उद्धव के हाथ से तीर कमान छूटना तय:शिंदे गुट के साथ आए 12 सांसद, 5 सवालों में समझिए चुनाव आयोग कैसे करेगा फैसला

5 महीने पहले

उद्धव ठाकरे से शिवसेना का पार्टी सिंबल तीर कमान छीनने की जंग में एकनाथ शिंदे भारी पड़ने लगे हैं। शिवसेना के कुल 19 लोकसभा सांसदों में से 12 उनके पाले में आ चुके हैं। दावा 6 और सांसदों का भी है।

इससे पहले 40 विधायक, राष्ट्रीय कार्यकारिणी और संगठन से जुड़े ज्यादातर शिवसैनिक शिंदे के साथ आ चुके हैं। कुल मिलाकर उद्धव के हाथ से शिवसेना का तीर कमान फिसलना तकरीबन तय माना जा रहा है। हालांकि, आखिरी फैसला चुनाव आयोग को करना है।

आज भास्कर एक्सप्लेनर में 5 सवालों के जवाब से जानते हैं कि उद्धव के हाथ से तीर कमान छूटना तय क्यों है? साथ ही चुनाव आयोग कैसे करेगा फैसला?

इन सवालों के जवाब जानने से पहले इस पोल पर हम आपकी राय जानना चाहते हैं...

सवाल 1: महाराष्ट्र में शिंदे के CM बनने के बाद शिवसेना के उद्धव गुट और शिंदे गुट के समीकरण में क्या बदलाव आया है?

विधायक : 2019 में शिवसेना के कुल 56 विधायक थे। इनमें से 1 की मौत हो चुकी है। यानी यह संख्या अब 55 है। 4 जुलाई को हुए फ्लोर टेस्ट में शिंदे गुट के पक्ष में 40 विधायकों ने वोट किया था।

संगठन : 7 जुलाई को ठाणे जिले के 67 कॉर्पोरेटर में से 66 शिंदे गुट में शामिल हो चुके हैं। देखा जाए तो BMC के बाद ठाणे सबसे बड़ी म्युनिसिपल कार्पोरेशन है। इसके बाद डोंबिवली महानगरपालिका के 55 कॉर्पोरेटर उद्धव ठाकरे का साथ छोड़कर शिंदे के साथ मिल गए हैं। वहीं नवी मुंबई के 32 कॉर्पोरेटर भी शिंदे गुट में शामिल हो चुके हैं।

इसके साथ ही शिंदे गुट ने 18 जुलाई को पार्टी की पुरानी राष्ट्रीय कार्यकारिणी भंग कर नई कार्यकारिणी का ऐलान कर दिया। मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे को शिवसेना का नया नेता चुन गया है। खास बात यह है कि शिवसेना ने पार्टी प्रमुख के पद को नहीं हटाया है। यानी उद्धव ठाकरे का पद जस का तस रखा गया है।

सांसद : शिवसेना के कुल 19 लोकसभा और 3 राज्यसभा सांसद हैं। इनमें से 12 लोकसभा सांसदों की शिंदे गुट ने मंगलवार, यानी 19 जुलाई को लोकसभा स्पीकर के सामने परेड करवाई है। इसके साथ ही शिंदे गुट का दावा है कि 19 सांसदों में से 18 हमारे साथ हैं। स्पीकर ओम बिड़ला ने भी बागी गुट के नेता एकनाथ शिंदे समर्थक सांसद राहुल शेवाले को लोकसभा में शिवसेना के नेता के तौर पर मान्यता दे दी है। वहीं भावना गवली को शिवसेना की चीफ व्हिप के तौर पर बरकरार रखा गया है।

राष्ट्रपति चुनाव : उद्धव ठाकरे की शिवसेना का गठबंधन भले ही अभी कांग्रेस और NCP के साथ बरकरार है, लेकिन 18 जुलाई को हुए राष्ट्रपति चुनावों में शिवसेना के सभी 22 सांसदों ने BJP उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू के पक्ष में मतदान किया।

अगले सवाल पर जाने से पहले हमारे कार्टूनिस्ट चंद्रशेखर हाडा का यह कार्टून देखते चलें...

सवाल 2 : शिवसेना सिंबल के मामले में चुनाव आयोग कैसे फैसला करेगा?

किसी मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय या राज्य स्तर की पार्टी में कोई फूट होती है, तो चुनाव आयोग फैसला करता है कि असली पार्टी किसकी है। यानी शिवसेना किसकी, इसे चुनाव आयोग ही तय करेगा। चुनाव आयोग को यह अधिकार द इलेक्शन सिंबल्स (रिजर्वेशन एंड अलॉटमेंट) ऑर्डर, 1968 के पैराग्राफ 15 से मिलता है।

आयोग पार्टी के वर्टिकल बंटवारे की जांच करेगा। यानी इसमें विधायिका और संगठन दोनों देखे जाते हैं। चुनाव आयोग बंटवारे से पहले पार्टी की टॉप कमेटियों और डिसीजन मेकिंग बॉडी की लिस्ट निकालता है। इससे ये जानने की कोशिश करता है कि इसमें से कितने मेंबर्स या पदाधिकारी किस गुट में हैं। इसके अलावा किस गुट में कितने सांसद और विधायक हैं।

ज्यादातर मामलों में आयोग ने पार्टी के पदाधिकारियों और चुने हुए प्रतिनिधियों के समर्थन के आधार पर सिंबल देने का फैसला दिया है, लेकिन अगर किसी वजह से यह ऑर्गेनाइजेशन के अंदर समर्थन को सही तरीके से जस्टिफाई नहीं कर पाता, तो आयोग पूरी तरह से पार्टी के सांसदों और विधायकों के बहुमत के आधार पर फैसला करता है।

सवाल 3 : क्या समीकरण बदलने से शिंदे गुट शिवसेना का सिंबल तीर कमान छीन लेगा?

