल और एग्रीकल्चरल इक्विपमेंट्स यानी आपकी कार के स्पेयर पार्ट्स से लेकर किसानों के काम आने वाले उपकरण भी राइट टु रिपेयर के दायरे में आएंगे।

सवाल 2 : इस कानून से आम लोगों को क्या फायदा होगा?

जवाब: कानून लागू होने के बाद अगर किसी का मोबाइल, लैपटॉप, टैब, वाशिंग मशीन, एसी, फ्रिज, टेलीविजन, कार जैसा कोई प्रोडक्ट खराब हो जाता है, तो उस कंपनी का सर्विस सेंटर रिपेयर करने से इनकार नहीं कर सकता कि पार्ट पुराना है और उसे बनाया नहीं जा सकता। कंपनी को गैजेट का वह पार्ट बदलकर देना होगा।

नए कानून के बाद अब कंपनियों को किसी भी सामान के नए हिस्से के साथ पुराने हिस्से रखने होंगे। इसके साथ ही पुराने पुर्जों को बदलकर आपके खराब सामान को ठीक करने की जिम्मेदारी भी कंपनी की होगी।

यूजर्स कंपनी के सर्विस सेंटर के अलावा कहीं भी अपने गैजेट्स को सही करवा सकेंगे

दरअसल, कंपनियां किसी प्रोडक्ट के नए मॉडल या अपना ही कोई दूसरा प्रोडक्ट बेचने के लिए यह स्ट्रैटेजी अपनाती हैं और पुराने प्रोडक्ट की रिपेयरिंग से मना कर देती हैं।

भारत में हर साल करीब 10 लाख टन ई-कचरा निकलता है। कबाड़ बन चुके इलेक्ट्रॉनिक गैजेट हवा, पानी और मिट्टी को दूषित तो करते ही हैं, वे जलवायु परिवर्तन को भी बढ़ा रहे हैं। इसमें कम्प्यूटर, फोन, फ्रिज, एसी से लेकर टीवी, बल्ब, खिलौने और इलेक्ट्रिक टूथब्रश जैसे गैजेट तक शामिल हैं।
भारत में हर साल करीब 10 लाख टन ई-कचरा निकलता है। कबाड़ बन चुके इलेक्ट्रॉनिक गैजेट हवा, पानी और मिट्टी को दूषित तो करते ही हैं, वे जलवायु परिवर्तन को भी बढ़ा रहे हैं। इसमें कम्प्यूटर, फोन, फ्रिज, एसी से लेकर टीवी, बल्ब, खिलौने और इलेक्ट्रिक टूथब्रश जैसे गैजेट तक शामिल हैं।

सवाल 3 : राइट टु रिपेयर कानून लाने के पीछे मकसद क्या है?

जवाब: सरकार का इसके पीछे दो मकसद हैं। पहला- ग्राहकों को रिपेयरिंग न होने की वजह से बिना जरूरत नए प्रोडक्ट खरीदने से मुक्ति मिलेगी। दूसरा- इससे इलेक्ट्रॉनिक कचरे यानी ई-वेस्ट में भारी कमी आएगी।

सवाल 4 : लोगों को राइट टु रिपेयर मिलने के बाद कंपनियों को क्या करना होगा?

जवाब:

  • कंपनियों को किसी गैजेट्स से जुड़े सभी कागजात और मैनुअल यूजर्स को देने होंगे।
  • कंपनियों को नए के साथ पुराने प्रोडक्ट्स के पार्ट्स भी रखने होंगे।
  • यूजर्स कंपनी के सर्विस सेंटर के अलावा कहीं और भी अपने गैजेट्स या प्रोडक्ट को रिपेयर करवा सकें इसके लिए प्रोडक्ट के पार्ट्स बाजार में उपलब्ध कराने होंगे।
2019 में पूरी दुनिया में 5.36 करोड़ टन इलेक्ट्रॉनिक सामान कूड़े में फेंक दिया गया था। यूनाइटेड नेशन्स (UN) के मुताबिक इसमें से सिर्फ 17.4% रिसाइकिल हो पाया। हर साल यह कचरा 4% की दर से बढ़ रहा है।
2019 में पूरी दुनिया में 5.36 करोड़ टन इलेक्ट्रॉनिक सामान कूड़े में फेंक दिया गया था। यूनाइटेड नेशन्स (UN) के मुताबिक इसमें से सिर्फ 17.4% रिसाइकिल हो पाया। हर साल यह कचरा 4% की दर से बढ़ रहा है।

सवाल 5 : क्या राइट टु रिपेयर जैसा कानून दुनिया के और देशों में भी है?

