हिजाब पर सुप्रीम बहस:वकील- स्कूलों में पगड़ी, तिलक, क्रॉस पर रोक नहीं तो हिजाब पर क्यों? SC में 6 दिनों की रोचक दलीलें

3 महीने पहलेलेखक: अनुराग आनंद

मुस्लिम लड़कियां स्कूल-कॉलेज में हिजाब पहन सकती हैं या नहीं, इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट में 6 दिन जबर्दस्त बहस हुई। करीब 19 घंटे की पूरी जिरह को हमने पढ़ा और समझा। इस बहस में तिलक, पगड़ी और क्रॉस का भी जिक्र आया। कुरान का भी जिक्र आया और संविधान का भी। अभी इस टॉपिक पर तस्वीर साफ नहीं हो पाई है। आज दोपहर 2 बजे से एक बार फिर दलीलें दी जाएंगी।

हिजाब मामले पर कोर्ट में चल रही बहस की रोचक दलीलें और न्यायाधीशों की सख्त टिप्पणियों को जानने से पहले विवाद की कहानी जान लेते हैं...

अब पहले आखिरी तीन दिन यानी 12 सितंबर, 14 सितंबर और 15 सितंबर की बहस को पढ़िए...

एडवोकेट यूसुफ मुच्छल
कोई जज्बात में इस मामले को कोर्ट में लेकर गया, लेकिन कोर्ट को अपनी सीमा नहीं भूलनी चाहिए।

जस्टिस गुप्ता
आप खुद ही अपनी बात का खंडन कर रहे हैं। पहले आप कहते हैं कि जरूरी धार्मिक प्रथाओं के सवाल को बड़ी पीठ के पास भेजा जाना चाहिए। फिर कोर्ट की दखल को गलत बताते हैं।

एडवोकेट यूसुफ मुच्छल
मैंने ऐसा संविधान की व्याख्या से संबंधित सिर्फ कुछ मुद्दों को लेकर ही कहा है।

एडवोकेट यूसुफ मुच्छल
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में लिखा है कि जब छात्राओं ने हिजाब पहनना शुरू किया था, तो ये गलत नहीं था। पिछले कई सालों से छात्राएं हिजाब पहनती आ रही हैं तब भी गलत नहीं था। साथ ही कोर्ट के बयान से कहीं जाहिर नहीं होता कि हिजाब पहनना गलत है। याचिका करने वालों का मानना है कि हिजाब का उनके धर्म से जुड़ाव है।

जस्टिस गुप्ता
आप कहना क्या चाहते हैं?

एडवोकेट यूसुफ मुच्छल
हिजाब पहनकर स्कूल में प्रवेश से रोकना छात्राओं को शिक्षा की पहुंच से दूर करना है। निजता का अधिकार, अभिव्यक्ति की आजादी का अधिकार और धर्म को पालन करने का अधिकार, एक दूसरे के पूरक हैं।

जस्टिस धूलिया
क्या आप ये कहना चाहते हैं कि हिजाब पहनना एक जरूरी धार्मिक प्रथा है?

एडवोकेट यूसुफ मुच्छल
आर्टिकल 25 (1) (A), आर्टिकल 19 (1) (A) और 21 के तहत यह मेरा अधिकार है। इन अधिकारों को एक साथ देखें, तो हिजाब पहनने से रोकना मौलिक अधिकारों का हनन है। हिजाब पहनकर स्कूल जाने से रोका गया, तो मेरे शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार, व्यक्तिगत गरिमा का अधिकार, निजता का अधिकार और धर्म का पालन करने का अधिकार.. इन सभी का उल्लंघन होगा।

जस्टिस गुप्ता
आप ये कहना चाहते हैं कि हिजाब पहनने का अधिकार आर्टिकल 25 और 19 से आपको मिला है?

एडवोकेट यूसुफ मुच्छल
हां, केवल कपड़े से सिर ढंकने की वजह से किसी को शिक्षा से वंचित नहीं किया जा सकता। पगड़ी पहनना मना नहीं है। यदि आप इसकी इजाजत देते हैं, तो आप डायवर्सिटी को स्वीकार करते हैं।

एडवोकेट सलमान खुर्शीद
कुरान में लिखी बातें मानव निर्मित नहीं हैं। वे ईश्वर के वचन हैं, जो पैगंबर के माध्यम से आए थे। यह परमेश्वर का वचन है और यह अनिवार्य है। अन्य धर्मों की तरह इस्लाम में अनिवार्य और गैर-अनिवार्य जैसी दो बातें नहीं हैं। पैगंबर की कही हर बात अनिवार्य है। (खुर्शीद ने जज को कुरान की एक कॉपी भेंट की। )

जस्टिस गुप्ता
आप चाहते हैं कि हम कुरान की लिखी बातों की व्याख्या करें, लेकिन यूसुफ मुच्छल ने तो कहा कि कोर्ट को धर्मग्रंथ में लिखी बात की व्याख्या नहीं करनी चाहिए।

एडवोकेट सलमान खुर्शीद
इस मामलें में मैं एडवोकेट यूसुफ मुच्छल से अलग विचार रखता हूं। मैं चाहता हूं कि इसे पढ़कर आप कोई कानूनी तरीका निकालें।

जस्टिस धूलिया
आपकी क्या राय है? क्या हिजाब पहनना एक जरूरी धार्मिक प्रैक्टिस है?