शिवसेना के 40 विधायक और 12 सांसद अब शिंदे गुट के साथ हैं। शिंदे ने सांसदों और विधायकों की संख्या के आधार पर दावा किया है कि उनके पास दो तिहाई जनप्रतिनिधि हैं, इसलिए असली शिवसेना अब उनकी है। इसके साथ ही शिंदे गुट ने कई जिलों के पदाधिकारियों के भी साथ होने का दावा किया है। यानी शिंदे ने संगठन को भी तोड़ना शुरू कर दिया है।

हालांकि, इस टूट से पहले उद्धव ठाकरे शिवसेना के संविधान के मुताबिक चुने गए अध्यक्ष हैं। संसदीय गुट में अभी कोई बगावत नहीं है।

जैसा कि ऊपर हम बता चुके हैं कि चुनाव आयोग पार्टी के वर्टिकल बंटवारे की जांच करेगा। यानी इसमें विधायिका और संगठन दोनों देखे जाते हैं। ऐसे में अभी जो स्थिति है उसमें शिंदे गुट मजबूत स्थिति में दिख रहा है। यानी विधायिका के साथ ही साथ वह संगठन के लोगों को भी अपने पाले में करते दिख रहे हैं।

1987 में तमिलनाडु में भी शिवसेना जैसा मामला देखने को मिला था। एमजी रामचंद्रन की मौत के बाद AIADMK में दो फाड़ हो गई थी। उस समय एमजीआर की पत्नी जानकी को पार्टी के अधिकांश विधायकों और सांसदों का समर्थन था, लेकिन उनकी शिष्या जे जयललिता को पार्टी के अन्य मेंबर्स और कैडर का भारी समर्थन था। हालांकि, दोनों गुटों में समझौता होने के चलते चुनाव आयोग को इस चुनौती से राहत मिल गई थी। यानी इस तरह के मामले में चुनाव आयोग ने कभी फैसला नहीं दिया है। इस तस्वीर में जयललिता, एमजीआर और जानकी हैं।
1987 में तमिलनाडु में भी शिवसेना जैसा मामला देखने को मिला था। एमजी रामचंद्रन की मौत के बाद AIADMK में दो फाड़ हो गई थी। उस समय एमजीआर की पत्नी जानकी को पार्टी के अधिकांश विधायकों और सांसदों का समर्थन था, लेकिन उनकी शिष्या जे जयललिता को पार्टी के अन्य मेंबर्स और कैडर का भारी समर्थन था। हालांकि, दोनों गुटों में समझौता होने के चलते चुनाव आयोग को इस चुनौती से राहत मिल गई थी। यानी इस तरह के मामले में चुनाव आयोग ने कभी फैसला नहीं दिया है। इस तस्वीर में जयललिता, एमजीआर और जानकी हैं।

सवाल 4: क्या ये मामला चुनाव आयोग तक पहुंच चुका है?

एकनाथ शिंदे गुट की ओर से 19 जुलाई को चुनाव आयोग को एक लेटर सौंपा गया है। लेटर में लिखा है कि हमारे पास शिवसेना विधायकों और सांसदों का बहुमत है। हमारे पास एक राष्ट्रीय कार्यकारिणी है। ऐसे में हमें असली शिवसेना के रूप में मान्यता दी जाए।

वहीं शिंदे की पार्टी पर कब्जे की स्ट्रैटेजी को देखते हुए उद्धव गुट ने 11 जुलाई को चुनाव आयोग में कैविएट दाखिल की थी। इसमें कहा गया था कि पार्टी के चुनाव चिह्न पर शिंदे गुट द्वारा की गई किसी भी मांग पर विचार करने से पहले उन्हें सुना जाए।

सवाल 5: आखिर शिंदे शिवसेना पर कब्जा क्यों करना चाहते हैं?

इस पूरे प्रकरण से यह साफ है कि BJP का मकसद महाराष्ट्र में सिर्फ सरकार बनाना नहीं है, बल्कि वह उद्धव ठाकरे को राज्य में कमजोर करना चाहती है। साथ ही BJP ऐसी शिवसेना चाहती है जो उसका सपोर्ट करे न कि वह उसकी कॉम्पिटीटर हो। लिहाजा BJP चाहती है कि शिंदे गुट को शिवसेना का सिंबल मिल जाए। इससे BJP को आने वाले विधानसभा और लोकसभा चुनाव में शिवसेना के खिलाफ गुस्से का भी सामना नहीं करना पड़ेगा।

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