जवाब: भारत से पहले ‘राइट टु रिपेयर’ जैसे कानून अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोपीय यूनियन के देशों में लागू हैं। हाल ही में ब्रिटेन ने एक कानून बनाकर यूजर्स को अपने गैजेट्स कंपनी के सर्विस सेंटर के अलावा किसी लोकल रिपेयरिंग शॉप पर भी सही कराने का अधिकार दिया है। ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में तो रिपेयर कैफे हैं, जहां अलग-अलग कंपनियों के एक्सपर्ट इकट्ठा होकर एक-दूसरे के साथ रिपेयरिंग स्किल शेयर करते हैं।

सवाल 6 : राइट टु रिपेयर की जरूरत क्यों पड़ी?

जवाब: दुनिया में बढ़ते ई वेस्ट को लेकर एक्सपर्ट में बहुत चिंता है। इससे निपटने के लिए कई अभियान चल रहे हैं, जिनमें से एक है 'राइट टु रिपेयर।' मामूली खराबी आने पर महंगे गैजेट्स फेंक दिए जाते हैं या फेंकने पड़ते हैं।

सवाल 7: नए कानून बनाने के मसले पर कंपनियां क्या कह रही हैं?

जवाब: कंपनियां का कहना है कि यह मसला बहुत जटिल है। तमाम प्रोडक्ट्स को हर बार रिपेयर करना संभव और सुरक्षित नहीं होगा। दूसरी तरफ विएना में एक प्रयोग में साबित हुआ कि सिर्फ रिपेयरिंग ई कचरे को काफी हद तक कम कर सकती है। 2021 में ही “राइट टु रिपेयर यूरोप” नाम के संगठन ने विएना शहर प्रशासन के साथ मिलकर एक वाउचर योजना चलाई।

इसके तहत उत्पादों को फेंकने के बजाय ठीक करवा कर दोबारा इस्तेमाल करने पर 100 यूरो का कूपन दिया गया। लोगों ने इस दौरान 26 हजार चीजें ठीक करवाईं। इस तरह विएना शहर का इलेक्ट्रॉनिक कचरा 3.75% कम हुआ।

भारत के साथ ही ज्यादातर देशों में रिपेयरिंग की ज्यादा सुविधा नहीं है या रिपयेर करना इतना मंहगा है कि लोग मौजूदा प्रोडक्ट्स को फेंककर नए प्रोडक्ट्स खरीद लेते हैं।

इसी वजह से तमाम देश गैजेट्स को ठीक यानी रिपेयर करने के प्रोसेस को आसान बनाना चाहते हैं। एक्सपर्ट कहते हैं कि कंपनियां जानबूझ कर अपने उत्पाद ऐसे बनाती हैं कि उन्हें ठीक करना मुश्किल हो या जानबूझकर स्पेयर पार्ट्स मिलना मुश्किल बना दिया जाता है।

मार्च 2021 में यूरोप ने वॉशिंग मशीन, डिश वॉशर्स, फ्रिज और टीवी स्क्रीन बनाने वाली कंपनियों को उस मॉडल का बनना बंद होने के 10 साल बाद तक स्पेयर पार्ट उपलब्ध कराने का आदेश दिया था। अब सरकारें चाहती हैं कि ऐसा ही नियम फोन या अन्य इलेक्ट्रॉनिक गैजेट बनाने के लिए भी हो। जुलाई 2021 में अमेरिका के फेडरल ट्रेड कमीशन ने राइट टु रिपेयर के फेवर में सर्वसम्मति से मतदान किया।

नीचे ग्राफिक में देखिए कौन से देश में सबसे ज्यादा ई वेस्ट होता है

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