एडवोकेट सलमान खुर्शीद
हिजाब पहनने को धर्म से जोड़कर देखा जा सकता है। हिजाब पहनने को लोगों के विचार, संस्कृति, व्यक्तिगत गरिमा और प्राइवेसी के रूप में भी देखना चाहिए।

एडवोकेट सलमान खुर्शीद
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में अनुच्छेद 51A(h) के तहत कहा कि स्कूल में वैज्ञानिक माहौल को बनाना छात्रों का मौलिक कर्तव्य है, लेकिन इस दौरान कोर्ट ने 51A(f) के तहत स्कूलों में सभी संस्कृति को बढ़ावा देने की जिम्मेदारी वाली बात को नजरअंदाज कर दिया।

सुनवाई को बुधवार यानी 14 सितंबर सुबह 11.30 बजे के लिए शेड्यूल किया गया।

एडवोकेट आदित्य सोंधी
‘लॉ’ कॉलेज में मेरी दोस्त है, जिन्होंने कभी हिजाब नहीं पहना। यह व्यक्तिगत पसंद का मामला है, लेकिन यहां हम उन छात्राओं से ऐसा करने के लिए कह रहे हैं जो शायद अपने परिवार में पढ़ाई करने वाली पहली छात्रा हों। हमें इनकी सोशियो-इकोनॉमिक बैकग्राउंड का भी ध्यान रखना होगा।

जस्टिस गुप्ता
आप अपनी बात को जल्द खत्म कीजिए।

एडवोकेट आदित्य सोंधी
अंबेडकर ने कहा था कि अगर बेरोजगार व्यक्ति को कम सुविधा और अधिकारों वाली नौकरी चुनने के लिए मजबूर किया जाता है, तो इससे बेरोजगारों के मौलिक अधिकारों का हनन हो सकता है। इसी तरह हाईकोर्ट का फैसला है, जो लड़कियों को हिजाब पहनने से रोकता है।

जस्टिस धूलिया
भीमराव अंबेडकर की इस बात का जिक्र यहां करना कितना उचित है?

एडवोकेट आदित्य सोंधी
उचित है, क्योंकि नागरिकों को 2 में से किसी एक अधिकार को चुनने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है। जैसा कि हाईकोर्ट के फैसले से साफ हो रहा है कि उन्हें शिक्षा के बदले अपनी व्यक्तिगत गरिमा, प्राइवेसी जैसे फैसलों को छोड़ना पड़ रहा है।

सीनियर एडवोकेट राजीव धवन

इस मामले में 4 बातें हैं-

पहला: राइट टु ड्रेस, फ्री स्पीच के अधिकार का हिस्सा है, जो सार्वजनिक व्यवस्था को बनाए रखने के लिए उचित प्रतिबंधों के अधीन है।

दूसरा: यह प्राइवेसी यानी निजता के अधिकार का मामला है।

तीसरा: यह जरूरी धार्मिक प्रथा का हिस्सा है या नहीं? केरल और कर्नाटक हाईकोर्ट का इस पर अलग-अलग मत हैं।

चौथा: हिजाब पहनने वालों के साथ धर्म और लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता है।

एडवोकेट हुजेफा अहमदी
मैं इस केस में फ्रेटरनिटी या बंधुत्व का मामला उठाना चाहता हूं।

जस्टिस गुप्ता
इस पॉइंट पर पहले ही तर्क दिया गया है।

एडवोकेट अहमदी
किसी ने तर्क नहीं दिया है।

जस्टिस धूलिया
इस बात पर किसी ने तर्क नहीं दिया है।

एडवोकेट अहमदी
दो बातें हैं- पहला- कर्नाटक एजुकेशन एक्ट बंधुत्व को बढ़ाने की बात करता है जबकि हिजाब पर बैन वाला सरकारी सर्कुलर इसके ठीक उल्टा है। दूसरा- राज्य का काम शिक्षा को प्रोत्साहित करना है, खासकर अल्पसंख्यकों के बीच। लेकिन, इस आदेश से ड्रॉपआउट के मामले बढ़ेंगे।

सबरीमाला मामले में कोर्ट ने जो कहा उससे साफ नहीं होता है कि आवश्यक धार्मिक प्रैक्टिस क्या है?

जस्टिस धूलिया​​​​​​​
क्या आपके पास कोई सही आंकड़ा है कि कितने स्टूडेंट्स की पढ़ाई छूटेगी?

एडवोकेट अहमदी​​​​​​​
मेरे दोस्त से मुझे जानकारी मिली है कि इस फैसले के बाद सिर्फ एक राज्य में 17,000 से ज्यादा स्टूडेंट्स परीक्षा नहीं दे पाए हैं।

एडवोकेट जयना कोठारी
यह मामला धर्म और लिंग आधारित भेदभाव का है। इससे न तो देश की सभी लड़कियां और न ही सभी मुस्लिमों के साथ बल्कि सिर्फ मुस्लिम लड़कियों के साथ भेदभाव होता है।

एडवोकेट दवे
इस मामले को हम आज खत्म नहीं कर पाएंगे। इस पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। इसे संविधान पीठ को रेफर करना चाहिए। कृपया जल्दी में मामले को नहीं निपटाएं। सरकार ने तो इस मामले में काउंटर याचिका भी दाखिल नहीं की है। साफ है कि उन्होंने मामले को हल्के में लिया है। अल्लाह की जो भी आज्ञा है, जो पैगम्बर ने कही है, वह अनिवार्य है।

एडवोकेट मीनाक्षी अरोड़ा
स्कूल में हिजाब पहनने देना धार्मिक सहिष्णुता की पहचान है। स्कूल में बच्चों के अंदर दूसरों के धर्म और उनकी परंपरा को लेकर सम्मान का भाव पैदा होता है।

एडवोकेट शोएब आलम
हिजाब व्यक्ति की पहचान का मामला है, यह व्यक्ति की मर्यादा से जुड़ा है। कैदी को भी मौलिक अधिकार होते हैं। ऐसे में किसी को कपड़े से अपना शरीर ढकने सेफ महसूस होता है, तो यह उसकी व्यक्तिगत इच्छा है।

एडवोकेट कॉलिन गोंजाल्विस​​​​​​​
हाईकोर्ट द्वारा की गई कई टिप्पणियों ने समुदाय की धार्मिक भावनाओं को आहत किया और अन्य धर्मों को इस्लाम के बारे में भ्रामक जानकारी दी। यह न्याय की भाषा नहीं है। हाईकोर्ट का फैसला अल्पसंख्यक समुदाय के लिए सम्मानजनक नहीं है।

जस्टिस धूलिया​​​​​​​
यदि हिजाब पहनने को आप मुस्लिम धर्म की जरूरी धार्मिक प्रथा के रूप में साबित नहीं कर पा रहे हैं, तो क्या आप इसे अधिकार के तौर पर साबित कर सकते हैं?

एडवोकेट कॉलिन गोंजाल्विस​​​​​​​
हम जरूरी धार्मिक प्रथा साबित नहीं कर पाए, तो हाईकोर्ट का ये कहना कि हिजाब पहनना कोई अधिकार ही नहीं है, यह कितना उचित है?

एडवोकेट प्रशांत भूषण
सरकारी स्कूल हिजाब पहनकर आने पर एंट्री देने से मना नहीं कर सकते हैं। सिख के पगड़ी, हिंदू के तिलक और क्रिश्चियन के क्रॉस पर बैन नहीं, तो आर्टिकल 19(2) के तहत हिजाब पर भी बैन नहीं होना चाहिए।

जस्टिस गुप्ता
दुष्यंत दवे आप इस मामले में बोलने के लिए कितना समय लेंगे?

एडवोकेट दवे​​​​​​​
मैं अभी अच्छे से बोल नहीं पाया हूं। मुझे 4 घंटे का समय लग सकता है।

दवे से बेंच की अपील
​​​​​​​पहले बोली जा चुकी बातें नहीं दोहराइएगा।

एडवोकेट दवे​​​​​​​
कुछ बातें दोबारा रिपीट हो सकती हैं, सभी वकीलों ने अलग-अलग तरह से बातें रखी हैं।

जस्टिस गुप्ता
लेकिन सभी के मकसद एक थे।

एडवोकेट दवे​​​​​​​
हां, यह मामला भगवान जैसा ही है। जैसे एक ईश्वर, लेकिन कई धर्म।

अब आप हिजाब पर शुरुआती 3 दिनों की सुनवाई को नीचे पढ़िए....

सुप्रीम कोर्ट में सीनियर एडवोकेट राजीव धवन ने 5 सितंबर को दोपहर 2 बजे हिजाब मामले पर मुस्लिम लड़कियों का पक्ष रखना शुरू किया। उन दलीलों की कुछ हाइलाइट्स...

एडवोकेट धवनः आर्टिकल 145 (3) के मुताबिक इस मामले को पांच-सदस्यीय संविधान पीठ के पास भेजा जाए। इसमें बड़ी संख्या में औरतें शामिल हैं, जिनके सामने सवाल है कि क्या वो ड्रेस कोड के सामने झुक जाएं या हिजाब एक जरूरी धार्मिक प्रथा है।

जस्टिस गुप्ताः हिजाब पहनना जरूरी धार्मिक प्रथा हो सकती है या नहीं भी, लेकिन हम एक सेकुलर देश हैं और सरकार ड्रेस कोड रेगुलेट कर सकती है। (यहां क्लिक कर पढ़िए शुरुआती 3 दिनों की पूरी जिरह..)

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